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Showing posts with the label Aawara

पीली बत्ती

इस वक्त, हां इसी वक्त जब नवंबर अपने पैरों में लगती ठंड से बचने के लिए रजाई में अपने पैर सिकोड़ रही है। इसी वक्त जब मैं माज़ी में घटे हालात पर हैरां होता हुआ चीनी मिट्टी में तेज़ी से ठंडे होते हुए चाय के घूंट सुड़क रहा हूं। इसी वक्त जब कम्प्यूटर की स्क्रीन अपने तकनीकी खराबी के बायस अपनी पलकें झपका रही है और ऐसा लग रहा है जैसे इतनी रात गए मैं माॅनिटर के नहीं आईने के सामने बैठा हूं। दिल में रह रह कर सवाल उठ रहा है कि जिंदगी किसलिए ? इतने दोस्त क्यों, हम कहां तक? किसी का साथ कब तक? कैसे हो गया इतना सब कुछ कि अब तक यही लगता रहा कि कुछ भी तो नहीं हुआ है। आज क्या हुआ है कि सबके चेहरे यकायक पराए लगने लगे हैं। तस्वीरें खिंचवाता हुआ आदमी उस वक्त खुद को किस आवरण में ढ़कता है ? क्या यकायक लापरवाही से यह नहीं मान लेता है कि जिं़दगी सुंदर है। दो मिनट दो तो किसी आत्मीय या किसी आशिक की कही बातें याद करता है कि तुम्हारा मुकम्मल वजूद हंसने में ही छंक पाता है। हंसी का बर्तन कैसा आयतन रखता है। तो क्या सन्तानवे फीसदी लोग हंसने से ही अलग हो पाते हैं और इतने ही प्रतिशत लोग अगर उदास हों तो सारी शक्लें एक ...

चांदी की पतली तार फंसी गर्दन में... बौखलाया सिंह भागता जंगल में...

थरथराती पलकों की अजब बेबसी है। इनमें माज़ी का कोई पैकर फंसा है। कुछ इस तरह कि किसी बच्चे की पतंग किसी झाड़ी के झुटपुटे में फंसना लगे। नदी के इस पार बड़े से गुलाबी गेंद का उफक से नदी में गिर जाना लगे। हिचकी लेती उन पलकों में फंसा पैकर जीभ के लिए किस कदर अकेला ठौर कि जबड़ों में कहीं अटके इलाइची के छिलके को जीभ की नोंक से उसका पता लगाना। बार बार मिलना फिर खोजना मगर उंगलियों से टटोलना तो कहां फंसा है यह सही सही पता न लगना। बालिग होते किसी बच्चे का बिजली के तारों के बीच फंसी पतंग, खिड़ - खिड़ करती, फट जाती। बाजार से हर बार गुज़रता और हरसत से उस पतंग को तकना। आज़ाद करने की तमन्ना जैसे कैद में कोई राजकुमारी।  पूरा पतंग जैसे तुम्हारा चेहरा। पुकारने को लब, आंखे - पुकारने को लबे दरिया। मगर हकीकत में बड़े बड़े हर्फों में लिखी उर्दू की आयतें। जिसके ज़ेरो जबर और नुक्ते सब आपस में इस कदर लिपटे जैसे नथ में बेतरबीत फंसे गेशु की एक लंबी डोर...। जैसे मुंडर पर कट चुके पतंग की उजली सूत का सिरा, शायर हाथों से दुःशासन हाथों तक खींचते जाओ बस.... जब बहुत खींच लो और अंत का इंतज़ार खत्म न हो त...

बक रहा हूँ जुनूं में क्या क्या कुछ, कुछ ना समझे खुदा करे कोई

सुख था। इतना कि लोग सुखरोग कहने लगे थे। उन सुखों को हाय लग गई। सुख था जब पापा प्रेस से चार बजे सुबह लौटते थे और मैं जागता हुआ, पापा और अखबार दोनों का इंतज़ार कर रहा होता था। सुबह सात बजे जब प्रसाद अंकल अपने गेट से अखबार उठाते हुए कहते - पता है सागर, आज के अखबार से ताज़ी कोई खबर और कल के अखबार से पुराना कोई अखबार नहीं, तो मेरे अंदर उनसे भी तीन घंटे पहले अखबार पढ़ जाने का सुख था। रात भर की जिज्ञासा के बाद दोस्तों को सबसे पहले शारजाह में सचिन का अपने जन्मदिन पर 143 रन बनाए जाने के समाचार सुनाने का सुख था।  सुख था कि मुहल्ले में मृदुला द्विवेदी के आए सात महीने हो गए थे और संवाद कायम के तमाम रास्ते नाकाम रहे थे तो अचानक एक सुबह द्विवेदी अंकल ने साहबजादी को मैट्रिक के सेंटर पर उसे साथ ले जाने को कहना, आश्चर्यजनक रूप से एक अप्रत्याशित सुख था। पापा का अपने अनुभव से यह कहना कि दुख नैसर्गिक है और लिखा है यह मान कर चलो और यदि ऐसे में सुख मिले तो उसे भी घी लगी दुख समझना, पापा के रूंधे गले से घुटी घुटी दोशीज़ा आवाज़ को यूं अंर्तमन में तब सहेजना भी सुख था। आज भी जब अकेलेपन में जिंदगी के कैसेट ...

महज़ छाती भर ही नहीं, ना पसली का पिंजरा ही, अन्दर एक विला है

पूअर काॅन्शनट्रेशन का शिकार हो गए हो तुम। कि जब एक पूरी कविता तुम्हारी सामने खड़ी होती है तो तुम कभी उसके होंठ देखते हो कभी आंखें। डूब कर देख पाने का तुममें वो आत्मविश्वास जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि वो अब तुम्हारे सामने झुकती नहीं लेकिन तुमने अपने जिंदगी को ही कुछ इस कदर उलझा और जंजालों के भरा बना लिया है कि उसके उभारों के कटाव को देर तक नहीं पाते। बेशक तुम वही देखने की कामना लिए फिरते हो लेकिन तुम्हारा दिमाग यंत्रवत हो गया है। तालाब में उतरते हो लेकिन डूब नहीं पाते, तुमने झुकना बंद कर दिया है। घुटने मोड़ने से परहेज करते हो और इस यंत्रवत दिमाग में संदर्भों से भरा उदाहरण है जो अब मौलिकता पर काबिज हो रही है। करना तो तुम्हें यह चाहिए कि... छोड़ो मैं क्या बताऊं तुम्हें, तुम्हें खुद यह पता है। पर प्रभु लौटना भी तो इसी जनम में होता है न? आखिर किसी के भटकते रहने की अधिकतम उम्र क्या डिसाइड कर रखी है आपने ? खासकर तब जब सभी सामने से अपने रस्ते जा रहे हों। भले ही वो सभी अच्छे इंसान हैं मगर ऐसा क्यों लगता है कि नए घर में घुसने से ठीक पहले वो मुझे ठेंगा दिखा जाते हैं ? यह क्या होता है ?...

आ मेरी जान, मुझे धोखा दे

घंटों टेबल पर झुके रहने के बाद, अपने हथेली से उसने छुप कर ढेर सारी दयनीयता आंखों में डाली और आखिरकार सर उठा कर हाथ जोड़ते हुए बड़े की कमज़ोर लहजे में कुल छः शब्द कहा - मैं परमेश्वर से डरती हूं, प्लीज़। इन छः शब्दों में ढेर सारे चीज़े छुपी हुई थी जो वो मुझसे मांग रही थी। जैसे उसका खुदा मैं ही हो आया था जो उस पर उपकार कर दूं। यह एहसान उसे छोड़ देने का था। महबूब आशिक से अपने को छोड़ दिए की याचना लिए बैठी थी। दिखने में बैठी थी दरअसल वो हाथ जोड़े उल्टा लटकी थी। बड़े पद पर बैठी महिला एक कैजुअल के आगे प्रेम में छोटी साबित हुई थी।  स्पर्श के लिए बीच के मेज़ की दूरी हमने कभी नहीं पार की लेकिन कभी कभार उसके कम्पयूटर की तकनीकी समस्या दूर करने, किसी विभाग के आला अफसरों के घुमावदार अक्षरों में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचने वाली नोट को पढ़ने, एक्सेल की डाटा शीट को थोड़ा और चैड़ा करने। वर्ड की फाइल में टेबल की फाॅरमेटिंग करने के दौरान मैं उसके सिरहाने खड़ा हो जाया करता था। बाज लम्हे ऐ से  होते जब सधे कंधों से चलने वाली और दिखने में पुष्ट सीना लिए उसपर एक पंखे की एक पंखी का गुज़रते हुए हवा क...

घूँट-घूँट सिहरन...

जीने के मानी उतने ही होते हैं जितने में जी भर जाए। जी लेने के तुरंत बाद मरना मंजूर है। मरते हुए जीने के लिए भाग रहे हैं। जिन क्षणों में मर रहे हैं वह सिर्फ जिस्म को मार रहा है। बेचैनी हर बार बच निकलती है। एक मुकम्मल मौत चाहिए। पूरा का पूरा। वक्त की प्रकार में कसे पेंच पर पेंसिल सा लगा मैं हल्के हाथ से पूरा घूम जाना चाहता हूं।  जिस्म एक समतल पार्क है। वक्त की डायल वहां माली सा घूमता रहता है। जब भी कुछ उठाओ बड़ी निर्ममता से छांट देता है। एकांत में बैठकर दो उंगली अपनी पलक पर रखो तो थरथराती प्रतीत होती है जैसे हल्की रोशनी में अधजगे से सो रहे हों। पलकें आंखे छोड़ कर भाग जाना चाहती है। आंखें लाचार और बीमार दिमाग छोड़कर। क्या ऐसा होगा कि यदि मेरी आंखें किसी को लगा दी जाए तो उसमें फिर उस व्यक्ति का मस्तिष्क प्रतिबिंबित होगा ? एक सड़क दीखती है। लम्बी और आगे जाकर मुड़ती सी। दोपहर का सूरज तेज़ है। उसकी गर्मी से सड़क पर का पूरा कोलतार पिघल गया है। रास्ता काले मैग्मे का पूरा नदी बन गया है। नंगे पैर उस पर चलना होता है। पहला पग रखते ही तलवे की नर्म परत की छाल शरीर से अलग हो रास्ते पर चिपक ज...

इस मँझधार में...

ये क्या उमर है कि अब हम प्रेम नहीं करते सिर्फ प्यार से जुड़ी बातें करते है। स्याह खोह से बिस्तर गर्म करती औरतें नहीं है मगर उनके दिए हुए वे पल और ख्याल हैं। ऐसा अब नहीं होता कि तुम देर तक साथ में बैठो तो मैं उठ कर तुम्हारा कंधा दबाने लगूं और थोड़ी देर बाद तुम उठ कर मेरी आंखों में गहरे झांको। हमारी सांसे उलझती। मैं कमरे की दीवार पर तुम्हें घेर दूं और छिपकली की तरह हम दोनों दीवार से चिपक जाएं। हवा का एक कतरा भी फिर हमारे बीच से पार ना होने पाए। अब नहीं होता ऐसा।  XXXXX एक किसी किताब पर हम घंटों बातें करते हैं। तुम्हारी सोच किसी रहस्य किताब की तरह खुलती जाती है और मेरी उमर की उंगलियां उसे पलटते पलटते घिसती जाती है। क्या प्यार में गर्क होना या फिर तबाह हो जाना, उमर बीताना इसे ही तो नहीं कहते कि हो और मेरी किसी पार्क में बैठ कर जिंदगी पर पूरी पूरी शाम बातें करते हैं। जवानी अच्छी थी, एक जूनून हुआ करता था। जवानी अच्छी थी एक जूनून हुआ करता था। कंठ फूटने के दिन थे और खाली वक्त में बाज ख्याल ऐसे आते थे कि जिनसे निजात ना मिले तो किसी चैराहे पर खुद पर किरोसिन छिड़क आग लगा ली जाए। जाने कौन...