Monday, April 5, 2010

मूक सिनेमा का दौर


दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां महाराष्ट्र तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में प्रदर्शित होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में प्रदर्शित करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा निर्देशित फिल्म 'बिल्म मंगल' तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला प्रदर्शन नवम्बर, 1919 में हुआ। जमदेश जी मदन (1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने कलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस बनाया। यह सिनेमाघर आज भी मौजूद है और अब इसका नाम मिनर्वा है। 1918 में मदन का सिनेमा साम्राज्य भारत, बर्मा और श्रीलंका तक फैल गया था। तब जमशेद जी मदन डेढ़ सौ से अधिक सिनेमाघरों के मालिक थे।



 सन् 1919 में `बिल्व मंगल` बनाने के बाद मदन थिएटर्स ने 1920 और बाद के वर्षों में 'महाभारत, सती बेहुला, जय मां जगदम्बे और नल-दमयन्ती' जैसी कई फिल्मों का निर्माण किया। खास बात यह थी कि जहां एक तरफ महाराष्ट्र में बनने वाली फिल्मों में महिलाओं के चरित्र भी पुरुषों द्वारा निभाए जा रहे थे, वहीं जमशेद जी की फिल्मों में स्त्री चरित्र स्त्रियों द्वारा ही निभाए गए। मदन ने कुछ एंग्लों इण्डियन लड़कियों की अनुबंधित किया और उन्हें अपनी फिल्मों में रोल दिए। 1922 में जमशेद जी मदन ने 'पतिभक्ति' का निर्माण किया था जिसमें खलनायिका की भूमिका एक इतालवी अभिनेत्री सिनोरा मिनैली ने की थी।

 लगभग इसी दौर में कलकत्ता में ही धीरेन गांगुली ने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर इण्डो-ब्रिटिश फिल्म कम्पनी की स्थापना की। 1921 में गांगुली ने एक व्यंग फिल्म 'इंग्लैण्ड रिटर्नड(बिलाव फेरात) बनाई। यह फिल्म तब काफी सफल रही। इस फिल्म की सफलता को देखकर जमशेद जी ने इसके वितरण अधिकार खरीद लिए। बाद में इण्डो- ब्रिटिश फिल्म कम्पनी ने दो फिल्में बनाई और गांगुली फिर हैदराबाद चले आए। यहां उन्होंने दो सिनेमाघर तथा एक प्रयोगशाला स्थापित की। लोटस फिल्म कंपनी के बैनर तले उन्होंने हैदराबाद के निजाम के संरक्षण में 1923 से 1927 के बीच दस फिल्में बनाई। लेकिन जब ग्यारहवीं फिल्म 'रजिया सुल्तानबनी तो निजाम नाराज हो गए और उन्होनें धीरेन गांगुली को हैदराबाद छोड़कर चले जाने को कहा। इस फिल्म में एक मुस्लिम महिला और एक हिन्दू युवक के बीच प्रेम दर्शाया गया था। धीरने कलकत्ता लौट गए और वहां उन्होंने ब्रिटिश डोमिनियन फिल्म् कम्पनी की स्थापना की।

 उधर कलकत्ता में जमशेद जी मदन और धीरने गांगुली सक्रिय हुए तो मुम्बई के बाद कोल्हापुर में बाबूराव पेंटर ने भी फिल्म निर्माण में हाथ आजमाया। बाबूराव पेंटर (1890-1954) ने कोल्हापुर में 1917 में महाराष्ट्र फिल्म कम्पनी की स्थापना की। 1918 में उन्होंने पहली फिल्म बनाई सैरन्ध्री, बाद में उन्होंने वत्सलाहरण, सिंहगढ़, राणा हमीर और साहूकारी पाश जैसी कई फिल्में बनाई। दरअसल बाबूराव पेंटर एक अत्यन्त व्यवस्थित और कल्पनाशील फिल्मकार थे। उनकी फिल्मों के सैट बेहद भव्य हुआ करते थे और फिल्मांकन भी आला दर्जे का था। उन्हें निर्देशकों का निर्देशक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वी. शान्ताराम, दामले, मास्टर विनायक, फत्तेलाल और भाली पेंढ़कारकर जैसे कई महत्वपूर्ण फिल्मकार बाबूराव पेंटर के सानिध्य में रहकर ही आगे बढ़े। दादा साहब फालके और बाबूराव पेंटर की फिल्मों में बड़ा भारी अन्तर था। फालके जहां सिर्फ धार्मिक और पौराणिक विषयों पर ही फिल्म बनाते थे, वहीं पेंटर ने ऐतिहासिक कथानकों को भी अपनी फिल्मों का विशय बनाया और इस तरह उन्होंने व्यावसायिक सिनेमा की तरफ कदम बढ़ाया। मूक फिल्मों के दौर में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी द्वारा बनाई गई अन्तिम फिल्म महारथी कर्ण थी, जिसे दामले और फत्तेलाल ने निर्देशित किया था।

 वर्ष 1913 से लेकर 1933 तक मूक फिल्मों के उस दौर में 1250 से कुछ अधिक फिल्मों का निर्माण हुआ इस दौर की एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि फिल्म निर्माण का काम कम्पनियां करती थीं। आज की तरह फ्री लांस प्रणाली का जमाना नहीं था। हर फिल्म एक परिवार की तरह होती थी। फिल्म निर्माण के दौरान ध्वनि का प्रयोग नहीं होने से काम फुर्ती से होता था और निर्देशक, नायिका तथा नायक सभी श्रम से काम करते थे। संवादों का काम परदे पर सब टाइटल लिखकर चलाया जाता था। फिल्मों के शीर्षक भी दो-तीन भाषाओं में रखे जाते थे।



(दृश्य-श्रव्य जनसंचार प्रविधि से साभार)



प्रस्तुतकर्ता सागर पर Monday, April 05, 2010

8 comments:

  1. बहुत बढ़िया लगा यह लेख शुक्रिया

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  2. accha kaam kar rahe ho...internet par hindi mein infomation bahut kam hai khas taur se filmon jaise vishay par. congrats

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  3. ज्ञान की गंगा बहते चलो....

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  4. जय हो!!..बड़ी सुरीली और मन-भावन कथा चल रही है महराज!!ऐसे ही (सिनेमा)भक्ति-सरिता बहाते रहें..हम भक्तजन भी कथा पूर्ण करा कर आरती के बाद प्रसाद पा कर ही जावेंगे..
    तब तक....हर-हर महादेव!! :-)

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  5. ये तो राजकुमार केसवानी जी की बाते लगती है... वे ऐसे किस्से छांट छांट कर लाते है..

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  6. 'सोचालय' का तनिक 'सूचनालय' बनना भी ठीक लग रहा है ! पूजा जी की बात सही है, हिन्दी में जरूरत है ऐसी सूचनाओं की ! आभार ।

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  7. इसके लिये तो हम खाली अच्छी कह देते हैं!

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  8. punjabi ch hona chahida

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