Wednesday, November 10, 2010

तालमेल

मलिन आत्मा ने अपनी केंचुल उतारी, ड्रेसिंग टेबल के दराज़ में पड़ी कुंवारी काज़ल की डिबिया से सपनो का काजल निकाल अपने आँखों में लगा लिया. अब दुनिया वैसी नहीं थी जैसी पिछली रात थी. स्याह काली.  मुस्कुराकर वस्तुओं को देखना आ गया था. किसी की बात शांत चित्त से सुनता. इन्द्रियों के गुण दुनिया में फिर से सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक लगने लगा था. छूना, देखना, महसूस करना, सुनना इन सब प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए रोमांच हो उठता था. मौसम के साथ यह बदलाव सुखद था. रही सही कसर तब पूरी हो गयी जब हथेली से पतली परत हटा कर प्रार्थना के नदी में बिना तैराक हुए कूद पड़ा और तलहथी से जा लगा. पर शरीर अभी एक पानी में फूला हुआ लाश नहीं था जो तली से टकराने के बाद गेंद के तरह नदी के सतह पर जा जाता.

इस नदी में समर्पण था, अपनी रूह ईश्वर के नाम कर देने का. क्षण -क्षण प्रतिपल रोमांच का अनुभव करते हुए स्वयं को हवाले करने का. आँखों में आंसू थे, रहस्यमयी साक्षात्कार के जिससे लगता पवित्र हाथ आत्मा पर हाथ फेर रही हो और कांटें गिलहरी के त्वचा में बदलती जा रही हो. परिवर्तन संसार का नियम है यह गीता में उसने पढ़ रखा था लेकिन यहाँ स्वयं से साथ घटित होता देख विस्मयकारी अनुभव था. 

यह सुख का क्षण था जिसे संत परम आनंद कहते थे. एक गुज़ारा हुआ सुख और भी था जिसे जिंदगी कहते हैं. जिंदगी इसे भी कहते हैं किसी एकाकी पल में लेकिन अभी यह आत्मा की अभिव्यक्ति थी तब जीवन की अभिव्यक्ति थी.

नाभिक पर दोनों तरफ से जोर पड़ने पर शक्तियां बराबर बंट रही थी जिस एक पर पहले गुरूर था वो समय के साथ क्षीण पड़ता जा रहा था. यह दबाव नहीं था पर यह होना था और इस यज्ञ के आवाहन के लिए ही आत्मा ने प्रार्थना की नदी में छलांग लगायी थी. फिलहाल यह सोचना नहीं है कि पहली शक्ति के चले जाने से प्रलय आ जायेगा तो  निर्वाह कैसे होगा. आत्मा उदार हो चला था. वह स्वार्थ छोड़ दूसरे (हुए, अपने ) के लिए विनती करने लगा था. कुछ देर के लिए उसमें माँ का अंश आता तो कभी वो परम पालक पिता बन जाता. लेकिन यह सब अंतरतम में ही घटित हुआ जा रहा था. सम्बन्ध के संबोधन के आधार पर वो माँ था, ना पिता. 

शरीर से कपडे उतारे जा रहे थे. कपडे लेने वाला समय था. चीर - हरण हो तो रहा था पर इसकी सहमति देनी ही थी. इस प्रथा में कर्त्तव्य निर्वहन और सामाजिक रीत जैसे बड़े बड़े शब्द थे.

घर से निकल कर जब भी शरीर भारमुक्त अनुभव करता है शरीर सात्विकता छोड़ फिर से रक्तस्नान करना चाहता है. जिसकी धारा गर्म हो उबलती हुई, जिंदगी सी.

7 comments:

  1. यहाँ, उस आत्मा वाले शरीर का इहलोक में संबोधन 'भईया' है और यह पोस्ट उसी की नज़र से

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  2. Badee gahan post likhee hai...! Padhte hue doob-see gayee.

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  3. शरीर बदलाव की कल्पना और उस पर सशक्त पोस्ट लिख पाना आपके बस की ही बात है। कई लोगों की रूह तो कल्पना में ही काँप जाती है। विचारों में और गहरी डुबकी लगाईये औऱ चिन्तन-रत्न निकाल कर लाइये।

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  4. ऐसा ही कुछ कही और भी पढ़ चुका हूँ.. थोट लगभग समान है..

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  5. कुछः रहस्यमयी सा...जो महसूस होता है अगले क्षण हाथ से फिसल जाता है...

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  6. इसे पढ़ते हुए लगता है कि "बल्ड बाथ" और "फुल मून" जैसे प्रतीक मनुष्य के भीतरी है. उनका किसी रंग और तिथि से कोई संबन्ध नहीं है. ये उजास और रक्ताभ... शांति और विद्रोह के प्रतीक है. सागर सागर वाह !

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  7. 'एक गुज़ारा हुआ सुख और भी था जिसे जिंदगी कहते हैं'
    सागर...तुम्हारी परिभाषाएं...तुम्हारी सीमाएं क्या हैं? हैं भी क्या?

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