Friday, November 25, 2011

घंटी


चार बजे स्कूल की घंटी बजती है। इसको बजते बहुत कम बच्चों ने देखा है। कुछ उन बच्चों ने जिन्हें मास्टर जी की क्यास निहायत ऊबाउ लगता है, जो अपनी कक्षा में 92 की वल्र्ड कप के हीरो इमरान खान की बात नहीं करते। कुछ उन बच्चों ने जिन्होंने सबक नहीं बनाया हो, अपना नंबर आता देख 3ः55 पर रोनी सूरत बना कर हाथ की कानी उंगली उठा देता, कुछ उन लड़कों ने जिनके लिए पढ़ाई मायने नहीं रखती, कंठ फूट रहा हो, बगलों पर मुलायम बाल आने शुरू हुए हों और रात को स्वप्नदोष की बातें जब अपने दोस्तों को बताए तो साथी नफरत से पेश आते हुए उसे सही जगह उपयोग करने की राय दे।

स्कूल के पीछे की गली में बहता अविरल पेशाब महकता रहता और कुछ चार चार साल से अपनी ही कक्षा में जमे बच्चे अपनी-अपनी वाली को (जो कि कोई एक हो तय नहीं था) यथा संभव चूम रहे होते। 

वक्त के उन कीमती पलों को आज जिसने भी संजो कर रखा है उस माहौल और उस गंध की तलाश में आज भी मारा मारा फिर रहा है। 

वैसे कई बच्चों ने घंटी को गौर से नहीं देखा था। घंटी उनके लिए एक आनंद की लड़ी थी। बिना देखे वो कल्पना कर लेते कि लोहे का दो मोटा लंबा सा छेद वाला राॅड है जिसमें एक और लोहे का राॅड फंस इधर उधर टकराता है और स्कूल के कोलाहल को तोड़ता हुआ कैम्पस में एक अलग ही सुरलहरी छेड़ता है। इस छुट्टी से कई काम जुड़े होते। यों कहें कि सारे काम इसी छुट्टी से जुड़ते थे। आइसक्रीम वाले के पास लाइन लगती थी। चार रूपए की दूध वाली क्रीम पैसे होते हुए भी कम बिकती। अठन्नी वाले लाल गुलाबी आइसक्रीम का बोलबाला था। बच्चे ईदगाह की कहानी की तरह एक दूसरे को विश्वास में लेते कि कप वाली आइसक्रीम ! देखने में चूसा हुआ उजला रंग, पिघल भी जल्दी जाती है ऊपर से अलग सा स्वाद। चार रूपए महंगी वाली बात सभी छुपा जाते। सच यह था कि यह उनके सलेबस में ही नहीं था तो जो था उसे सही ठहरा रहे थे। कोई गलती से ध्यान भी दिला देता तो - घर पर तो दूध दही मिल ही जाती है तो क्यों ये मिलावट भरी आइसक्रीम खाई जाए, क्यों मोटू ? मोटू मुफ्त में मिलने वाली संभावनाओं पर पानी नहीं फेरना चाहता सो सहमति में सिर हिला देता साथ ही जोड़ता - परसों अखिल ने खाया था, बता रहा था कि पेट दर्द होने लगा। अखिल ने च्यूटी काट बताया कि वो मामा जी के जेब से चुराई थी और घर में रख नहीं सकता था उस पैसे को जल्द से जल्द खर्च करना जरूरी था, इसलिए खाई और अंग्रजी का क्वेश्चन आंनसर याद नहीं हुआ (सरे शाम नींद आने से लालटेन पर ही गिरे जा रहे थे) इसलिए पेट दर्द हुआ।

... और बच्चों की दुनिया में किसन चाचा जब गोद में छुटकु को लेकर आइसक्रीम दिलाने आए तभी पहली बार अब्दाल को यह पता चला था कि उसका कौम पाकिस्तान से एक शदीद  किस्म की सिम्पैथी रखता है।

4 comments:

  1. वक्त के उन कीमती पलों को आज जिसने भी संजो कर रखा है उस माहौल और उस गंध की तलाश में आज भी मारा मारा फिर रहा है।

    हमेशा की तरह...बेजोड़ लेखन...गज़ब.

    नीरज

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  2. kya likhte hain aap... main her baar tippani bhale n dun , per padhti hun aur padhati bhi hun

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  3. स्कूल की घंटी को सर्वाधिक दुआयें मिलती होंगी।

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  4. उस गंध की तलाश में आज भी मारा मारा फिर रहा

    केवल एक गहरी साँस और आँखे मूँद ली मैंने

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