Wednesday, July 3, 2013

इ एम आई


मानो जिंदगी एक पज्ज़ल हो, बहुत तनहा हो, और जिम्मेवारी से भार से लदी फदी भी। ऐसे में वह अपने अपने अंतरतम से कनेक्ट हो गया हो। दुनिया के अंदरूनी सतह पर एक दुनिया और चलती है जिससे वह जुड़ गया हो। जहां खामोशी ही प्रश्न हो, चुप्पी ही उत्तर, मौन की बेचैनी हो। खामोशी ही वाक्य विन्यास हो, यही व्याकरण हो। मास्टर ने नंगी पीठ पर कच्चे बांस की लिजलिजाती करची से सटाक दे मारा हो और शर्त यह हो कि उस जगह जहां तिलमिलाते हुए हाथ न पहुंचे वहां नहीं सहलाना हो। 

वह लगातार फोन कर रहा है। मजाज़ का शेर चरितार्थ हो बहुत मुश्किल है उस दुनिया को संवरना, तेरी जुल्फों का पेंचो खम नहीं है। रिवाॅलविंग चेयर पर एक कान से फोन का रिसीवर चिपका हो और दूसरा हाथ हवा में जाने क्या सुलझा रही हो। जीने के कितने पेचीदा गुत्थी हो, मसले रक्तबीज हैं। अपने मसाइल सुझल नहीं रहे, ग्राहकों की वित्तीय समस्या सुलझाई जा रही है।

कि अचानक एक अधिकारी आवाज़ देकर बाॅस के चेंबर में बुलाता है। बाॅस का केबिन? प्राइवेट नौकरी यानि चैबीस घंटे गर्दन पर लटकती सलीब। दिखावे से शरीर से आॅफिस में उपस्थिति के बारह घंटे। प्राईवेट नौकरी की जैसी अपनी एक सरहद है, और आप मानो फौजी। बाकी के बारह घंटे भी मन से ड्यूटी पर। बाॅस अपने केबिन में क्यों बुला सकते हैं। आलम यह है कि नौकरी के लिए सर भी कटा दो तो बाॅस संवेदनहीन होकर बोले - यार इतने सालों के बात बात पर सर कटाई है लेकिन देखो इसे ठीक से सिर कटाना भी नहीं आया। मर गया लेकिन काश हमारे कंपनी के लिए खून भी देता जाता। फिर वो अगले वित्तीय वर्ष में इस बिंदु पर विचार करने के लिए भी कोई कोड आॅफ कंडक्ट लागू करेगा। खैर.... 

वह केबिन में जाता है। मन में एल लाख सवाल है। सिर्फ सवाल ही तो है। उफ सवालों का शोर कितना है? इतना है कि चमड़ी मोटी हो गई है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा के दौर में इमोशन पर काबू रखना एक खास व्यक्तिगत गुण है जो कम्पटीशन सक्सेस रिव्यू सहित अमरीकी प्रबंधन संस्थाओं में तरक्की के लिए पढ़ाया जाता है। यह व्यक्तित्व विकास की सीढ़ी है। बाॅस नायक के शर्ट की तारीफ करता है। नायक बाॅस की बात को ज़ारी रखता है। बाॅस नायक को बैठने को कहता है। यहां से नायक के जुबान का संपर्क उसके दिमाग से कट जाता है। वह सिर्फ शिष्टाचार के नाते धन्यवाद ज्ञापित करता है। लेकिन उसके मन में सवाल वही है 7 क्या अब इस टुच्ची सी नौकरी से भी (अल्लाह माफ करना यही इस वक्त भी भगवान है) हाथ धोना पड़ेगा? 

कि अचानक आने वाला एक एक लम्हा स्लो मोशन में बदल जाता है। अरे ये क्या हुआ ? कैसे हुआ? यह भला हो कैसे सकता है ? क्या कान जो सुन रहा है, दिल उसे समझ भी रहा है? कहीं संघर्ष के नीले सपने उसे दिन दहाड़े सच में नहीं आने लगे? मैं सच्चा हूं या जग झूठा है? यह दृश्य हो भी रहा है या नहीं? 

बाॅस उसे कल से पक्की नौकरी पर रखने का प्रस्ताव रखता है। नायक के अंदर एक उत्तेजना सी उठी है। प्रशांत महासागर के गर्त में समाए किसी ज्वालामुखी में कोई वलवला सा उठा है। काश दिल से भी मैग्मा निकलकर पूरी धरती को पिघलाता हुआ वह देख सकता। यह प्रतिक्रिया व्यक्त कैसे हो? शब्दों में तो संभव नहीं। इस वक्त तो मुठ्ठी इतनी कसी कि दीवार को बारीक बुरादों में बदल दे। लोहे की छड़ चकनाचूर कर दे। गैर इरादती तौर पर मा....द....र.....चो.......द ही बोल दे। और ऐसा बोलते हुए उसकी वाइस उत्तेजना को व्यक्त करते हुए क्रैक हो। लेकिन फिर वही बात..... इमोशन पर कंट्रोल, व्यक्तित्व का विकास। लेकिन दिल तो है न संगो खिश्त....... सो प्रस्ताव सुनकर आंखों में आंसू भर आते हैं। पलकों का दरया छलकने को ही होता है। कपोल सहित गाल फड़कने लगते हैं। मन करता है एक मुक्का टेबल पर दे मारे और कहें - यस! या किसी बाॅलर द्वारा मिडिल स्टंप उखाड़ने पर जैसी प्रतिक्रिया दें और कैमरा उसे रिवांइड मोड में दिखाए। 

हम मध्यमवर्गों के लिए नौकरी यही चीज़ है। देवता। फरिश्ता। खुदा। इसके आगे सब हारे हैं। नतमस्तक हैं। इसी से सभी संभलते और संभाले जाते हैं। यही हमारे लिए अध्यात्म है। इसी से हमारा दुख भी जश्न मनाता है। इसी से हम राजा हैं। इसी से दुनिया चूतिया है। इसी के कोई मां का लाल हमारा कुछ नहीं उखाड़ सकता। यही हमारा हैप्पीनेस है। 

अपने व्यक्तित्व में कितने भी बगावती हों। यहां का बगावत माघ की रात में अंगीठी सेंके जाने बाद उस पर उलटा दिया एक लोटा पानी है।

द परस्यूट आॅफ हैप्पीनेस का यह अंतिम टुकड़ा देख कर उठा हूं। रात के एक बजकर तीन मिनट हो रहे हैं। बेचैनी सी महसूस हो रही है। बाहर बारिश है। ऊंचे लैम्पपोस्ट की गंदलाई रोशनी में बारिश रूई के फाहों सी झर रही है। हथेली पर कुछ बूदें लेता हूं। ये फाहे ठंडी हैं।

फिल्म के क्रेडिट्स उभर रहे हैं। प्रकृति नहीं बदली है, हमारी प्रकृति बदल गई है।

2 comments:

  1. कौन कहता है कि मुनीमों और लालाओं का ज़माना चुक गया। जिंदगी की इ एम आई इतनी तगड़ी है कि बाकी सब दूर की कौड़ी है।

    इ एम आई चुकाने में ही हम दो कौड़ी से भी सस्ते हो गए।

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  2. बिल्कुल सच कहा सागरजी ..इ एम आई चुकाने में ही हम दो कौड़ी से भी सस्ते हो गए .. काफी कुछ हम प्राइवेट सर्विस वालों दर्द बयाँ किया .. बहुत बढ़िया लगा ये लेख।

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