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प्रेम : साँझ की बेकार चिंता



प्रेम बहुत काॅम्पलीकेटेड विषय बना दिया है हमने। या कि प्रेम जटिल ही है? शायद दिल के लगने से कहीं कोई बड़ा वस्तु है प्रेम। हमारी तो भाषा भी बहुत गरीब है कि हम झट किसी अच्छे लगने वाले एहसास को प्रेम का नाम दे देते हैं। क्या कभी हमारे समझ में आएगा प्रेम? बहुत विरोधाभास है। अगर रोज़ प्रेम को लेकर कुछ नया नया या अलग से एहसास या समझ उपजते रहते हैं तो इस तरह को कभी नहीं समझ सकेंगे कि क्या है प्रेम या रोज़ ही समझते रहेंगे। तो क्या अनपढ़ और जाहिल व्यक्ति नहीं करता प्रेम ? क्या उसके प्रेम करने की योग्यता नहीं है? उसके अंदर उस बुद्धि विशेष का अभाव है? वह कैच नहीं कर पाएगा प्रेम की नित नई परिभाषा को ? अब तो कई बार यह भी लगता है कि हमने प्रेम का सतहीकरण और सरलीकरण कर दिया है। कई बार लगता है प्रेम को हमने दूषित कर दिया है। आम आदमी का रंग देने में, ऊपर ही ऊपर इसे सबकी जिंदगी से जोड़ने में। तो क्या प्रेम संबंधों के इतर भी होता है। हम पहाड़ पर बिना किसी के संपर्क में (यहां तक कि प्रकृति भी) रहकर प्रेम में होने का दावा कर सकते हैं या प्रेम पर भाषण दे सकते हैं। समय के साथ प्रेम बस चर्चा करने, पढ़ने, एक टेबल पर एक टाॅपिक भर का डिशक्शन हो गया है।

और हम प्रेम को जानने का कितना दावा भी तो करते हैं। फिर ऐसा भी होता है कि अचानक से कोई पूछ ले कि प्रेम क्या है तो ज़मीन आसमान देखने लगते हैं, एकदम से कोई जवाब नहीं सूझता। 

असल में हम प्रेम कर भी रहे हैं या बौद्धिक चेतना के स्तर पर सिर्फ इसे एक्सप्लोर कर रहे हैं? कहीं यह हमारे सोचने का कंम्फर्ट ज़ोन तो नहीं बन गया है? एक आसान टाॅपिक जो जितना ही डिस्कस किया जा रहा है जीने के स्तर पर वह उतना ही जीवन में गायब है?

हम कहां ढ़ूंढ रहे हैं प्रेम ? सिनेमा स्क्रीन पर रचनात्मक रूप से एडिटेड सीन में? या पत्रिका में छपी किसी प्रेम कहानी में ? क्या मैं यह सही लिख रहा हूं? क्या मैं इस पर प्रश्न उठा कर ठीक कर रहा हूं? मतलब क्या मेरा सवाल जायज है?

हम सब अपने अपने - अपने तरीके से प्रेम को समझने की कोशिश करते हैं? लेकिन मुझे लगता है आज यह हमारे बैठारी का रोग हो गया है। प्रेम की विवेचना मात्र एक बौद्धिक खुराक बनकर रह गई है। अकेले में चिंतन करने योग्य सब्जेक्ट। जीने से कोसों दूर, रिश्तों में नदारद। अपने अकेलेपन में हम इस किताब का पन्ना पलट रहे हैं। जैसे नैतिकशास्त्र होता है, किसी को धोखा न देना, रिश्वत न लेना, झूठ न बोलना वगैरह.....

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  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सबकी पहचान है , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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