Friday, November 13, 2015

एक भारी शाम का हाले दिल




अपने दामन में जाने कितने दुख दबा रखे हैं आज आसमान ने कि मटमैला दिख रहा है। भादो महीने के गंगा नदी के मटमैले पानी की तरह जिसके सैलाब में ढेर सारे गति रोकने वाले पेड़ अपने जड़ समेट बह जाते हैं।

लेकिन बादलों में बहाव नहीं है। इसलिए आसमान ठहरी हुई है। अपनी जगह हल्की लाल बुझते बालू की तरह। भारी। और शामों के मुकाबले सर पर ज्यादा झुकी हुई। औसत गीलेपन से ज्यादा भीगे स्पंज की तरह। एक हज़ार चोट सहे हैं और सौ बात छुपाए तो एक और ही सही।

जो मन भारी है तो इस बात कि क्यों आए दिन बताना पड़ता है। क्यों हर बार अपनी ईमानदारी साबित करनी पड़ती है। रिश्ता सिमटता है तो उसका नाम प्रेम पड़ जाता है। यह मनी प्लांट है, फैलती लत्तरों जैसा। एक पत्ते से पेड़ सकता है और पेड़ से वापस एक पत्ते के रूप में अलग हो सकता है।

इंडिया हैबिटैट सेंटर की वह शाम हसीन थी। सर्दी अभी आई न थी और गर्मी जा रही थी। शाम दो मौसिमों के मिलने और बिछड़ने का जंक्शन था। मैं गर्मी के रूप में अपने दिल में उमस भरे उससे मिलने आया था। और वो जैसलमेर के खुले आसमान तले औंधी लेटी रेत के ठंढे धोरों की तरह। मेरी बड़ी से बड़ी चिंता उसके हंसी के आगे धूल थी। जिन बातों और हादसों से मैं सिगरेट के कश पर कश खींच कर अपने दिल को जलाता था वह अपनी आंखों के पोर में काजल की लकीर खींच कर, अपने गाल पर झूलती लट को बार बार कान के पीछे ले जाती। 

जिंदगी के जेल में मुलाकाती का समय तय था। वस्ल का वक्त, तवे पर पिघलते मख्खन सा था। उसका कागजी दुपट्टा भी तो ऐसा ही था। हाथ से निकल निकल जाता था। कुछ लम्हा जब वो मेरी मुठ्ठी में रहता तो पसीने से हाथ गीले हो जाते और लगता पटना में कोई रंगीन सिनेमा देख रहा हूं और हाथ में उस फिल्म का टिकट भीग कर गल रहा है।

मैं कई बार अपने दायीं हाथ को उसका हाथ मानकर पकड़ता हूं। अपनी कलाई पर उसकी उंगलियां टटोलता हूं। अपनी ही कलाई को उसकी मानकर उसे चूमता हूं। क्या वह अपने पिंजड़ों पर मेरे तर्जनी उंगली से ठक-ठक करने की आवाज़ नहीं सुनाई देती होगी? लाख चाहकर भी दो जिस्म एक जान नहीं हुआ जा सकता। 

उसकी हंसी ने मेरे सीने पर दांत गड़ाए हैं। मुझे उसकी हंसी से कटना अच्छा लगता है। वह किसी और की है इस ईर्ष्या के मारे जलता मैं, अपना बहता लहू देखकर संतुष्टि से भर जाता हूं। 

विरह में जलना अच्छी अनुभूति है। यह पाप करने के बाद पश्चाताप करने की तरह है। अपने अंदर देवत्व पाने जैसा है। फिल्टर होने की तरह है। औरों से कुछ अलग महसूसियत रखने जैसा है।

क्या मैं अपनी पलकें उलट कर तुम्हारे माथे पर रख दूं रानी !

हंस दो जो तुम अगर तो आसमान में ठहरे इन बादलों में बहाव आए। 

Thursday, November 5, 2015

माचिस की सुग्गा नाक पर का मसाला



गुस्साती है वह तो जैसे आम के मीठका अचार से चाशनी सूख जाती है
पूरी जल चुकने के बाद काठ पर खत्म हुई मोमबत्ती बैठ जाती है।
छेड़ते जाओ उसको हर मुलायम परत उघड़ती है।
मुंह फुलाना भी उसका मेरी उंगलियों को मुलायम बनाता
है
उसके गुस्से की ज़रा ज़रा कागजी चुप्पी मेरे दिल पर पैठ जाती है।

देर तक काबिज रहता है पोरों पर वह एहसास मोम का 
मैं लाख जतन करता हूं मनाने का उसको
त्यौरियां तब थोड़ी और चढ़ आती है
ज़रा सा वह और हसीन हो जाती है
मैं ख्याल करता हूं कि मुझे उसका अधखुला सीना दिखता है
कई बातों को जब्त किए जो ऊपर नीचे होता रहता है
उस वादी से अनकहे शिकवों का धुंआ उठता रहता है

मैं शब्द तलाशता रहता हूं बोलने को फिर से उससे
वह देर तक बात बनने नहीं देती है
चाहता हूं समय के प्रेशर कुकर में प्रेम की दाल गले 
मगर वह गलने नहीं देती है

हाथ रखूं हाथ पर उसके झटक देती है
नीचे झुक कर जो उसकी आंखों में झांकूं तो मुंह फेर लेती है
उसे मनाने के लिए मैं नए सिरे से कोई बात उठाता हूं 
और उसके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश करता हूं
जानती है वह शायद ये भी 
कि मेरी हथेली के स्पर्श से उसके अंदर का गुस्सा थमने को होगा
मैं गुस्से की लौ उसकी जितना कम करना चाहता हूं 
रास वह अपनी नाराज़गी की और ऊंची किए जाती है।

दिन बीतने को है।
उसकी चुप्पी कायम है
और मेरा दिल......
गुलाब के कांटों में फंसकर फट गए दुपट्टे सा फड़फड़ा रहा है।

Friends

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