Thursday, November 5, 2015

माचिस की सुग्गा नाक पर का मसाला



गुस्साती है वह तो जैसे आम के मीठका अचार से चाशनी सूख जाती है
पूरी जल चुकने के बाद काठ पर खत्म हुई मोमबत्ती बैठ जाती है।
छेड़ते जाओ उसको हर मुलायम परत उघड़ती है।
मुंह फुलाना भी उसका मेरी उंगलियों को मुलायम बनाता
है
उसके गुस्से की ज़रा ज़रा कागजी चुप्पी मेरे दिल पर पैठ जाती है।

देर तक काबिज रहता है पोरों पर वह एहसास मोम का 
मैं लाख जतन करता हूं मनाने का उसको
त्यौरियां तब थोड़ी और चढ़ आती है
ज़रा सा वह और हसीन हो जाती है
मैं ख्याल करता हूं कि मुझे उसका अधखुला सीना दिखता है
कई बातों को जब्त किए जो ऊपर नीचे होता रहता है
उस वादी से अनकहे शिकवों का धुंआ उठता रहता है

मैं शब्द तलाशता रहता हूं बोलने को फिर से उससे
वह देर तक बात बनने नहीं देती है
चाहता हूं समय के प्रेशर कुकर में प्रेम की दाल गले 
मगर वह गलने नहीं देती है

हाथ रखूं हाथ पर उसके झटक देती है
नीचे झुक कर जो उसकी आंखों में झांकूं तो मुंह फेर लेती है
उसे मनाने के लिए मैं नए सिरे से कोई बात उठाता हूं 
और उसके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश करता हूं
जानती है वह शायद ये भी 
कि मेरी हथेली के स्पर्श से उसके अंदर का गुस्सा थमने को होगा
मैं गुस्से की लौ उसकी जितना कम करना चाहता हूं 
रास वह अपनी नाराज़गी की और ऊंची किए जाती है।

दिन बीतने को है।
उसकी चुप्पी कायम है
और मेरा दिल......
गुलाब के कांटों में फंसकर फट गए दुपट्टे सा फड़फड़ा रहा है।

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