Thursday, September 10, 2009

सायलेंस..... एक्शन



"ऐसा क्यों होता है कि कभी मन कुछ नहीं करने का करता है, जिस चीज़ का इंतज़ार बरसों के करते रहते है वो मिल जाने पर उतनी ख़ुशी नहीं रहती?.. ऐसा क्यों होता है की कभी- कभी हर चीज़ से उब जाते है हम... बेवज़ह की थकन क्यों रहती है... मन बहलाने घर से निकलो तो क्यों सर दर्द वापस लिए लौटते हैं... क्यों ऐसा होता है की कोई कितना भी उकसाए उठकर चलने का हौसला नहीं होता... क्यों लगता है कभी-कभी की जो है वो बीता जा रहा है और उसका मुझे कोई मलाल नहीं है,"
... अंजू यह दार्शनिकता भरी बात शून्य में निर्विकार, अपलक देखते कहती है... "तुमने कभी किसी को बर्बाद होते देखा है ? मैं खामोश हूँ...

"जानते हो! मैं जिंदगी में अच्छा कर सकती थी पर एक मोड़ पर मैंने ऐसा महसूस किया जितना बेहतर मैं बर्बाद हो सकती हूँ शायद बन नहीं सकती... तुम जिंदगी के ऐसे ही मोड़ पर मिले; जहाँ मैंने तुम्हारा साथ सिर्फ इसलिए पड़का क्योंकि तुम बिछड़ने वालों के कतार में सबसे अव्वल नज़र आते हो..."

" बह जाने दो ना यह दुनिया, भाड़ में जाए, एक पल में यह झंझट ख़तम... जिसे यह इत्मीनान हो, जो अपने सारे चीजों से संतोष कर ले, फिर भी बेबस ना हो इस स्थिति को को क्या कहते हैं सागर ? कभी समझा है की इस छोटे से गुल्लक को जितनी जतन से धीरे-धीरे हम भरते हैं, कभी कितना विच्छिन्न होकर तोड़ देते हैं..."

कंधे पर सर रख्खे अंजू मुझसे कहती है... बाल, तेल से तर हैं... और मालिश के बाइस मांग का पता नहीं चल रहा... कॉटन के कुरते की ३ बटन खुली हुई है. सुनहला रंग का लोकेट जो पानी से मुसलसल भीगने के बाइस धूसर हो चली है गले में कुरते के बाहर झूल रही है... यदा-कदा अपना सर उठा कर फिर से वो सर मेरे कंधे पर रख देती है, इससे लोकेट के झूलने की रफ्तार बढ़ जाती है, जिसमें मेरे बचपन का फोटो लगा है, जो मुझे उस वक़्त झूला झूलने का आभाष देता है... जिसके सहारे मैं वहां से सरकता हुआ अपने बचपन में चला जाता हूँ... अकेले झूला झूलने वाले दिनों में... ... वो बात का रुख पलटती है... या शायद जोड़ती है ...
"बचपन में, नहीं बचपन में नहीं आज तक... जब में पानी में अपनी बनायीं हुई जहाज़ डालती हूँ तो वो ज्यादा देर नहीं तैर पाता... उसकी बुनियाद में कोई खोट है मुझे ऐसा नहीं लगता लेकिन वो पलट जाती है... तुम्हें पाता नहीं है अपने जहाज़ को संतोष से डूबता देखने सा सुख... उस वक़्त लगता है जैसे यह जहाज सिर्फ एक लाश हो और मेरे बदन को ढो कर ले जा रहा हो... और में पूरे होशो-हवास में ऐसा होने देर रही हूँ... शायद उस पार कोई ठौर हो जो शाश्वत हो... "

झूले की गति धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही है, लेकिन वो अपने पूरे रौ में बहे जा रही है... उसके बालों में लगा तेल मेरे कुरते को दागदार कर चुका है... साथ ही एक अदृश्य लेकिन सूनी पगडण्डी पर अनुसाशित आंसू निर्विकार बहे जा रहे हैं जहाँ न कोई आवेग है, ना किसी बात की खीझ, किसी बात का ग़म नहीं... मेरा सीना उस तेल से दागदार हो गया है, साथ ही, उसके आंसू मिलकर एक जुदा सी महक बिखेर रही है... वह उस वक़्त वैसे ही बोल रही है जैसे किसी महात्मा को बरसों की तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हो गयी हो... या फिर उस प्रेमी की तरह जिसे यह अहसास हो गया हो कि मैं इस लड़की के साथ ज़ुल्म कर रहा हूँ, यह मेरे बिना ज्यादा खुश रहेगी... इसकी दुनिया कहीं और है लेकिन बस किसी वादे को पूरा करने के लिए यह मेरे साथ बनी हुई है...

सूरज अपना सोना पिघलाकर अँधेरे कि ओट में जा चुका है... वो सिमट कर मेरे और करीब आना चाहती है... लेकिन मेरा शरीर बीच में आड़े जाता है... वो कहती है-

"मैं एक आत्मा हूँ, तुम भी बन जाओ; मैं तुमसे आज तक नहीं मिली... पर मिलना चाहती हूँ... तुमसे... तुमसे... सागर, तुम समझते हो ना तुमसे मिलने का अर्थ क्या हो सकता है... चलो वहां मिलते है आज रात जहाँ शरीर बाधक नहीं बनता हो...

मैं उसके सर पर हौले से थपकियाँ देता हूँ वह मेरे कंधे से सर उठाती है फिर बुरी तरह से फट पड़ती है... नारियल के पत्ते जो बराबर दूरी पर जो ब्लेड से कतरे हुए लगते हैं.. उनसे चाँद झांक रहा है... एक शीतल पवन छू कर गुज़रती है... वो पत्तों का झुंड एक साथ टकराता है... बारिश जैसी आवाज़ आती है उससे... मेरा पसीना टपकता है... उजले बादल आकाश के एक कोने से उठने लगते हैं... मैं सोच रहा हूँ...

... उफ़! कितना कुछ घटता रहता है एक साथ... सायलेंस... एक्शन!

10 comments:

  1. एक संवेदनशील रचना ..लेकिन इसका कोई छोर नही ...अंत नही ,सूत्र कहाँसे पकडें? या कहाँ छोड़ दें? ...याकि क्रमशः है ?

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  2. कैसे मैनेज कर लेते हैं आप ये दो-दो ब्लौग और वो भी एक जैसी शिद्दत से....

    शब्द, वाक्य-विन्यास और शैली मन की परतों को छूती हुई!

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  3. behad touching...padh kar mann shaant sa ho gaya

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  4. अपने आप को अभागा क्यों कहते हैं | कल्पनाशील लेखनी है आपकी | हिंदी, उर्दू का ज्ञान भी अच्छा है | कितनो को सरस्वती का ऐसा वरदान प्राप्त है | उस वरदान का सम्मान कीजीये | लिखते रहिये |

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  5. ब्लांग पर बने रहे इसी शुभकामनाओं के साथ दशहरा की जय हो।

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  6. स्तब्ध! नया लेखक कौन कहता है कलम मे दम है बहुत अच्ची रचना है बधाई दीपावली की शुभकामनायें

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  7. Continued from Anurag sir's Blog:

    Veer ki CD Ab bhi chal rahi hai...

    Ab gaan hai...
    Mil ja kahin SAmay se pare.

    Is Gaane aur is Post se shayad kuch zayada hi 'relate kar' raha hoon,
    Aankhon ke aage paniyon ka 'Convex Lens' hate to wapis aaunga...
    Shayad computer ke samne itna nahi baithna chahiye mujhe.

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  8. साहिर साहब का एक शे’र जो भूत बन कर सर पर चढ़ा बैठा है , याद आता रहता है हरदम अटके रिकार्ड की तरह
    चंद कलियाँ निशात की चुन कर,
    मुद्दतों मह्बेयास रहता हूँ
    तुमसे मिलना खुशी की बात सही,
    तुमसे मिल कर उदास रहता हूँ

    क्यों..क्यों परेशान करता है यह शेर इतना..शायद आपकी रचना इसका जवाब दे...मगर कोई जरूरी भी नही है हर चीज का जवाब!!!
    आगे कब लिखोगे..और क्या?

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  9. जबरदस्त..!
    यही वो शब्द होता है ना.. अंतिम पैरा सिरहन पैदा कर गया.. बस शीतल पवन थोडी ओड लगी.. उसकी जगह कोई और वर्ड हो सकता था..

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