Friday, January 22, 2010

दूसरा सिरा कहाँ है !!!


राजू और पिंकी एक नदी के मुहाने पर खड़े हैं जहां से नदी करवट लेती है मतलब कि एक बड़ी घुमावदार मोड़ लेती है। नदी अब तक अपने साथ लाई हुई सारी मिट्टी यहीं छोड़कर आगे दरिया में मिल जाती है। इस कारण यहां डेल्टा बना हुआ है।

नदी के इस फितरत को दार्शनिक अन्दाज से पिंकी निहार रही है। विशाल जलराशि गाद में गिर रही है। पानी ऐसे शोर मचा रही है मानो कोई महागाथा गा रही हो और उसके मुहाने पर खड़ी पिंकी के चेहरे पर कई भाव हैं एक ही पल में जैसे वह उफनते दरिया की हैसियत भी नाप रही है और दूसरे पल प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश भी कर रही है। सम्भव है वो इसे जीवन से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हो।

राजू आदतन पानी में बड़े-बड़े पत्थर मार रहा है। हवा तेज बह रही है। इसके कारण दोनों के बाल हवा में उड़ रहे हैं। एक दूसरे को सुनाने के लिए जोर से बोलना पड़ रहा है। वो मौन है मगर राजू उसकी चुप्पी अपने बड़बोलेपन से बार-बार तोड़ रहा है। राजू और पिंकी एक दूसरे से दस कदम के फासले पर समानान्तर खड़े हैं.


राजू : (जोर से) तुम भी दरिया में पत्थर फेंको।

(पिंकी नहीं सुनती)

राजू : (और जोर से) पिंकी, उठाओ पत्थर

पिंकी : (जैसे महफिल में किसी ने खलल डाला हो) मैं बेकार की बात नहीं सुनती।

राजू : (ताना मारते हुए) अच्छा तो फिर सोचती रहो खड़ी-खड़ी कविता के लिए कोई नया मैटर

(पिंकी कोई जवाब नहीं देती)

पृश्ठभूमि में दरिया का शोर बढ़ता है। मैं पत्थरों के बड़े-बड़े टूकड़ों पर कूद रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे पैरों के निशान उस पर कूदने से सुनाई दें लेकिन आवाज़ नहीं आते। हवा हूम-हूम कर रही है और नदी लगता है जैसे उसके साथ डूऐट गा रही हो।

(थोड़ी देर बाद)

राजू नदी की ओर पैर करके एक पत्थर पर लेटा है। पिंकी के बारे में सोच रहा है कि इसका कुछ नहीं हो सकता। लड़कियां इतनी सोचती क्यों हैं और सोच कर यह क्या कर लेगी फिर घर जाएगी, पढ़ेगी-लिखेगी और खाना पकाएगी...

"राजू ये नदी हमें खुद पार करनी पड़ेगी"!

पहले राजू को लगता है पिंकी उसके ख्यालों में बोल रही है

पिंकी : (चीख कर) हमें ये नदी खुद पार करनी पड़ेगी

राजू डर कर उठ बैठता है

राजू : तो फिर इतनी विशाल जलराशि .. ये जो है... ये किसलिए है

(राजू लगातार बोलता जाता है )

क्या है इसका औचित्य, क्यों है ये, ये नहीं होती तो कितना अच्छा था, ये शोर नहीं होता, सुनो! देखो! कितना परेशान किए हुए है ये हमें बात नहीं करने देती हमारे बीच व्यावधान उत्पन्न करती है। कोई काम नहीं करने देती। उल्टे जब हम किसी बड़े मिशन के लिए तैयार होते हैं तो न साथ देती है न चुप रहती है सिर्फ समस्याएं पैदा करती हैं। क्यों है ये, क्यों है ये आखिर हमारे बीच

पिंकी : ये भीड़ है। बहुत समझदार होती है यह। कुचल कर चलना जानती है और अगर सफल हुए तो माथे पर बिठाना भी। इस बीच यह सिर्फ बोलती है, मुश्किलें खड़ी करती है। यह तुम्हारे साथ रहती दिखती है... जब तक तुम्हारे साथ खतरा ना हो, खरते का अंदेशा होते ही यह ...

(पिंकी का ध्यान टूटता है)

राजू देखो उस पार कितनी शांति है।

...राजू और पिंकी स्वर्ग को अपनी आंखों से देखने लगते हैं।

7 comments:

  1. उस पार की शांति और उस पार के स्वर्ग का नजारा दोनों ही मन को लुभाते हैं ..पर बीच में उफनती दुनिया का दरिया जैसा शोर और खतरा .इसको बहुत करीब से उकेर दिया है आपने अपने लफ़्ज़ों से ...कई बार बहुत साधारण सी बात बहुत मायने दे जाती है ...शुक्रिया

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  2. हां जीवन भी तो एक ऐसा ही दरिया है. उफ़नता हुआ, हूम-हूम करता, जिसे हमें खुद ही पार करना है. बहुत सुन्दर.

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  3. नाटकीयता का प्रतिशत ज्यादा लगता है .. पिंकी की कविता लिखने वाली बात नयी नहीं लगती..
    एक थोट " राजू ये नदी हमें खुद पार करनी पड़ेगी" को ही बढाया है..

    वैसे राजू और पिंकी का रिलेशन पाठक पर छोड़ के अच्छा किया.. वे दोनों दोस्त भी हो सकते है भाई बहन भी या प्रेमी युगल भी... हवा और नदी का डूऐट बढ़िया है..

    ओवर आल गुंजाईश बनती है

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  4. यार जैसा मुझे लगा तो कहानी और स्क्रिप्ट के बीच कन्फ़्यूज सी हो गयी यह रचना..मगर अंत प्रभावी है..अधूरा रह कर भी विस्तार करता हुआ सा

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  5. waaah...bahut khoobsoorat, padh kar mann khush ho gaya

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  6. यार जैसा मुझे लगा तो कहानी और स्क्रिप्ट के बीच कन्फ़्यूज सी हो गयी यह रचना..मगर अंत प्रभावी है..अधूरा रह कर भी विस्तार करता हुआ सा

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