Wednesday, March 3, 2010

सन्नाटे... बोलते हैं


सीने के दोनों दरवाजे खुलते हैं, वो 16 x 12 का एक कमरा होता है... लेकिन खाली. वहां कोई सेट लगा है, किनारे सीढियाँ हैं वो कहाँ तक जाती हैं, नहीं मालूम. मैं उस स्टेज पर अकेला खड़ा परफोर्म कर रहा हूँ. या तो वो बिलकुल खोखला है इतना की मुझे पलकें झपकने तक की आवाज़ सुनाई देती है और संवाद बोलने के लिए खोले गए होंठ की भी (ऐसा मेरा भ्रम है) . मुझे हमेशा लगता है की अब उस सीढ़ी से कोई उतरेगा और मेरा साथ देगा या कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा. मैं निरुद्देश्य...इस कोने से उस कोने तक घूमता हूँ.

दरअसल मैं इन दिनों एक बीमारी का शिकार हो गया हूँ. मेरा अंदेशा इतना मजबूत हो चला है की मुझे सीढियों के मध्य हर 2-3 मिनट बाद देखने की आदत हो गयी है. डॉक्टर इसे एहसास या ज़ज्बात जैसी किसी मनोविज्ञान से जोड़ देते हैं.

इसका मतलब मैं थोडा-थोडा पागल हो रहा हूँ. मेरी ऐसी आदतों के कारण मैं किसी चीज़ पर एकाग्र नहीं हो पा रहा.

मैं थोड़ी-थोड़ी देर बाद स्टेज पर टहलता हुए कुछ सोचता रहता हूँ. असल में इन दिनों मैं सिर्फ सोचता हूँ और 24 घंटे के दौरान सिर्फ सोच कर थक जाता हूँ. सोचते-सोचते मुझे गर्मी लगने लगती है. मुझे लगता है मैंने भरी गर्मी की दोपहर में भूनी हुई मछली खाई है और उसके कांटे मेरे पीठ पर उग आये हैं.

मुझे इन दिनों किसी मीठे हमसफ़र की भी जरुरत महसूस होती है जो सधी हुई भाषा बोले और मेरे पीठ पर अपने हाथ फेरे जिससे मेरे पीठ पर के सारे कांटे मुलायम हो जाएँ और मैं बिस्तर से लग कर चैन से 2 घंटे सो सकूँ. मैं उस हैरानी को महसूस करना चाहता हूँ की कांटे गायब होने पर कैसा लगता है. मुझे लगता है तब मेरा डर खत्म हो जायेगा और तब मैं एवरेस्ट से उल्टा कूद सकूंगा.

... पता नहीं यह सब सोचने के दौरान मैंने कितनी बात अँधेरे से आती सीढियों के मध्य देखा होगा!!!

बस बार-बार देख ही रहा हूँ, आ कोई नहीं रहा.

मेरी सांस पर कोई बड़ा सा पत्थर रखा है . मुझे बार-बार आकाश देखने की भी आदत हो गयी है. मेरे दिमाग में मोटी-मोटी गिरहों वाली कई गांठें हो गई हैं. ये बहुत शोर करती है और खलल डालती हैं.

मुझे लगता है मैं आत्मघाती हूँ. मुझे लगता है मौत मेरा गिरेबान पकड़ कर ...मैं अपने अंदर कोई बम लिए घूम रहा हूँ जिसके फटने का समय फिक्स कर दिया गया है लेकिन मुझे बताया नहीं गया है. ये घडी मुझे जोर-जोर बजती सुनाई देती है. हरेक टिक-टिक मुझे इतिहास में आधी रात के समय राजाओं के द्वार पर न्याय के गुहार के लिए बजाया गया घंटा लगता है. कभी भी... मेरे चीथड़े उड़ सकते हैं.

हो सकता है मैं किसी दिन आप सब के बीच से बातें करते हुए गायब हो जाऊं.

क्या मेरा तब कोई अवशेष बचेगा ?...

क्या मैं अपने अंदर समाधि नहीं ले सकता ?

सीढियों से अब भी कोई उतरने वाला है.

...

..

. पर अब तक कोई नहीं आया.

10 comments:

  1. wah!..kya likhte hain aap ..kisi muktibodh ki yad aa gayee

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  2. Padhte,padhate raungte khade ho gaye!

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  3. teri aawaaj men jab sannate bolte hain, wo us pe apne kaan rakh deti hai...

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  4. मुझे लगता है कि अर्थ का अनर्थ हो सकता है,
    यहाँ पर
    "सीने के दोनों दरवाजे खुलते हैं"
    यहाँ "जीने" है।
    भैया अगर "जीने" है तो थोडा संभलकर लिखो मैं ने सीने के साथ भी लेख को बिठाकर देखा, मगर नहीं बैठा...
    ध्यान से सागर रूमानियत में व्यवहारिकता को न भूलो...

    ये पंक्तियां मुझे अच्छी लगीं...
    "मुझे लगता है मैंने भरी गर्मी की दोपहर में भूनी हुई मछली खाई है और उसके कांटे मेरे पीठ पर उग आये हैं."


    सबसे गुस्से की बात कि अगर मैं सही हूँ तो कमेन्ट में किसी ने यह बात नहीं रखी...कि "सीने" है कि "जीने"

    Nishant kaushik

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  5. मैं अपने अंदर कोई बम लिए घूम रहा हूँ जिसके फटने का समय फिक्स कर दिया गया है लेकिन मुझे बताया नहीं गया है. ये घडी मुझे जोर-जोर बजती सुनाई देती है. हरेक टिक-टिक मुझे इतिहास में आधी रात के समय राजाओं के द्वार पर न्याय के गुहार के लिए बजाया गया घंटा लगता है. कभी भी... मेरे चीथड़े उड़ सकते हैं.
    WoW!!!!

    &
    निशान्त जी आपको जो लग रहा है वो हमें नहीं लग रहा...

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  6. @निशांत
    मैंने संभल कर लिखा है भाई, यहाँ सीने ही हैं

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  7. सीना ही होगा.. क्योंकि सीने में ही द्वन्द चलता रहता है खुद का अपने आप से.. शायद नायक के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है.. एक उलझे हुए व्यक्ति की पीड़ा को धारधार शब्द दिए है.. फिर चाहे वो पींठ पर कांटे हो या सांस पर पत्थर.. मेरी तरफ से सौ नंबर ले लों..

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  8. chalo bhai...kush kee hi bhasha me....tumhare dil me aur mere dimaag me dwand chal raha hai....maaf karna... "seene" hi sahi

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  9. bhai mujhe nhi pata ki seene hain ya jeene hain.... par jo bhi ho mast likha hai aapne

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  10. भई निशांत जी की बात भी ध्यान देने योग्य है..वैसे तो सीने का प्रयोग एक्दम बिंदास है..मगर यदि स्क्रिप्ट लिख रहे हैं जिसके मुताबिक सेट की सर्जना करनी पड़ती है तो सीने के यह दरवाजे जो मेरे ख्याल से कुछ अमूर्तन उआ ’अब्स्ट्रैक्ट’ सी चीज है..कुछ दुविधा पैदा करती लगती है..(हालाँकि पहले भी ’थिएटर ऑफ़ अब्सर्ड’ इन सारे प्रचलन और परंपरावाद को प्रयोगों के माध्यम से चुनौती देने की कवायद रही है) मगर देख लेना..हाँ ’सीना’ किसी अन्य अर्थ मे प्रयोग किया गया हो तो स्पष्ट करना...वैसे सीने का १६x१२ का कमरा सिर्फ़ ’बड़े दिल वाले’ सागर साहब की दिमागी उपज हो सकती है..उसमे भी दो दर्वाजे..शक पैदा करते हैं (कोई पिछ्ला दरवाजा तो नही है भई?)
    पीठ के काँटे जब्र्दस्त हैं..सो ही खुद मे समाधि लेने की बात...बाकी सारी चीजों की तरह..और हर २-३ मिनट पर सीढियों पर झाँकना नासिर साहब की याद दिलाता है..ओ कुछ ऐसा तसव्वुर करते थे..
    ध्यान की सीढियों पे पिछले पहर
    कोई चुपके से पांव रखता है

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