Thursday, March 11, 2010

एक दृश्य !!!!!




रवि भरपूर नींद सो कर उठा है. बीती रात वो बहुत तनाव में सोया था, ढेर सारी बातें अपने मन में लिए. उसे उम्मीद थी की आज उसे नींद नहीं आएगी... यों वो पहले एक आध फिल्म देख कर सोना चाहता था पर ऐसा हो ना सका... रात ग्यारह बजे से सुबह के दस बजे तक सोता रहा. उठते ही पिछली रात को याद किया... उफ्फ्फ्फ़ पूरे ग्यारह घंटे....

लेकिन अब एक अजीब शांति है. मन में कोई बात नहीं और किसी चीज़ को वो ना सोच काफी चुप-चुप सा अच्छा महसूस कर रहा है.

उसने फैसला किया है आज कोई काम नहीं करेगा... वो टहलने मरीन ड्राइव पर निकल जाता है.

घडी की सुइयों की आवाज़ उसे अभी भी सुनाई दे रही है. लग रहा है उसने अपनी जिंदगी को दो हिस्सों में बाँट दिया है. एक, आज का दिन जो शांत है, निर्विकार है और जिसे योगीजन परम ध्यानमग्न अवस्था का नाम देते हैं और एक भीड़-भाड़ और शोर-गुल वाली आम दिन वाली जिंदगी.

शाम होने को आई पर उसके ब्रह्मांड में एक शून्य घूम रहा है, नहीं, आज तो पछताने की भी मूड में नहीं है. वो अभी तक एकांत में ही है... लगता है यह बादल आज बरसेंगे. वो नंगे पांव पत्थरों पर चलते-चलते काफी दूर चला आया है. अंधरे में सारी धरती हिल रही है. प्रकृति का यह रूप देखकर वो विह्वल है. आज अपने चाल में उसने वो उछाल भी नहीं दी है. आहट में ना कोई अर्थ भी नहीं. मंथर चाल से बस ... चला जा रहा है.

जिंदगी का यह कोना कितना अच्छा है. ओह ! मैं इसे कोना क्यों कह रहा हूँ यहाँ तो विशालता है. आज जब इसके करीब जा रहा हूँ तो लग रहा है यह मुझे लील ही लेगा. ढेर सारे दृश्य रवि के दिमाग में आने लगे जैसे हिमालय पर संस्कृत भाषा में कोई समूह गान हो रहा हो. वह चाहता है सतयुग में चला जाये, पेड़, पौधों व नदियों को वो कोई नया संबोधन दे.

बहुत सोचकर वो धीरे से पुकारता है प्रिये !

बलखाया दरिया तमाम गुबार लिए उमड़ पड़ता है.


शोर्ट फ्रीज़ हो जाता है.

प्रस्तुतकर्ता सागर पर Thursday, March 11, 2010

9 comments:

  1. बेहतरीन प्रवाह..उम्दा भाव!

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  2. गुलज़ार की नज़्म याद आती है .बुड बुड करता बुढ्ढा दरिया ..........पार्ट एक.........पार्ट.दो

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  3. नये शोर्ट में क्या होगा नहीं मालूम,पर सतयुग में जाने की बात भली भली सी लगी.

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  4. समंदर से कोई भूल हुयी है, रूठे हुए को मनाने के लिए एक लहर आगे बढाता है तो दो पीछे खींच लेता है...सदियों से समंदर उसका इंतज़ार कर रहा है...खफा हुए प्रियतम का...कि वो पुकार ले...लौट आये.

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    बहुत सोचकर वो धीरे से पुकारता है – प्रिये !

    बलखाया दरिया तमाम गुबार लिए उमड़ पड़ता है.

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. ह्म्म..मगध मे कमी नही है ’बेचारों’ की..
    मरीन ड्राइव पर ’विक्टोरिया के इक्के’ ड्राइव करते हुए अनायास वैचारिक खुजली के परिणामतः ध्यान बँट जाना स्वाभाविक है..!!;-)

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  7. आहट में ना कोई अर्थ भी नहीं में से ना या भी नहीं हटा दें.


    हिमालय पर संस्कृत भाषा में कोई समूह गान हो रहा हो.

    कमाल का बिम्ब.
    एक बात (अप्रासंगिक) याद हो आई. कॉमन वेल्थ के लिए जब मशाल ला रहे थे इंडिया...
    इंग्लैंड में अँगरेज़ के बच्चे (जो खुद भी अँगरेज़ ही थे अपने माँ बाप की तरह) सरस्वस्ती वंदन कर रहे थे, संस्कृत में !
    जो शायद हिमालय के अलावा भारत में भी कई और जगह भी बोली जाती है. क्यूँ कभी कभी थोपी चीज़ें अच्छी लगती हैं? जैसे मडोना का साडी पहनना ?

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  8. प्रिये !

    एक शे'र बदलना चाहता हूँ : कौन कहता है की ज्वार बुलाने से नहीं आते , एक नाम तो तबियत से उछालो यारों

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  9. "ढेर सारे दृश्य रवि के दिमाग में आने लगे जैसे हिमालय पर संस्कृत भाषा में कोई समूह गान हो रहा हो. वह चाहता है सतयुग में चला जाये, पेड़, पौधों व नदियों को वो कोई नया संबोधन दे."
    यह दो पंक्तियां पढ़कर एक दूसरा चेहरा बन रहा है आपका ! कई दिनों से कुछ भी न लिख-पढ़ सकने की परेशानियां ऐसी ही प्रविष्टियां लील लेती हैं !
    आभार ।

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