Friday, April 2, 2010

अवचेतन में बजती धुन...


सारंगी की पहली तान महज़ रियाज़ के वास्ते बजी थी यकायक लगा रेखा यानि उमराव जान अवतरित होकर अब तर्ज़ छेड देगी. लेकिन उस्ताद ने ऐसा समां बंधा और लोगों ने ऐसी दाद दी रिहर्सल रूम लाइव कॉन्सर्ट में तब्दील हो गया. उस्ताद शेर बन कर बजने लगे. ढोलक ने साथ दिया तो माहौल खुशनुमा हो गया. जुगलबंदी सर चढ़कर बोलने लगी. फिजा में नफासत घुल गयी और सारे संगीतप्रेमियों के माथे पर दिन भर की शिकनें समतल हो गयी. बारी-बारी दोनों उस्ताद अपनी पारी आजमाते, एक में भाव विभोर होते तो दूसरा हमारी तन्द्रा तोड़ देता... हम संगीत कि अठखेलियों पर झूम रहे थे... सरस्वती ने अपने गोद में हमें लेकर ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि हम अपनी सुध-बुध हो बैठे...

गांव में ऐसे ही किसी उचाट और अलसाई सी दोपहर में गोरखधाम से से कुछ सारंगी वाले आये थे और शाम तक सारंगी द्वार पर बजायी थी. उन दिनों मैं अपनी सारी जरुरी चीजें झोपडी जो कि टाट कि बनी थी, उसमें खोंस कर रखता... उसमें मैंने कई भूले बिसरे धुन भी रख छोड़े थे... जब से घर छोड़ कर निकला तब से जब भी घर को याद किया है मैंने यही धुन अवचेतन में हावी हो गया है. त्योहारों के दौरान मैंने अपने गांव की कई माओं को सारंगी की इसी धुन पर रोते देखा है जिनका बेटा या तो इश्क में गिरफ्तार होकर घर से भागा या नौकरी करने घर से निकला या आत्महत्या की. सारंगी अक्सरहां ऐसे दर्द छेड देती है.

प्लास्टर झडे दीवारों कि छांह में बजाये गए बंजारों कि सारंगी आज भी रात के अंतिम पहर मेरे कानों में बजती है.

आज भी मैं अपने काम से निकल रहा था और पाँव यूँ ठिठके की अपनी पराधीनता मैंने स्वीकार कर ली... अपने मन से कहीं बंधने में कितना आराम है ना !

जरा आप भी सुनिए, शायद कहीं कोई सिर्फ आपकी आत्मा से प्यार करने वाला सूरत आपकी जेहन में उग आये.




प्रस्तुतकर्ता सागर पर Friday, April, 02, 2010

2 comments:

  1. सारंगी की धुन अपने आस पास कई बार सुनी है.. हमारे राजस्थानी संगीत की एक खास पहचान है..

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  2. सच बात ये है कि सारंगी की आवाज, पता नहीं क्यूँ, मुझे बचपन से हीं पसंद है...
    मैंने एक बार, वो जो घर-घर घूम कर सारंगी बजाते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं, उनसे सारंगी सीखने के लिए प्रार्थना की थी पर वे नहीं माने थे...
    इस संगीत को उपलब्ध कराने के लिए शुक्रिया. इसे सुनकर मेरे माथे की शिकन भी समतल हो गयी. वाह!
    राम नारायण जी का सारंगी पर राग मालकौंस कभी मिले तो रात दस बजे के बाद सुनियेगा, फिर बताइयेगा.

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