Monday, April 19, 2010

रात के पिछले पहर रोज़ जगाती है हमें



दादी, 


मेरे पास दारु पीने को कितने बहाने हैं ! आज शाम उदास है इसलिए पी लेता हूँ, आज 'एलियन'  बहुत याद आ रही है इसलिए पी रहा हूँ, आज नौकरी नहीं मिली इसलिए... तो आज तुम मेरे साथ नहीं हो इसलिए...

अब तो दिल करता है अपना ऊपर ब्लेड ही चला लूँ  और अपना ही खून पीउं, वैसे भी इतने दिनों में खून शराब में तब्दील नहीं हुई होगी क्या ?  

नशे में जब माथा घूमता है तो लगता है पूरा शहर मेरे साथ घूम रहा है... सारी सृष्टि मेरे साथ नाच रही है. 
जिस्म के अन्दर जो तट है उसके वहां मजधार से आती कितने सुनामी हैं... यह आती हैं और बसे-बसाये सभी झोपड़ियों को तहस-नहस कर देती हैं... दादी, लगता है जैसे यह धोबी है और मुझे कपडे जैसे पटक-पटक के धो रही है तभी इतना बेरंग हुआ हूँ कि अब कोई रंग मुझ पर नहीं चढ़ता... 

ये बेरंगी उसी मजधार से आई है. हाँ - हाँ ! वही मजधार जहाँ उसने मुझे छोड़ा था.

कोई कितना नशे में है यह उसने पैर के अंगूठे पर खड़े रह कर कांपने से सिखलाया था... 
अभी बीती सर्दी में मैं लिहाफ ओढ़कर लोन में नंगे पाँव चलता था... मस्जिद की सीढियाँ अभी भी मैं उन्ही कांपते पैरों से अपराधी की तरह चढ़ता हूँ... 
सोने के लिए मैं जम कर कसरत करता हूँ, एक एक बाल से पसीने का सोता बहता  है;  नींद फिर भी गायब है, लगातार तीन सिगरेट पीने पर हलक सूख गयी है पर...


मैं पार्क में बच्चों के साथ लगातार चार चक्कर लगा लेता हूँ.. इसे अब नशा मापने का पैमाना क्यों नहीं माना जाता ?

तो अब मेरा ख्याल है उसने नशा मापने का पैमाना बदल दिया होगा. मेरा दोस्त कहता है अब मोटे पर्स में नशा होता है ? नहीं-नहीं दादी मैं अब भी मान नहीं पाता... "है इसी में प्यार की आबरू, वो ज़फा करें मैं वफ़ा करूँ"

फ्रिज में पड़े शराब की बोतलों पर कुछ ठंढी बूंदें ठहरी हैं, प्यास वाले वो दिन खत्म हो गए... फिलहाल यह रेड वाइन ही प्यास भरी नज़रों से मुझे देखती है, देखो! हाँ हाँ देखो-देखो तुमको भी इसमें तैरता एक खलनायक दिखेगा... दिखा ? दिखा ना ?? ओह मैं भूल गया था दादी तुम्हें दिखना अब बंद हो गया है... मैं सोचता हूँ आज इस ग़म में मैं पी लूँ... पर ऐसे ही अब मुझे यह पी जाएगी.

लगता है वो अभी-अभी उठ कर गयी हो... मेरे कुर्ते पर उसके खाए हुए बादाम के छिलके बिलकुल ताज़े हैं... शराब फिलहाल मुझे उसके बालों की फीते की याद दिला रही  है... इस  मौसम में जब मैं अपने सूखते होंठों पर जीभ फेरता हूँ तो मुझे उसके  मोज़े उतारे हुए गुलाबी पैर याद आते हैं...

... और सुनामी फिर से आ रही है.

9 comments:

  1. प्यार. खूबसूरत और उदास. खतरनाक combination होता है.

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  2. खतरनाक प्यार.. कितना सही कहा है ना पूजा ने..

    दादी से बात करते हुए कहना.. क्रिएटिव थोट है.. और मोज़े उतारे हुए गुलाबी पैर... तुम क़यामत ढा देते हो यार..!!!

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  3. भाई, हमें आपका लिखा बहुत अच्छा लगता है... कुछ अलग सा है... जो कि कहीं और नहीं मिलता है...वो यही आकर मिलता है...आप लिखते रहें.. तीन लोगों के ब्लॉग ही हमें अच्छे लगते है और इनकी पोस्ट का इंतज़ार रहता है.. एक आपका..कुश जी का..और अनुराग जी का...बस.

    Comments हम कर नहीं पाते है... आप लोग इतना अच्छा लिख देते है..कुछ कहने के लिए रह ही नहीं जाता है.. बस पढ़ लेते है... Comments न करने के लिए माफ़ी.. लेकिन आप लोग लिखते रहिये... पढ़ने वाले हैं..

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  4. ye geet mujhe atyant priya hai....waise ek chitra sa pratut ho gaya aur usme aapki bhavukta ne char chand laga kar rang bhar diya...
    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  5. Badihi anoothi shaili hai hai..laga, padhatihi chali jaun!

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  6. जिस्म के अन्दर जो तट है उसके वहां मजधार से आती कितने सुनामी हैं... यह आती हैं और बसे-बसाये सभी झोपड़ियों को तहस-नहस कर देती हैं... दादी, लगता है जैसे यह धोबी है और मुझे कपडे जैसे पटक-पटक के धो रही है तभी इतना बेरंग हुआ हूँ कि अब कोई रंग मुझ पर नहीं चढ़ता..

    सुनामी ला दी आपने तो!! बहुत बढ़िया

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  7. bhaiya e to gadbad hai na jahan dekho wahan pine ke bahane mil jate hain...magar pars ka kya karen jismen pase ki ak bund tak nahi bachi....

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  8. " इस मौसम में जब मैं अपने सूखते होंठों पर जीभ फेरता हूँ तो मुझे उसके मोज़े उतारे हुए गुलाबी पैर याद आते हैं.."

    कुश से सहमत.. कयामत ढा देते हो सागर.. कयामत..

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  9. लगता है वो अभी-अभी उठ कर गयी हो... मेरे कुर्ते पर उसके खाए हुए बादाम के छिलके बिलकुल ताज़े हैं... शराब फिलहाल मुझे उसके बालों की फीते की याद दिला रही है... इस मौसम में जब मैं अपने सूखते होंठों पर जीभ फेरता हूँ तो मुझे उसके मोज़े उतारे हुए गुलाबी पैर याद आते हैं...

    बवाल है यार! कहां फ़ंस गये तुमको पढ़ने में। अब और भी आगे बांचना पडेगा।

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