Saturday, July 31, 2010

अफ़सुर्दा कसक


डर लगता है, हाँ डर लगता है बहुत सारा डर लगता है. इतने सारे आरोपों के बाद भी खुल के लिखने में, कई बातें कहने में, कई दृश्य खींचने में, कई वाकये पेश करने में, कई परतें उधेड़ने में. डर है यह कहीं किसी को लील ना जाये, खुदकशी पर मजबूर ना कर दे, निराशा, अवसाद, दुःख, दर्द के उस घेरे में ना ले जाये जिससे बचने के लिए लोग अक्सर लिखते हैं.

लेखकों पर समाज की बेहतरी की जिम्मेदारी होती है, लोग किसी के जीवन में पोजिटीविटी के लिए लिखते हैं या लिखना चाहिए. कहाँ से यह बात घर कर गई थी और क्यों कर गई थी ये आज तक याद नहीं और इसका वजह  नहीं जान सका... यह दिल में ऐसे ही चलता रहता है जैसे पाप और पुण्य की लड़ाई चित्रलेखा में खींची गई है.

पर कई उपन्यास पढते हुए और हर्फों के आईने में उगे अपने चेहरे को पढते हुए लगा, नहीं, यही सही और मुकम्मल (आप अपने लिए बेहतर, पढ़ें) रास्ता है जो अपने तड़प को कम करता है कि जब हम जो चाहें, सोचें और करें वो लिख सकें. भले ही वो गलत हो, अनैतिकताओं को अनजाने में या परिस्थितिवश सही करार देता हो या फिर उसका समर्थन करता हो, वो आदमीरुपी महत्वाकांक्षा में डूबी हो या फिर कोई कठोर निर्णय के आधार पर कसी गयी हो.

दास्तोएवस्की को पढते हुए मुझे भी यह विचार आने लगा बल्कि यह विचार तो पहले से था पर इसे लिख पाने का साहस नहीं था. समाज की जिम्मेदारियों के प्रति ध्यान अटक जाता और इसे अगले ख्याल तक के लिए मुल्तवी कर दिया जाता. लेकिन मैं कब से जिम्मेदार होने लगा? या हुआ हूँ ? मैं होश में तो हूँ ! कब पलट कर यह सोचा कि इस लिखे से फलाने का जीवन बदल जाएगा, कोई थका हुआ इंसान उठ कर फिर से चल देगा, किसी की नींद टूटेगी, कोई तानाशाह  जागेगा, रोज़मर्रा के काम बंद हो जायेगे, इश्क में फरेब नहीं रहेगा, हम सभ्य नागरिक बन जायेंगे जाहिरी तौर पर दुनिया बदल जायेगी रही है या फिर अब तक मेरा ही क्या बदला है. ओह नहीं! यह तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा और आज भी सोचना मूर्खता ही लगता है. (पाठक इसे मेरा बड़प्पन/ महानता ना मानें)

पिछले पन्ने जिन पर मन भर धूल खेली है, रंग उडाये हैं, शराब उड़ेली है, इश्क फ़रमाया है, क़त्ल किये हैं, संगीन कारगुजारियों को अंजाम दिया है जो माफ़ी के काबिल नहीं है और ना लोग यह कह पा रहे हैं कि मुझे फांसी दे दी जाये. कुल मिला कर तजवीज की जाये तो हालत मुहाजिरों जैसी लगती है, शरणार्थियों सी लगती है या फिर फिलिस्तीन के उन्मादी वतनपरस्त सा जो जब तब दीवार के उस पार बम फेंक आता है तो इन देख कर तो यह दुःख नहीं होना चाहिए. जिंदगी जीते (नहीं इसे सुधारते हुए कहता हूँ कि सांस लेते) पच्चीस साल होने को आये और उधेड़बुन ज्यों की त्यों है और क्या गेरेंटी है की यह खतम ही हो जायेगी?

जिसे पाना था उसे छोड़कर मलाल किया, दुःख तय था और ऐसे मनोभाव में सुख मिला तो यह अप्रत्याशित था. इसे जीते रहने (पाठक इसे फिर से क्षमा करें, और यहाँ सांस लेना ही समझें) में हमने जो सूक्त वाक्य जमा किये जो कितना कारगर है, क्या यह सिर्फ मुसाफे भर नहीं है? मैं भूखा सोया और भूखे रहना अच्छा लगने लगा फिर पीछे से तकलीफ आई और कई सारे सपने पूरे हुए, कुछ चेहरों को हमने जान बुझ कर इतने करीब आने दिया जिसे वक्त-बेवक्त याद कर हम अवसाद में जा सकें, कुछ रिश्तों में खटास लाकर हमने अपनी उपयोगिता सिद्ध की और अपने जीवन को सार्थकता देखी. इन पर मेरा पूर्ण नियंत्रण था.

प्रेम भी एक नहीं कईयों से की बाबजूद उसके, सबके लिए वफादारी रही ताकि इतिहास में कुछ गवाह रहें और  कई बार तो यह भी नहीं सोचा बस प्रेम किया इन सब से ऊपर उठ कर. ऐसा नहीं की मैं बड़ा महान था बल्कि मेरे चरित्र में तो दो लाख छेद हैं. यह प्रेम कई स्तरों पर था. तमाम जटिलताएं इनमें थी.

कुछ ऐसे खंजर भी थे जिससे हम खुद को पूरे होशो-हवास में दो टुकड़े कर आतें बाहर निकाल कर देखते. पहले तकलीफ होती फिर ये आदत, राहत ले कर लाने लगी.

समाज, इंसान, ज्ञात-अज्ञात सभी चीजों से यह क्रूर प्रेम था, है.

13 comments:

  1. फिलिस्तीन से याद आया कि वह खुद का होना खोज रहा है अब तक....समस्याएं अलग बात है ....वह तो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा है ...

    तुम्हारे होने और लिखने का ....होना और रहना ही बेहतर लगता है मुझे.....बाकी दुनिया है

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  2. बाबू शानदार है... एकदम शानदार... सागर-ओ-मीना निचोड डाला है आज..

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  3. एक अच्छी रचना जो दिल को छू गयी बहुत बहुत बधाई

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  4. पाठको के लिए के लिए लिखना ......ओर .लेखक होना दो अलहदा चीज़े है .....

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  5. आपके होने और लिखने का ....होना और रहना ही बेहतर लगता है .....बाकी दुनिया है! पाठको के लिए के लिए लिखना ......ओर .लेखक होना दो अलहदा चीज़े है !!

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  6. बड़ी ही गहराई में ले जाकर धीरे से बाहर भी निकाल आते हैं।

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  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 01.08.10 की चर्चा मंच में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति...

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  9. कहीं पर नेरुदा को पढ़ा था अपनी कुछ कविताओं के बारे मे यह कहते हुए..’कि यह कविताएँ किसी की जीने मे सहायता करती हैं..तो किसी की मरने मे मदद करती हैं’..
    मगर सवाल है कि जब तक आप ’सेल्फ़-हेल्प-बुक’ या ’धार्मिक संहिता’ नही लिख रहे हैं..क्या फ़र्क पड़ता है कि पढ़ने वाला उन किताबों के साथ क्या फ़ील करता है..हर युग के अपने विश्वास होते हैं..और अपने पूर्वाग्रह भी...किसी पुस्तक के साथ किसी वक्त मे आग की होली खेली जाती है..तो उसी पुस्तक को दूसरे वक्त मे आँखों से चूमा जाता है..वास्तविक साहित्य, सच्ची कला समय की इसी अग्निपरीक्षा को पार कर के आती है..कला अमर होती है..काल से परे..मगर कलाकार तो नश्वर होता है..एक साधारण सा प्राणी जो अपने साधारण से जीवन से रंग लेता है, साधारण से दुखों की दवात से स्याही ले कर असाधारण कृतियों की सर्जना करता है..यह दुख, यही अतृप्ति, यह अपूर्णता उस शाश्वत्य का स्रोत होती है..जो कला के मूल्यों को समय के पाश से मुक्त करता है..कलाकार अपनी बलि दे कर ही अपने कृतित्व को अमरता देता है..अपने रक्त को मथ कर अमृत निकालता है..सो अगर इस आत्ममंथन और उससे जनित नैराश्य के हलाहल से डर गये तो साहित्य भुलावे देता रहेगा आपको..इस आग मे कूदना पड़ेगा..और राख होना पड़ेगा...तारकोवस्की की डायरी अंश अब तक पढ़ लिये होंगे आपने..अगर नही तो फिर से पढ जाइये उसे..पूरा!!!

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  10. ..और उम्मीद है कि रिल्के ने भी कुछ रोशनी दी होगी..इस अँधेरे मे...

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  11. सागर के तूफ़ान को छु लिया हो जैसे... वो कभी नकाब नहीं पहनता और यहाँ कोई लिबास भी नहीं...

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  12. जिंदगी के पच्चीस साल बीतने पर इंसान अगर इतना सोचने की हिम्मत रखता है कि जिंदगी को जीने का कोई सलूक होगा, और उसे ढूँढा जा सकता है तो उसे इंसान होने की सफलता ही कहेंगे. जीने की जद्दोजहद में अक्सर लोग टूट जाते हैं, और जीने की कोशिश में जिंदगी गुजार देते हैं...पर ये सबसे जुदा तलाश, दर्द, प्रेम और क्रूरता एक साथ...इसी को तो जिंदगी कहते हैं.

    लेख इतना सशक्त है कि एक बारगी तो यकीं नहीं होता कि तुमने लिखा है...पर आखिरी पंक्ति पर आती हूँ तो जानती हूँ...ये तुमने ही लिखा है.

    एक लेखक और एक इंसान की इस पहेली को सुलझाने में मेरी शुभकामनाएं लो. रास्ते को मंजिल समझ कर चलोगे तो जिंदगी काफी कुछ सिखाती रहेगी कदम कदम पर.

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  13. पिछले पन्ने जिन पर मन भर धूल खेली है की बात करते है तब तो आप अच्छे से जान सकते है (यह दिल में ऐसे ही चलता रहता है जैसे पाप और पुण्य की लड़ाई चित्रलेखा में खींची गई है.)सही गलत मन की अवस्था ही होती है.मेरे लिए जो सही आप के लिए गलत या आप का सही मेरा गलत.क्या चित्रलेखा में ये फैंसला हो पाया था पाप क्या और पुण्य क्या?इसी सवाल से उपन्यास शुरू होता है इसी पे खत्म.ये सही है लेखकों पर समाज की बेहतरी की जिम्मेदारी होती है समाज की जिम्मेदारियों के प्रति ध्यान अटक जाता और इसे अगले ख्याल तक के लिए मुल्तवी कर दिया जाता.ऐसा नहीं होता की हम मुँह मोड़ लेते है या आंखे बंद कर लेते है.ये एक चिंगारी सुलग रही होती है जो एक विस्फोट कर देती है.क्या दास्तोएवस्की हाथ में कलम पकड़ते ही महान बन गये थे?या फिर जिस जिस ने समाज पर लिखा उसने प्रेम नहीं किया?खलील जिब्रान ने पादरियों और शासकों की सत्ता को चनौती देती कहानियां लिखी.उससे पहले की उसकी कहानियां प्रेम,सौन्दर्य और प्रकृति पर थी.वक़्त के साथ ये पढने पढ़ाने,लिखने लिखाने का सिलसिला भी बदलता रहता है.
    बढ़िया अभिवियक्ति बधाई....:)

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