Thursday, September 9, 2010

यहीं, रत्ती भर की दूरी पर...


सारे अरमान और सपने दिल में समेट कर एक सांस में उसे बाहर लंबी ठंढी आह भर कर बाहर फैक दिया, बाहर पैंतालीस डिग्री के कोण से अन्धकार बरस रहा है. इस कोण पर तो इंसान का अभिमान भरा गर्दन होता है...

रत्ती भर का फासला है उस तरफ ... बस खेल खत्म ही समझो, बला से मुक्ति, उधेड़बुन से निजात पर क्या यह मोड इतिहास का बड़ा बदन मोड होगा? क्या इसे पढते वक्त कोई पाठक यह पन्ना मोड कर रखेगा? कोई पेंच, गुलाब, रेशमी धागा या मार्कर को बरतेगा ?

उस पार कितनी शांति है, बीच में थोडा सा गंदला पानी जरूर है जैसे बरसात में खोली और गली के बीच में होता है पर जब पार करने के लिए ईंटों पर पैर रखते थे तो उम्मीद होती कि तर गए लेकिन याद है कैसे वो भीतर से खोखली हुआ करती और पाँव बीच पानी में उलट जाते... एक छपाके से डूब जाते, पूरी सांस फिजा में निकल जाती, गर्दन तक डूब जाते मनो दिल डूब गया हो... और हर बार एड़ियों में मोच रह जाती.

उदासी के हसीन टुकड़ा सामने दिखा, वक्त हमको कुत्ते की तरह ललचाता है उसको उछल कर लाख पकड़ना  चाहते हैं, हाथ नहीं आता. आज जब सारी आकृति ने मुझसे संतोष कर लिया है तो यूँ निकम्मा मरते अच्छा नहीं लग रहा.

जाने कैसी मनहूस घडी है, काकी के पेंशन के पैसे खतम हो गए और दादी के अचरे में बीड़ी भी नहीं हैं पर मेरे जैसे मतलबी आदमी के पास दारु रहते हुए भी इसकी घूंट कसैली लग रही है...

कभी ऐसा भी होता कि मरीज को तसल्ली हो जाती कि सामने वाले ने उसका मौजूदा हालात और हालत दोनों समझा है. काश हर बार उफुक देख कर प्यार से इतना कहते री सखी, तेरे राज़ मैं जानता हूँ, देख मेरे मुख पर कैसी भावुक सी प्रसन्नता है, यह हंसी में नहीं बदलती है, बस इसकी चमक आँखों में झलकती है

ज़िन्दगी भी तो एक सिनेमा है इसकी स्क्रिप्ट भले ही कमजोर हो पर कुदरत ने प्रकाश व्यवस्था अच्छी कर रखी है. उसको उठाने में, जीने में, बरतने में...

राजेश बाबू पनीली आँखें लिए मुस्कुराते हैं... जैसे सब जानते थे. रूह का एक-एक सिरा पकड़ कर बुनकर के माफिक बड़ी कुशलता से सुलझाते थे...


9 comments:

  1. उपरवाला बहुत खराब डाइरेक्टर है यार...उसको समझ ही नहीं आता कब सुख के पल होने चाहिए कब दुःख के...अच्छी फिल्म है पर उस फिल्म को जीना उतना ही मुश्किल.

    तुमने अपनी मारक शैली मे लिखी है...जगजीत सिंह को सुन रही हूँ तुम्हें एक बार पढ़ चुकी हूँ...ओ कवि.

    लिखने की बहुत इच्छा है...आज बस इतना ही, बाकी फिर पढूंगी तो लिखूंगी.

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  2. "क्या इसे पढते वक्त कोई पाठक यह पन्ना मोड कर रखेगा?"
    बेटा, सब समझ रहे हैं.. तुम्हारा मोबाइल गया तो चाहते हो सभी मोड़ने के चक्कर में अपना कम्प्युटर तोड़ लें.. :)

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  3. pd bhai, ishq mushq me sunte hain log phone number udaane ka program banate hain, sagar wali to anokhi honi hi thi...phone hi gayab kar liya ;)

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  4. एक छपाके से डूब जाते, पूरी सांस फिजा में निकल जाती, गर्दन तक डूब जाते मनो दिल डूब गया हो... और हर बार एड़ियों में मोच रह जाती...

    One of the best quote of Sochalay..

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  5. कसम से तुम्हारे भीतर अभी बहुत कुछ ओरिजनल बचा पड़ा है .उलीचने को .....कभी कभी सोच में पड़ जाता हूँ के ज्यादा हिलने डुलने से साला छलक भी जाता होगा ....मार्के का लिखा है ....बढ़िया पोस्ट कहना इन्सल्ट हो जाएगा ......
    ओर हाँ

    करेक्शन मी लोर्ड.....राजेश बाबू नहीं ..ऋषिकेश दा! ....

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  6. master piece !
    next......:)
    @PD: तुम्हारा मोबाइल गया तो चाहते हो सभी मोड़ने के चक्कर में अपना कम्प्युटर तोड़ लें..मुझे भी ऐसा ही लगता है. :)

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  7. ज़िन्दगी भी तो एक सिनेमा है,नहीं ऐसा तो नहीं है इतना नाटकीय भी नहीं है जिन्दगी .....इसकी स्क्रिप्ट भले ही कमजोर हो पर इतनी भी kamjor नहीं है ki hum use sambhal na saken..

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