Wednesday, October 6, 2010

सरगर्मियां

/जुम्मे का दिन/

आम के बगीचे के बाद सड़क किनारे एक मस्जिद. क़ुतुब मीनार के जैसे एक ऊँची जाती लंबी इमारत. बढ़िया संगमरमर लगा हुआ है और सबसे ऊपर टंगा है एक चमचमाता संकेत चाँद और तारा. ठीक बाजू में एक लाउडस्पीकर जहां से इमाम तक़रीर कर रहे हैं  हमें अपने वालिदेन की खिदमत करनी चाहिए. वजेह उस खुदा, पाक परवरदिगार का सरमाया हम पर है और यह ज़िन्दगी जन्नत है, वालिदेन की खिदमत ना कर के हम खुद को दोजख के लिए तैयार करते हैं. सुपुर्द-ए-खाक के वक्त हमारी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं होती और रूह खुदा से मिल कर पाक नहीं हो पाता. इसलिए गरीबनवाज़ को हाजिर-नाज़िर जान वालिदेन की खिदमत करो.

मस्जिद के ठीक पीछे सड़क उससे लगती हुई बद से बदतर हालत में एक नाला जिसका गंदला पानी जाम है. नाले से सटते ही मुसहरों का टोला जहां के लोग सूअर मार कर, चूहे खा कर, अफीम, गांजा पीकर अपनी लुगाई को पीट कर, बच्चों के कूड़ा उठवा कर गुज़ारा करते हैं.

टोला खत्म होते ही रेलवे लाइन जहां कोई हाल्ट नहीं है एक चाय की दूकान और उस पर कुछ लोगों की बातचीत

पिछली बार का पोलिंग एजेंट (जो बहुत संभव है की इस बार भी होगा) : हम तो कहते हैं इस टोले को कम से कम बड़े वाला ड्रम से तीन ड्रम दारु चाहिए.

एक कार्यकर्ता... पार्टी : अबकी तो देखे के भी पड़ी ई भोसड़ी वाले किसपर ठप्पा लगाते हैं.

दूसरा कार्यकर्ता : जे तो हुई इस टोले की बात, उस पार ?

तीसरा कार्यकर्ता : उधर के लिए आठ राजदूत तैयार है, झंडा-वंडा सब...

पहला : तो अभी यादव इतने से मान जायेंगे ?

दूसरा : और इंतजाम भी है हो, अबकी सबको गंगा पार से इधर बसाना है इसी भूमिहार और बाभन के बीच में

तीसरा : दू साल से फुसला रहे हो, वोट नहीं दिया तब ?

पहला : देगा कैसे नहीं, नदी किनारे बालू पर परवल कब तक उगायेगा ?

पहला : और पासवान ?

तीसरा : उ पटना मुश्किल है भईया

दूसरा : काहे ?

पहला (मुस्कुराते हुए ) : अभी त दोस्ती भी है ?

तीसरा  : लेकिन पिछवाड़े पर लात मारने में केतना टाइम लगता है ? और हेहर हैं आपलोग जो आगे भी लात खाने को तैयार हैं...

पहला और दूसरा (एक साथ ) : अरे मौगी के नखरा और दुधारू गाय के लताड सहे ही पड़े है ... काहे से तू जाने है ना की दोनों से का मिले है ? जाने है की ना ?

तीसरा : (गुटका का पीक फैंकते हुए) : उ त ठीक, कोई जुगाड करते हैं पर हम ?

पहला : का तुम, पार्टी महासचिव बनोगे ?

दूसरा :  उ भी हमरा रहते ?

तीसरा : ना पर कम से कम लाख रुपैया

पहला (हँसते हुए) : हिंदुस्तान ले ले बेट्टा

दूसरा :  ई बकवास सुन रहे हैं इसके लिए का सोचा है (लाउडस्पीकर से आती आवाज़ की ओर इशारा करते हुए)

पहला : जो रे साले, सबके सोचेगा ? अपने जात का सोच, गला साफ़ कर और शुरू कर अभियान

दूसरा : त वही M + Y फार्मूला (मुस्लिम यादव समीकरण )

तीनो (एक साथ) : हे हे हे !

***
(अभियान शुरू हो चुका है, गौरतलब है की बिहार विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं... सो जारी है...)

3 comments:

  1. अच्छा चित्र खींचा है, मियाँ

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  2. badiyaa.. gehre utre ho rajniti mein

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  3. पूरा चुनावी समीकरण है समेटे ये पोस्ट...बेहतरीन है

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