Saturday, November 13, 2010

ये करें, वो करें, ऐसा करें, वैसा करें !



With the first light of dawn, came the twittering of birds from the bamboo groves of a nearby village. That filled her with foreboding. She was not sure how she would relate now to the world of the living.

स्क्रिप्ट राइटर ने वर्ड पेज खोला और कुछ लिखने की कोशिश करने लगा.. स्क्रीन पर कर्सर ब्लिंक करता हुआ उसके उँगलियों की प्रतीक्षा करने लगा... कर्सर आधे सेकेण्ड प्रति मिनट की दर से गायब और प्रगट होता यों ऐसी हरकत कर रहा था जैसे उसे उकसा रहा हो कि  - लिखो यार !

लेकिन ऊपर जो रवीन्द्रनाथ टैगोर का पैरा दिया है उसको आधार मानकर उसे वह आगे नहीं बढ़ा पा रहा था. घटनाओं से वो खुद को रिलेट नहीं कर पा रहा था. उसने पत्रकारिता कोर्स के दौरान टेड ह्वाईट की किताब में पढ़ रखा था कि कई बार दिमाग में खबर नहीं बनते. ऐसे में दिमाग में आते ही नहीं कि शुरुआत कैसे करें, क्या लिखना है. ऐसे में बिना कुछ सोचे-समझे कुछ लिखें और मिटा दें लय पकड़ में आ जाती है ... स्क्रिप्ट राइटर ने भी यही किया. वह कुछ लिखता और सात से आठ शब्द टाइप करने के बाद बाद मुंह से चक्क  मारकर, बैकस्पेस ले मिटने लगता... जिस की-बोर्ड पर उसकी उँगलियाँ सिध्हस्त पियानो वादक जैसी चलती, जो नुसरत फ़तेह अली खान के कव्वाली सुनकर और दुगनी रफ़्तार से भागने लगता, जिसके खट-खट से पूरा केबिन गूँज उठता और देखने वाले अगर अपने आँखों का लेंस जूम कर लें तो फर्क करना मुश्किल जाएगा कि यह उँगलियाँ स्क्रिप्ट राइटर की  हैं या फुर्ती से पियानो पर भागते अदनान सामी की. 

कुछ लिखना और उसे मिटा देना ऐसा कई बार होने पर लगा कि उसकी कलम कुंठित हो गयी है या फिर भाषा बड़ी दरिद्र होती है क्योंकि घटनाओं को वह वैसा शब्द नहीं दे पा रहा था जैसा उसने देखा था या लिखने का सोचा था.  

स्टोरी -1
एक दब्बू लड़का एक लड़की को फूल दे रहा है और लड़के के चेहरे पर लाज भरी प्रसन्नता उसके रोम - रोम में घनीभूत होकर फैली हैं. लड़की के पैर काँप रहे हैं और वो थरथरा सी गयी है. उसने यह लिखा लेकिन पूरी तरह ऐसा नहीं हुआ था. राइटर वो लिखना चाहता था जो छूट रहा था. अतः उसने लिखा और फिर मिटा दिया. 

स्टोरी -2
पार्क में एक अधेड़ उम्र का आदमी बुरी तरह थका हुआ है. वह जोर - जोर से हांफ रहा है. किसी एकांत जगह पा कर वह जोर जोर से साँस लेने लगता है. उसमें सुकून था, ऑक्सीजन तो था ही . उसकी छाती अब भी लगभग चार से पांच सेंटीमीटर तक फूल जाती है. वो पसीने में तरबतर है. - राइटर ने यह लिखा भी लेकिन  फिर से एक बार उस लिखे को पढने पर लगा कि नहीं ऐसा नहीं हुआ था, यह पूरी तरह वैसा नहीं था जैसा मैंने देखा और लिखने का सोचा था. 

स्टोरी -3
दरवाजे का सांकल लगा कर वो जैसे ही पलती एक और काम याद गया उसे, रात के एक बज आये थे और अब बाहर जाना निहायत बेवकूफी भरा फैसला था. फिर भी मन में काफी देर उधेड़बुन चलता रहा, एक मन कहता थक गयी है आराम कर ले, कल कर लेना. दूसरे ही पल लगता- नहीं, यह बहुत जरुरी है, करना ही होगा. उफ्फ्फ कुछ समझ नहीं आ रह क्या करें.. - राइटर ने यह लिखा लेकिन यह भी पूरी तरह वैसा नहीं था जैसा उसने देखा (कल्पना में) और लिखने का सोचा. 
  
इससे पहले, राइटर को तब बड़ी कोफ़्त होती जब लोग या अच्छे-अच्छे लेखक भी कहते कि "मैं इतना आभारी हूँ कि इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता. मैं इतना भावुक हो गया की बता नहीं सकता, वो इतनी खूबसूरत है की कहा नहीं जा सकता. सोमालिया इतना गरीब देश है की बताया नहीं जा सकता.... इस पर खीझ होती कि बताओ यार, आम आदमी होते तो कोई बात नहीं थी एक लेखक होकर भी अगर शब्द नही दे पा रहे हो तो कैसी समर्थता ? योग्यता पर प्रश्न चिन्ह है यह तो ? 

अब उसे लगने लगा कि वाकई हमारी भाषा ही गरीब है. हमारे पास ज्यादा विकल्प नहीं है. एक सीमा तक ही हमारा ज्ञान है. महज़ कुछ शब्द ज्यादा पा कर हम औरों से आगे हो लेते हैं.

इस तरह, किसी घटना, किसी स्क्रिप्ट, किसी स्टोरी से रिलेट ना करते हुए उसने इस कमी से खुद को रिलेट किया. और आज जब इस पर भी वह लिखने बैठा है तो वह यह सब  मिटा देना चाहता है क्योंकि यह भी ऐसे नहीं लिखने का सोचा था. सोचा तो था कि पूरी बारीकी से  लिखूंगा.. हर एक बात जो हुआ वो भी और जो ना हुआ वो भी. लेकिन असल काम के नाम पर यही शब्दों का पुलिंदा तैयार होता है हर बार.

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इधर, कर्सर अब भी ब्लिंक करता हुआ चिढ़ा रहा है.

10 comments:

  1. रोचक प्रस्तुति.... आभार

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  2. पोस्ट शीर्षक - जगजीत सिंह और चित्र की गायी ग़ज़ल से ..

    सूचनार्थ एवं आभार : भाषा की द्ररिद्रता सम्बन्धी बात अमरेन्द्र त्रिपाठी ('कुछ अपनी और कुछ औरों की' ब्लॉग) से बातचीत के दौरान निकली थी जो राही मासूम रज़ा ने कही है.

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  3. कर्सर आपकी चिन्तन प्रक्रिया से विलग बार बार उभरता रहता है और प्रतीक्षा करता है कि आप कुछ लिखें।

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  4. राईटर की मनोदशा का तो बखूबी बयां किया है लेकिन ये पाठक पूछना चाहती है ......इस पोस्ट तो पोस्ट करने के बाद लेखक क्या सोच रहा है ? क्या ये वैसी ही है जैसी लेखक चाहता था ?

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  5. वाकई हमारी भाषा ही गरीब है. हमारे पास ज्यादा विकल्प नहीं है. एक सीमा तक ही हमारा ज्ञान है. महज़ कुछ शब्द ज्यादा पा कर हम औरों से आगे हो लेते हैं.
    वाकई....कभी कभी शब्द साथ नहीं देते,,....

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  6. शायद ऐसी ही किसी मनःस्थिति में फैज़ ने कहा होगा "शेर लिखना जुर्म न सही, लेकिन बेवजह शेर लिखते रहना कुछ ऐसी दानिशमंदी भी नहीं....."

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  7. @ प्रिया,

    almost ऐसे ही, अभी फिर से पढ़ कर देखा. कुछ शब्दों की स्पेल्लिंग छोड़ दें (जिस पर अबकी खासा ध्यान दिया गया था और कोई गेरेंटी नहीं है की आगे भी ऐसा होगा) और मेरे आदतानुसार स्त्रीलिंग-पुल्लिंग का लिंग भेद छोड़ दें तो यह लगभग वैसा ही है जो कहना चाहता था अलबत्ता बदलाव हुआ है पर वो treatment के लेवल पर इसे ऐसे पेश करना नहीं चाहा था... सोचता कुछ हूँ और लिखने वक़्त सब बदल जाता है.

    बात को थोडा और बढाऊँ तो अमरेन्द्र जी ने उठाया कि हमारी भाषा बहुत गरीब होती है .. जैसे भूख लगी है, इसके भी कई वर्गीकरण होते हैं पर यही हावी हो जाता है, प्यार हुआ है पर यह भी कई लेवल पर इसे शब्द नहीं दे पाते, मर जाना भी कई तरह का होता है .. पर लिखने में आखिरकार मरना ही लिखते हैं.

    यहाँ इस चीज़ को और स्पष्ट वो ही आकर करेंगे.

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  8. जहां तक याद आ रहा है - बात 'टोपी शुक्ला' उपन्यास में राही सा'ब ने कही है . आपसे बात के दौरान ऐसी चर्चा हुई थी .

    बहुत कुछ कहा जा सकता है इस पर .
    भाषा की दरिद्रता ( अक्षमता ) को लक्षित करके राही सा'ब ने 'मरना' पर कहा था .
    आशय कुछ यूँ था कि छोटा सा दुधमुहा बच्चा का न बचना भी 'मरना' है , एक अपराधी का पुलिस की गोली से काउंटर हो जाना भी 'मरना' है , सहज तौर पर किसी वृद्ध का दिवंगत होना भी 'मरना' है , किसी प्रेमांध का 'सोसाइड' भी 'मरना' है .... कुल मिला कर जो हो रहा है वह अलग-अलग प्रवृत्ति और प्रकृति की 'घटनाएं' हैं जबकि 'मरना' शब्द द्वारा भाव-वैविध्य सिकुड़कर 'घटना' के रूप में सरलीकृत हो जा रहा है . यही है भाषा-संदर्भी दरिद्रता से आशय ! लक्ष्य एक बात को रखने की कोशिश भर है , शब्द विशेष द्वारा भाषा के अपमान की ध्वनि न निकाली जाय !

    एक और बात .
    हर घटना देश-काल-परिस्थिति के रूप में नवीनता के आग्रह के साथ होती है , हमारी भाषा तो उसी अनुपात में नवीन नहीं हो पाती क्योंकि वह तो परम्परा ( सिलसिले के अर्थ में ) के आग्रह से दबी होती है . इसलिए भी घटना के प्रस्तुतीकरण में हमें भाषिक अक्षमता का सामना करना पड़ता है !

    एक चित्रकार सामने बैठा कर एक रूपसी का चित्र बनाना चाहता है , एक पल में देखकर वह कूची मारता है , तब तक रूपसी नए रूप में दाखिल हो चुकी होती है . उस पल पर इस नए यथार्थ का दवाव आ जाता है . कैसे रचे चित्र ? , शब्दकार के पास भी ऐसी अक्षमता आती है !

    एक ग्रीक विचारक ने कहा है कि कला रूप सत्य से तिगुना दूर होता है . किसी घटना ( सत्य ) के अनुकरण के रूप में यह जगत है और कलाकार इसका अनुकरण करता है , इसलिए दूरी आ जाती है - तिगुनी . पं. देवेन्द्र नाथ शर्मा इसे 'त्रिधा-अपेत' कहते हैं | भाषा ( बेशक एक कला रूप में ) में लिखने वाले को इस त्रिधा-अपेत का दवाव भी अक्षमता की कचोट से भर देता है !

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  9. शुक्रिया अमरेन्द्र जी,

    बहुत- बहुत आभार, इसलिए कि आपने पूर्णतः भार मूल कथन अर्थात प्रस्तावित विषय पर रखा.

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  10. kitni baar ye backspace meri bhi kahaniyon ko maar daalta hai...kabhi paatr virodh karte hai aur kabhi.....

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