Tuesday, December 21, 2010

कुरेदो जरा राख के वहाँ आग है क्या ?



सूत्रधार : पहाड़ पर बिछे हुए कोयलों में सुलगने की गुंजाईश है ... जिस को बाहर से दुनिया बंजर मानती है ... ढलानों पर ज़रा ज़रा सा फिसलन होती थी उन कोयलों का ... थोडा सा फिसलता ... राख उडती और लगता जैसे सब शांत है. जो गोला अन्दर फटता रहता उसका इल्म नहीं था... और जिन्हें था वे शिक्षित और समाज में पागल करार दिए जा चुके थे. समाज यह कर के अपने दायित्व के निर्वहन से स्वयं को च्युत मान चुका था... हालांकि उसका पाठ्यक्रम बहुत बड़ा था लेकिन सुविधाओं की लिंक ने सब काम आसन कर दिया था .. हैरत यह थी इतने के बाद भी हर दिन किसी ना किसी चीज़ की डेडलाइन होती ... लोग तनाव में रहते थे नतीजा बालों का झाड़ना और रुसी का होना था... एक बड़े वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यही थी...लोग इस पर बातें करते थे... 

/संगीत/

रजाई में पैर गर्म हो जाते थे. भुने हुए आलू के पराठे और उस पर हरी चटनी की सुगंध ने आँखों से बहरा और कानों से अँधा बना दिया था.. लेकिन यह सुख स्वीकार्य था और इस सुख के सब कुछ त्याज्य था... इस सुख की फेहरिस्त लम्बी थी. ईमानदारी से कहूँ तो इसकी फेहरिस्त अंतहीन थी... गैस की पाईपलाइन किचेन तक बिछी थी. माईक्रोवेव में खाना सेट टाइम के मुताबिक सेकेण्ड में गर्म हो जाता था... उँगलियों पर फेंटसी पूरे करते चैनल्स थे... आप कहेंगे "शिल्पा नाच !" वो भी दिखेगा, आप कहेंगे ऐश्वर्या चूम तो वो भी मिलेगा... इस सबसे परे बंगलों में वाईल्ड शौक पुरे करने के लिए जिगोलो से लेकर बाल मजदूर तक थे... औकात मुताबिक फैले हुए थे. Its just ridicules ना !

/संगीत/

बेकारों की बात करना लोगों को अपशकुन लगता ... मतलब कुछ इस तरह का कि जैसे उनकी चर्चा या समस्याओं पर बात करने से वो भी बेरोजगार हो जायेंगे... यह आम आदमी का हाल था... वहीँ, संसद के गलियारे में और एन जी ओ में ऐसे मुद्दों कि जरुरत थी ... यह वहां जलते कोयले थे ... बेतर तरीके से सुलगते थे इनपर रोटी भी बन जाती थी और गर्म खून के कारण सोने से पहले सर्दी में हाथ भी थोडा सेंक लिया जाता. मैं कहता हूँ क्या हर्ज़ था! कुछ भी तो नहीं. वहीँ जो मुद्दे नहीं हैं उसे एक मुस्कान के साथ दोनों हथेलियों को रगड़कर और "क्या लगता है" का गर्म और जोशीला मुद्दा बनाने का काम समाचार एंकर दबाव में भी कुशलता से कर रहे हैं.

/संगीत/

भारतीयों में कुछ उत्तर के थे, कुछ दक्षिण के थे, दक्षिण के उत्तर में नहीं आते थे या फिर गरज होता था तो आ भी जाते थे. इसी तरह उत्तर वाले भी चले जाते थे उनको गरज तो था ही... उत्तर भारतीय, दक्षिण के शुक्रगुज़ार थे. दक्षिण राजा था. वहीँ पूर्वोत्तर पूरा कटा हुआ था... दिल्ली जिसके जिस्म पर हंसिये के कई निशान थे वो अस्सी हज़ार करोड़ खा कर किसी तरह फिर से उठ खड़ा हुआ था.. लोग उसकी हिम्मत को दाद देते थे. और कोई चारा भी नहीं था क्योंकि चारा तो बिछाया जा चुका था सो वो मवेशी बनकर यह चारा चरने आ रहे थे...  यहाँ सी सर्दी और गर्मियों का जिक्र किताबो में होने लगता थे जिसे पर्यटक दूर दूर से देखने/ भोगने आते थे. कुल मिला कर बड़ा खुबसूरत शहर बन पड़ा था. कनौट प्लेस की चुनिन्दा रेस्तरां के नाम लोग मक्का काशी की तरह जानते थे. 

/संगीत/
हाँ तो पूर्वोत्तर जख जिद्द खाए बच्चे कि तरह एक ही शिकायत कर रहा था - दिल्ली मुझे अपना हिस्सा नहीं मानती... वहीँ दिल्ली को सिर्फ उधर गुवाहाटी दिखती...  हमारा पडोसी इसे देख रहा था... आप भी देख रहे हैं ना. 

ले दे कर आर्थिक राजधानी बची है - बम्बई (आई ! राज ठाकरे माफ़ करें, जुबान ही था, फिसल गया ! क्या ? अब पेशी देनी होगी ! ) मुंबई, वो विदेशी राजनेताओं द्वारा लिए जा रहे "दिलचस्पी" और बीस हजारी सेंसेक्स में धुत है. 

फेसबुक पर समाज में क्रांति कि मुहिम चल पड़ी है. दहेज़ प्रथा के खिलाफ से लेकर ईराक और अफगानिस्तान में लोकतंत्र के ठेकेदार (अगर माई बाप अमेरिका के हितों को नुक्सान ना हो तो !) द्वारा विकिलीक्स पर लगाम लगाने कि बात चल रही है.

मैं अपनी स्थिति इस पहाड़ से उतरते सायकिल सवार की तरह पाता हूँ.. ढलान आराम दे रहा है. मैंने पैडल मारना छोड़ दिया है.सायकिल ने खुद ही नीचे जाने की रफ़्तार पकड़ ली है.  सायकिल की चेन टिक-टिक-टिक-टिक कर रही है. (आप देख रहे हैं ना मुझे सायकल चलते हुए और मेरे चेहरे पर अब उग आई मुस्कान को ! आप देख रहे हैं ना !)

नज़र दौड़ता हूँ तो कहीं थोडा, कहीं बड़ी मात्रा में कोयले का सरकना अब भी दीखता है.. सरकार ने उसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र, बीमारू राज्य, दलित, शोषित समाज, बेरोजगार, अत्यधिक जनसँख्या वाला राज्य आदि नामों से सुशोभित कर दिया है... (सुना है इससे पंचवर्षीय योजनायें बनाने में आसानी होती है) इस हीरे जडित हार सा नाम पा कर वो चमक उठा है. सभी प्रयासों में लगे हैं सरकार भी और हम भी भई !

अब गिन लीजिये आज अपने घर के लोग तो पूरे हैं ना ! हैं ? बस्स्स ! हुफफ्फ्फ्फ़..... thank god ! 

नमस्कार!

/संगीत/

14 comments:

  1. क्या कर के मानोगे आप ..सब समेट लिया वर्तमान भारत का कोलाज़ दिखा इस लेख में ... पूर्वोत्तर का दर्द ,बंगलो में होने वाले जश्न की असलियत ,पराठों की सोंधी महक ..सब जी गई एक साथ

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  2. क्या कहूँ इस /संगीत/ पर

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  3. मैं निःशब्द हूँ !

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  4. राजनीतिक पोस्ट, पहली बार देखी आपके ब्लॉग पर शायद

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  5. बेहद खूबसूरत गद्यगीत, संगीत के विरामों के साथ, शब्द के अभिरामों के साथ, चिन्तन के आयामों के साथ।

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  6. @ नीरज जी,

    यह पहली बार नहीं है... आप पिछली पोस्टों को पढ़ें वहां "सरगर्मियां", चेक एंड मेट" और तकरार" नाम के शीर्षक से कुछ ऐसी ही चीजें मिलेंगी.

    http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2010/10/blog-post_06.html

    http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2010/04/blog-post_13.html

    http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2010/04/blog-post_07.html

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  7. ढलान आराम दे रहा है. मैंने पैडल मारना छोड़ दिया है.सायकिल ने खुद ही नीचे जाने की रफ़्तार पकड़ ली है. ....

    जबरदस्त अभिव्यक्ति !

    .

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  8. मुझे तो दुबारा पढ़ना पडेगा जी.... :)

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  9. कलम है की कैंची?... माहिर हो गई है राजधानी का दिल, राजनीति की सूरत और इक्केस्वी सदी की वास्तविकता को डाइ सेक्ट करने में...

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  10. आखिरी वाला वाला बेहतरीन है ....ऐसी ही एक रिपोर्टिंग शायद आई बी एन पर देखी थी....खास तौर से इस मसले पर .........

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  11. नमस्कार जी
    बहुत खूबसूरती से लिखा है. आपने
    मन मोह लिया...

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  12. jaldi khatam ho gayi post...bah nikli thi iske saath.

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  13. जबरदस्त अभिव्यक्ति !

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