Friday, September 24, 2010

हिज्र

डिस्क्लेमर: इस पोस्ट के सभी पात्र वास्तविक हैं, इनका दिए गए ब्योरे से, उन घटनाओं, स्थानों एवं संदर्भित व्यक्तियों से पूरा सम्बन्ध है और ऐसे सभी काम के लिए वही पात्र उत्तरदायी है.

दिनांक : गुलाबी सर्दियों कि आमद

स्थान    : सामान्य सी बात थी,  हर जगह घटती रहती है.

समय     : टूटने का कोई वक्त होता है क्या ?? नहीं बताओ ना होता है क्या ?  

जुर्म       : वही, घिसा पिटा काम जो सब करते हैं.

इकबालिया बयान :

20 वीं सदी के जाते जाते और 21 वीं सदी की दहलीज़ पर पैदा हुआ, प्रेम करता हुआ और और जीता हुआ मैं एक कन्फ्यूज्ड किशोर था. मुझे जावेद अख्तर के लिखे मीठे गाने अच्छे लगते थे, देर रात में कुमार सानू और सोनू निगम को सुना करता. जिनमें बेशुमार, तितली, नदी, पहाड, झड़ने, बादल, रंग, बारिश, आंचल और मदमाते नयनों का जिक्र होता. मुझे सोच कर सारी कायनात मुहब्बत से सराबोर लगती. तब मुझे बहुत कुछ कहाँ पता था... लेकिन जो पता था वो यह कि तुम्हीं सच हो और पूरे जगत में बिखरी हो. हर किताब और गिफ्ट पर बड़े भलमनसाहत से लिखता था लव इज लाइफ. 

तब कहाँ पता था कि मुहब्बत फुर्सत में किया जाने वाला काम है. भोलेपन में मैंने कई सच्चाईयां झुठला दी थी. मैं तुम्हें सोच कर पत्ते तोड़ता और उसे संभल कर शर्ट कि जेब में रख लेता... रखे रहता, फिर धुलते  वक्त उसमें दाग लग जाते.

तुम्हें सोचने के सिलसिले में एग्ज़ाम में फेल होता रहा और मैं बड़े घमंड से अपने दोस्तों को बताता रहा कि कैसे किसी के लिए ऐसे काम करने में कितनी खुशी मिलती है. मासूमियत ने मेरे असली सिरोपा को पूरी तरह ढँक लिया था. मैं उससे बाहर नहीं निकलना चाहता था. मेरे बस्ते में किताबों से ज्यादा, तुम्हारे दिए फूल, पत्ती, उपहार रहते थे जिनका बोझ उठाये मैं कई सदियों तक चलता रहा मुझे तब वो बोझ नहीं लगता था अलबत्ता बाबूजी कहते रहे कि ज्यादा बोझ उठाकर चलने से गति धीमी पड़ जाती है.

मैं कितना बड़ा चूतिया था !

जिस पल तुमने मेरे जीवन से मुंह फेरा था और लौट का जा रही थी, तुम्हारी पीठ एक युग में तब्दील हो गई थी... वे उसी पल विलुप्त हो चुकी संस्कृति का हिस्सा बन गया. मैंने उस सदी की कुछ छाप बचा रखी है. तुम्हारे उस फैसले को सहेज रखा है. वो पल प्याले में हल्का हिलता शराब की आखिरी घूंट ही तो थी जिसे तबियत से बिना मिलाये घोंट ली गई थी. वैसे घोंट तो कई और चीजें भी दी गई थी जिसे उँगलियों पर किये गए एहसान के रूप में गिनाया जा सकता है जैसे - सपने, भविष्य, दुनिया फलाना चिलाना आदि. हुंह.

तुम्हें मुंह कहाँ फेरा था ........  (बदला हुआ नाम) बस मेरी नज़र घुमा कर मेरे गर्दन पर छुरा फेरा था.

तुमसे बिछड़ने के बाद तो लगा जैसे कोई जुनून ही है जो मुझे चला रही है, मुझे सबको साबित करना पड़ा कि मैं सांस ले रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, जी रहा हूँ, शादी-ब्याह में शरीक होना पड़ा, हंसना पड़ा. मुझे लगता था जैसे किसी कर्फ़्यू वाले दिन मुझे घेर का गोद-गोद के मारा गया है और मैं विछीप्तों की भांति कोने खोजता रहा. मैं इत्मीनान से मारना चाहता था गुमनामी कि मौत लेकिन आसमान चाहता था कि मैं अधमरा कर के छोड़ दिया जाऊं.

आज बेशुमार सच्चाइयों को जान रहा हूँ. तब उन भोलेपन से निकलना नहीं चाहता था. आज भी कलेजा नहीं हो सका है कि मैं भी मुहब्बत करने वालों को चुगद कह दूँ अलबत्ता हौसला जुटा रहा हूँ.

एक खवाहिश जरूर होती है कि मैं चित्रकारी करूँ और उसमें इंसानों के नाक बड़े रखूं, औरतों की छातियाँ जरुरत से ज्यादा बड़े रखूं. क्योंकि जो चित्रकार ऐसा करते हैं उसका मतलब समझ रहा हूँ.

 *****

चलते-चलते : आज शायद दर्पण का जन्मदिन है...... तो मेरे भविष्य बर्बाद होने की टिपण्णी करने वाले इस युवक के नाम ढेर सारी दुआएं और मुबारकां. आप आज अपने जाम की आखिरी घूंट जरूर शिद्दत से मिला कर पीएं. इंशाल्लाह, जल्द साथ बैठेंगे.

Friday, September 17, 2010

फरजंदा


इतवार का दिन था और सुबह के साढ़े दस बज रहे थे.

फरजंदा गुसलखाने से खुली हुई मैक्सी में जिसके घेरे बड़े फैले हुए थे, नहाकर निकली. उसके हाथ में प्लास्टिक की बाल्टी है जिसमें धोए हुए कपडे थे. रस्सी पर कपडे डालने से पहले वो नीचे झुक कर बाल्टी में कपडों का पानी निचोड़ती है. उसके बाल भीगे हुए हैं जिसके बायस मैक्सी के नीचे का अन्तःवस्त्र और और नुमाया हो रहा था. ठीक पांच कदम पीछे सिर पर पगड़ी बांधे हैदर बैठा था जो अपने आँखों के ठीक सामने बांस के पेड़ पर लगे निशान को लगातार देखे जा रहा था. फर्जन्दा के झुकने-उठने के दरम्यान उस निशान को देखना बाधित हो रहा था लेकिन हैदर अभी कुछ देर वहीँ देखते हुए सोचते रहना चाहता था.

अपने को इस काम में मशगूल कर उसने अपने पायजामे की जेब टटोली, बीड़ी निकाली और जला ली. दोनों पैर जोड़े, अंगूठे और तर्जनी को गोल बना, उनके बीच दबी बीडी का कश लेने लगा. सोचते हुए उसे बीड़ी खत्म  होने का ख्याल तब आया जब उसकी ऊँगली जलने लगी. यूँ छज्जे का काम कर रही खपरैल के नीचे इस कोण पर बैठ कर धूप में भी देर तक धुएं का बने रहना बड़ी ताज्जुब सी बात थी.

फरजंदा कपड़ों को टांगने के लिए बार बार झुकती और उठती. इससे हैदर के सामने बांस वाले पेड़ में निशान देखने में और उससे लिपटे किसी जंगली पौधे को देखकर सोचने में खलल हो रही थी. बांस का पेड़ काफी उम्र दराज़ था, उसका कच्चापन जाता रहा था, वो पीला पड़ रहा था, उसमें पत्ते निकलने की दर कम हो गई थी.

हैदर ने अपनी ज़िन्दगी से उसे जोड़ कर देखना शुरू किया. मैं भी एक बांस का पेड़ हो सकता था, अपने बूते सीधा खड़ा रहता, शायद हूँ भी मगर इन सारे जंगली पौधों के तरह मेरा आने वाला परिवार मुझसे लिपटता गया और पहले का परिवार टूटता गया.

फरजंदा दो पल के लिए फिर झुकती कर उठती है.

आख़िरकार नजारे में खलल पैदा होने से तंग आ कर हैदर उस दृश्य को देखना छोड़ देता है, यों छोड़ देना तो वो अपने मन में चल रही मौजूदा फ़िक्र को भी चाहता था पर वो इसमें इस कदर महलूल हो चुका है था कि पेड़ से नज़र हटाने के बावजूद ख्यालों में अब तक वही बात जमी थी.

हैदर की नज़र अब फरजंदा के कूल्हे पर टिक गई.... चौड़े चलके कूल्हे जो दूसरी बार बच्चा पैदा करने के बाद और फ़ैल गए थे,  जो कि इस वक्त अपेक्षाकृत ज्यादा चौड़े लग रहे थे या शायद हैदर की ख्याल-ओ-फ़िक्र से जुड कर ज्यादा लग रहे थे.

क्या यही है वो फरजंदा जो कई बरस पहले मेरी मुहबब्त थी? जिसके साथ हमने ज़िन्दगी के कई हसीन पल बिताए फिर जिसने मुझसे शादी की और बिस्तर पर अपनी आगोश में लेकर ब्लैकमेल करने लगी, सबसे तुडवा दिया, अपनी जिद मनवाने लगी... हाँ फरजंदा उन्ही औरतों में से थी जो बदन सौंपने से पहले या उस दौर में अपने स्वार्थों, अपने हितों का सौदा करती थी. उसके हित आगे चल कर और ज्यादा विस्तृत हो गए थे. उनमें बच्चों की  खातिर का शर्त भी जुड़ने लगा था. थकान से हारे पति को दस नज़रंदाज करने वाले किस्सों को सुनाते हुए उन्हें फरजंदा जरुरी बना दिया करती. क्या यही वो औरत है जिसकी दिलफरेब अदा देख कर मेरे मुंह में नमकीन पानी भर आता था ? 

हैदर ने इरादा किया कि अगर वो अभी उठ कर जाये और पीछे से एक लात उसके कूल्हे पर लगा दे तो क्या हो ? एक लहजे के लिए उसे ख्याल आया कि वो मिटटी के घरौंदे की तरह गिर कर खत्म हो जायेगी.

उसने अपने माथे से पगड़ी खोली और अपना सर झटका और अपने मुंह के सारे पानी को जमा कर उसके सामने ज़मीन पर थूक कर कहा नहीं यह वो औरत नहीं है

एकबारगी लगा जैसे उसने अपने ज़िन्दगी से फरजंदा को थूक दिया हो.

Tuesday, September 14, 2010

ऐसी उदासी बैठी है दिल पे...




कैमरा घूमता हुआ पर्देदार बाथरूम को दिखता है, जहां शुरू में अँधेरा है पर आसपास चंद मोमबत्तियाँ जलने के बायस पीली रौशनी ने घेरा बना रखा है और इसी के वज़ह से देख पाने लायक उजाला है... यह देख कर देखने कि जिज्ञासा और बढ़ जाती है ठीक वैसे ही जैसे थोडा दिखाना और बहुत छिपाना

पृष्ठभूमि में बांसुरी बजता है.

कैमरा फिर बाथटब पर फोकस करता है, जिसमें रखे गुलाब की पंखुड़ियों के बीच निर्वस्त्र नायिका नहा रही है, सीन पीछे से लिया जा जाता है... नायिका बाथटब में गर्दन पर हथेली लिए उठती है, उसके लगभग कन्धों को छूते बाल बेहद अनुशासित हैं.....इसी दरम्यान अँधेरे और पीली रौशनी से मिलकर थोड़े सुनहरे और तम्बाई  रंग के रौशनी के बायस नायिका का भीगा हुआ, गदराया पीठ जिसमें कई करवटों के पेंच हैं और जोकि गालिबन गोरा है, नमूदार होता है. उठते वक्त उस गीली धडकती दीवार पर गुलाब कि एक पत्ती भी चिपक जाती है. जो तुरंत ही बगैर किसी सराहे के गिर भी जाती है... फिर नायिका अपनी आखिरी अंगूठी भी उतारती है


... और दर्शक फटी आँखों से एकटक निहारे जा रहे होते हैं, सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हुआ जाती है, एकाग्रता अपने पराकाष्टा पर होती है लेकिन उसी पल में कुछ और भी देखने को चंचल हुआ चाहती है. यह एकाग्रता और चंचलता का अनोखा संगम होता है, जैसे उठकर जाने का ख्याल तो आता है पर उठ नहीं पाते... एक गैर-इरादतन दीवार खड़ी हो जाती है...  मन का हिरण देह के जंगल में कुचालें भरते हुए यहाँ से वहाँ दौड़ने लगते हैं, पलकें हल्की गर्म होने लगती है.

अचानक नायिका कुछ उठाती है और अपने हाथ की नस पर ब्लेड रखकर, 
नहाये हुए शराब और गुलाबी पानी में अपने खून का रंग घोल देती है. दरया में भगदड़ मच जाता है... जिस्म का खून, बाथटब के पानी से लोहा लेने लगता है, हलचल मच जाती है, नायिका की आँखें भर आती है, गले की हड्डी खींच जाती है... और दर्शक एकबारगी यह नहीं सोच पाते कि ऐसा करते हुए वो राहत महसूस करेगी... उसके चेहरे पर मुस्कान घुल चुकी है. कैमरा उसके प्रसन्नचित्त चेहरे को होल्ड करके रखता है. और पूरे सीन की सारी खूबसूरती पीठ से निकल फिलोसोफी में घुलने लगती है.

इस तरह, सारे आनंद, सारी सुविधाओं के बीच दर्द यह बताना नहीं भूलता कि बेटा मैं शाश्वत रूप से तेरे साथ हूँ.
यह बिलकुल ऐसा ही लगता है जैसे...

स्वीमिंग पूल में बड़ी हसरत से तैरने उतरे, थोड़ी देर बाद अघाकर डूब मरे फिर लाश भारी हो तैरने लगा.


Thursday, September 9, 2010

यहीं, रत्ती भर की दूरी पर...


सारे अरमान और सपने दिल में समेट कर एक सांस में उसे बाहर लंबी ठंढी आह भर कर बाहर फैक दिया, बाहर पैंतालीस डिग्री के कोण से अन्धकार बरस रहा है. इस कोण पर तो इंसान का अभिमान भरा गर्दन होता है...

रत्ती भर का फासला है उस तरफ ... बस खेल खत्म ही समझो, बला से मुक्ति, उधेड़बुन से निजात पर क्या यह मोड इतिहास का बड़ा बदन मोड होगा? क्या इसे पढते वक्त कोई पाठक यह पन्ना मोड कर रखेगा? कोई पेंच, गुलाब, रेशमी धागा या मार्कर को बरतेगा ?

उस पार कितनी शांति है, बीच में थोडा सा गंदला पानी जरूर है जैसे बरसात में खोली और गली के बीच में होता है पर जब पार करने के लिए ईंटों पर पैर रखते थे तो उम्मीद होती कि तर गए लेकिन याद है कैसे वो भीतर से खोखली हुआ करती और पाँव बीच पानी में उलट जाते... एक छपाके से डूब जाते, पूरी सांस फिजा में निकल जाती, गर्दन तक डूब जाते मनो दिल डूब गया हो... और हर बार एड़ियों में मोच रह जाती.

उदासी के हसीन टुकड़ा सामने दिखा, वक्त हमको कुत्ते की तरह ललचाता है उसको उछल कर लाख पकड़ना  चाहते हैं, हाथ नहीं आता. आज जब सारी आकृति ने मुझसे संतोष कर लिया है तो यूँ निकम्मा मरते अच्छा नहीं लग रहा.

जाने कैसी मनहूस घडी है, काकी के पेंशन के पैसे खतम हो गए और दादी के अचरे में बीड़ी भी नहीं हैं पर मेरे जैसे मतलबी आदमी के पास दारु रहते हुए भी इसकी घूंट कसैली लग रही है...

कभी ऐसा भी होता कि मरीज को तसल्ली हो जाती कि सामने वाले ने उसका मौजूदा हालात और हालत दोनों समझा है. काश हर बार उफुक देख कर प्यार से इतना कहते री सखी, तेरे राज़ मैं जानता हूँ, देख मेरे मुख पर कैसी भावुक सी प्रसन्नता है, यह हंसी में नहीं बदलती है, बस इसकी चमक आँखों में झलकती है

ज़िन्दगी भी तो एक सिनेमा है इसकी स्क्रिप्ट भले ही कमजोर हो पर कुदरत ने प्रकाश व्यवस्था अच्छी कर रखी है. उसको उठाने में, जीने में, बरतने में...

राजेश बाबू पनीली आँखें लिए मुस्कुराते हैं... जैसे सब जानते थे. रूह का एक-एक सिरा पकड़ कर बुनकर के माफिक बड़ी कुशलता से सुलझाते थे...


Saturday, September 4, 2010

ज़िन्दगी... हमको भी हमारी खबर नहीं आती



बंद कमरे के घुप्प अँधेरे में भी बदन में तिल खोज देने जैसा परिचय था दोनों का. नयी-नयी शादी थी... तन समर्पित करने के दिन तो थे पर संसर्ग के दौरान ही मन भी समर्पित होने लगे.... देवेंद्र जब भी गर्म साँसें पत्नी के चेहरे पर छोड़ता तो सुनीता के इनकार के कांटे मुलायम हो जाते फिर दोनों चारागाह के मवेशी हो जाते. फाल्गुन के फाग जैसा नशा छाया रहता, उन्मत्त, उन दिनों बदन, बदन नहीं गोया एक खुलूस भरा तिलस्म हुआ करता जिसे सहला कर जिन्न पैदा करने की कोशिश ज़ारी रहती, जाने क्या-क्या तलाश की जाती... देवेन्द्र  तो बरसों का प्यासा था और उसने यह तलाश अब सुनीता को भी दे दी  ... और एक दूसरे में यह तलाश हर स्तर पर थी ... शारीरिक, आत्मिक, अध्यात्मिक और पारलौकिक

स्पर्श की अनुभति सर चढ कर बोल रही थी... देवेन्द्र को बलजोड़ी करने की आदत थी सो वो अपने सख्त हाथों से कलाई पकड़ कर पत्नी का हाथ मरोड़ता रहता, अपने आगोश में ले किसी अजगर के पाश सा जकड़ कर उसे तोड़ देने की कोशिश करता... इससे सुनीता के नाज़ुक और मरमरी हाथों में तब एक छुपा हुआ दर्द उभर आता... सुनीता को को खीझ आती पर पागलपन की इस दीवानगी में आखिरकार उसे देवेन्द्र के बाहों में ही उसे आना होता... पति को गुरुर था तुम्हें आना ही होगा का पत्नी उसे जिताकर उसका दर्प बरकरार रख रही थी...

...और थोड़े देर बाद दोनों वाइल्ड हो जाते.

एक ही घर में रहते हुए वो सारे कदम उठाये जा रहे थे जो हर पल  उत्सुकता, रोमांस और रोमांच को बढ़ावा दिए रहता... मसलन एक दूसरे को खत लिखना, लुक्का छिपी का खेल खेलना और वो भी जो टाइम्स ऑफ इंडिया के जुम्मे वाले दिन का परिशिष्ट व्हाटस् हॉट में होता है....

इतवार की शाम थी, एक भरपूर नींद ले दोनों उठे थे, सुनीता ने देवेन्द्र के माथे में तेल लगाया और फिर देवेन्द्र ने दीवार पर माथा टिका हद दर्जे की बेशर्मी भरी बातें की... सुनीता की गर्दन शर्म से झुक-झुक जाती... लिजलिजी होकर सुर्ख होती और आखिरकार अपनी गेशु, माथे, पलकें, आँखें. गर्दन और कंधे फिर उससे नीचे फिसलती देवेन्द्र की तेज, चुभती और फिसलती नज़र के सामने हार जाती और वापस उसके आगोश में ठिकाना पाती... उसे यह शर्त पहले की जगह ज्यादा माकूल लगता.

इन दिनों के आइना भी नयी दुल्हन के निखरते हुस्न पर एक कुटिल मुस्कान मुसकाता था. दुल्हन की मांग निखर आई थी... वहाँ भुरभुरे, नर्म, सूखे लाल मिटटी जैसा सिंदूर हुए चार चाँद लगाता था.

दो महीने बाद...

दानापुर छावनी, बिहार रेजिमेंट के इसी लांस नायक के द्रास सेक्टर में शहीद होने का तार जब घर आया तो खत के अक्षरों में दरार पड़ गए फिर वो फट गए...

तेरह दिन बाद...

आँखों के आंसू अब सुख चुके थे लगातार तेरह दिन रो लेने के बाद अब सिर्फ सिसकी भरी घुटन बचती थी. शायद ही कोई ऐसी ही विरल याद होगी जिसे याद कर वो ना रोई हो ... पर तलाश अभी जारी थी जिससे फिर आंसू गिर पड़े, जीने का अहसास हो, कम से कम यह तो पता चले की इस बुत में में जान है. ... कभी कभी उसे विश्वास करना बड़ा मुश्किल होता की देवेन्द्र सचमुच इस दुनिया में नहीं है... दीवारों पर लगे हुए एक लगभग गोल तेल के निशाँ देख लगता मानो देवेन्द्र अब भी बैठा उसे चिढा रहा है... उसे सोचते- सोचते सुनीता के कलाईयों में मीठा दर्द उभर आता...

कोप भवन बन चुके घर के कमरे में एक शाम जब सुनीता ने माचिस जलाई तो सबसे पहले जो चीज़ रोशन हुई वो उसकी मांग थी... वहाँ दोनों हाथों की हथेली भर उजाले का झाग फ़ैल चुका था ... एक लंबी पगडण्डी,  सूनी, अंतहीन, उदासी के स्याह अँधेरे में डूबी, बाहर झींगुर बोलते थे पर यहाँ हर आवाज़ घुट कर मर चुकी थी. .    

... शायद देवेन्द्र को भी यह पता था वो अधिक दिनों का मेहमान नहीं है संभवतः इसीलिए उसने प्रेम जैसी कोई चीज़ सुनीता के जीवन में नहीं छोड़ी थी... प्रेम तो बस सुनीता मान बैठी थी... वो बिगड़े घर का लड़का नहीं था पर यह कोई नहीं जानता था कि वो सुनीता के आने वाले जीवन से क्या चाहता था... उसने वल्गारिटी के सिवा पति जैसी कोई याद नहीं छोड़ी जो नज़र आती हो... इसके लिए वक्त भी नहीं था.

सुनीता उन संदेशों को पढ़ कर अब भी सिसकती है... कभी कभार वे पत्थरों जैसे अक्सर जिसे हम विधि का विधान कहते हैं अभी भी सुनीता के आंसू के बायस फट पड़ती हैं. 

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...