Wednesday, February 16, 2011

बोल ऐ खूंखार तन्हाई किसे आवाज़ दूँ ?



ऑरकुट पर तुम्हारे फोटो पर ढेर सारे कमेन्ट आते हैं। आज भी साड़ी को कांधे पर पिन-अप वैसे ही करती हो जैसे मुझे अपने सीने पर लपेट रही हो। जाने कैसा हुस्न समेट रखा है। तुम जानती हो मुझे ज्यादा जलन नहीं होती। मेरी पहली प्रेमिका किसी और की हो गई, मुझे जलन नहीं हुई। लेकिन तुम्हारा किसी का होना मुझसे बर्दाश्त ना हो सका। यकीन जानो मैं अब भी जब तुम्हें तुम्हारे पति के पहलू में सोचता हूं तो मुझे जलन होती है। हालांकि तुम्हारी शादी को चार बरस, तुम्हारा मुझसे मिलना के दो बरस और हमारा बिछड़ना तीन बरस का हो गया। इन दौरान तुम्हारा बेटा भी दो साल का हो गया। क्या अजब है कि हम सब कुछ हम साल के हिसाब से हम नापते हैं।

तुम्हारा बेटा ठीक तुम पर गया है। आँखें, होंठ सब वैसा ही, उसका चहकना भी ठीक वैसा ही. मैं जानता हूं तुम्हारा पति बहुत खूबसूरत है और तुम भी किसी पठानी शहजादी से कम नहीं हो। तुम्हारी जोड़ी भी अच्छी जमती है। 

लेकिन यह आज भी उतना ही सच है कि तुम्हारा पति तुम्हें औरत नहीं बना पाया। तुम लड़की ही रह गई। तुम्हारी आखों में आज भी वो कवांरी लड़की ही मुस्कुराती है। सबको धोखा देने वाली चेहरे में वही चमक मौजूद है, आंखें आज भी वैसी ही हैं जैसे कसे कच्चे आम की फांक हो और तुम्हें पाने का लालच भी वैसे ही बना हुआ है जैसे स्कूल के दिनों में हम ब्लेड से कच्चे आम को छीलकर नमक के साथ खाने का ख्याल। इसके के तुम्हारा बहुत सम्मान करने के बावजूद मैं यह कहने से खुद को रोक नहीं पाता तुम बहुत सेक्सी हो।

मैं यह सब बातें मुझे मालूम है वो तुम्हें तुम्हारी सही अक्स, तुम्हारे अस्तित्व के बारे में भी नहीं बता पाया होगा। वो इस जिम्मेदारी का अहसास कराने में भी नाकामयाब रहा होगा कि तुम किस कदर हस्सास और खूबसूरत हो। यकीनन ऊबे हुए मन से या फिर कभी किसी वेलेंटाइन डे पर उसने तुम्हारी तारीफ की होगी लेकिन उसे सुनकर तुम्हें ‘ठण्ड नहीं लगती‘ होगी।

आज तीन बरस हो गए। मैं लगभग तुम्हें भूलने के नाटक करते-करते तुम्हें भूल चुका था। लेकिन जब ऑरकुट पर देखा तो जख्म हरे हो गए। 

इस फरवरी में जब अपना शरीर चीड़ कर छत पर सुखाने का वक्त होता है मैं जिस्म सिकोड़ कर बैठा हूं। बस एक कमरा है, सामने दीवार है (और यह वही दीवार है जिसका आड़ लेकर तुम दोनों हाथ उठाकर बड़ी बेफिक्री से अपने बाल समेटा करती थी दीवार तुम्हें सामने से यूं देख सांस लेने लगता था और गढ़ढे पड़ते पीठ को देख मैं आहें भरता था) मेरा सर घुटने पर है और घुटने पर घुटता हुआ मैं हूं। आंसू तो अब आते नहीं चुनांचे पलकें गीली भर होती है। वो कतरा कितना खुशनसीब है कि जिस दायरे में जनमता है उसी में सूख जाता है।... बेहतर था पांच सौ पांच नम्बर वाली बस में आग लग जाती और हम जलकर खाक हो जाते। 

हमारे बीच दुनिया का रद्दे अमल हमेशा झूलता रहेगा।

यूं सुख में रहकर भी तुम मुझसे ज्यादा गरीब हो। मैं तो लिख भी लेता हूं जानेमन, तुम क्या करती होगी !

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