Thursday, February 17, 2011

ना बात पूरी हुई थी कि रात टूट गयी...


एक सुस्त सा मौसम चल रहा है गदर मचाता हुआ। जैसे सबसे फुर्सत वाले दिनों में ही हम गौर कर पाते हैं हर चीज का घटित होना। ये बात अलग है कि तब उसका एहसास नहीं होता और अत्यंत व्यस्ततम क्षणों में उसके लिए तरसते हैं, उसकी लज्जत महसूस होती है। इन दिनों जो सुन रहा हूं, देख रहा हूं सब ठहरी हुई हैं। 

आसमान में ठहरा सफेद बादल बह रहा है, गमले में उगा पौधा भी बढ़ रहा है। दुनिया नित नई रोज आगे जा रही है (?) सरकार नए कदम उठा रही है। नए पनपते प्यार वादा कर रहे हैं। मिस्र में जनता की आवाज़ सुन ली गई है। बस अंधेरे उजालों में छिपता तुम्हारा हुस्न मुकम्मल नहीं होता। 

एहसास वही हैं पर हर बार उन ख्यालों को नए शब्दों का पैरहन पहना रहा हू। इन ख्यालों के कपड़े उतारने के लिए नए कलफ चढ़ाने होते हैं। यह भी अजब है कि नंगे करने के लिए कपड़े पहनने होते हैं। हमने अपने मनोरंजन के लिए कितना कुछ बना रखा है। तुम्हारी याद के अक्स के इस बुखार का आज सांतवां दिन है। बिस्तर से उठ नहीं पा रहा लेकिन यह क्या है कि मेरे बदन पर पर सकून की गुदगुदी कुछ इस तरह से हो रही है जैसे गर्म पानी की बोतलें घुड़क रही हो। 

मैं तुम्हारा पति नहीं हूं कि तुम्हारे सीने को अपने पीठ पर महसूस करूं अलबत्ता तुम्हारा कंधा थपथपाते वक्त जो समझदारी हमारे आंखों में पैदा हुई उसके बाइस तुम्हारे सीने की बनावट अपने छाती पर महसूस करता हूं। 

सिगरेट और शराब बस सिर्फ इसलिए कि ये आसानी से मयस्सर है। ये अब मज़ा नहीं देते। अब तो अफीम चाहिए जानां। कम से कम हलक से उतरने के बाद अपना असर हुनर तो दिखाएगा तुम्हारी तरह नहीं कि जाओ तो दिल पर कोहसारों की तरह पैठ जाओ और हकीकत में पैरों के निशान तक बुहारती जाओ।

कभी मैंने तुम्हारा तलवा सुलगाया था. तुम मेरा वजूद फूंक दो तो तुम्हारे नक्श में मैं जज्ब हो जाऊं कि मैंने प्यार के नर्म एहसासों को एक अरसे से लिखना छोड़ दिया है। कि यह पढ़कर मुंह का जायका ख़राब हो जाता है, आंत से उठती हुई तड़प जो जीभ की अंतिम छोर पर आ कर रुक जाता है, यह सिलसिला खत्म हो.

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