Monday, March 7, 2011

अवसाद का गाढ़ा रंग



मांमरगई.जल्दीआजाओ

किया गया तार इतना ही छोटा था। छर्रे जितना छोटा और हृदय में धंसता हुआ। पैर तो एकबारगी उठे ही नहीं थे। यों लगा था जैसे धरती का बोझ बांध दिया गया हो। अब यह बोझ आगे बढ़े तो कैसे... अगला कदम आगे बढ़ाते ही महसूस हुआ दिमाग में कसी गई प्लेट ढीली कर अपने धुरी पर घुमा दी गई है। एक जोरदार झन्नाटा आया और बाएं हाथ पर दो कदम दूर जाकर गिरे। लोग इसे सर में चक्कर आना कहते हैं।

यह शौक अधूरा रह गया कि कमरे के दो अलग अलग कोनों में बैठकर हम रोएं। ऐसा मैंने प्रेम में सोचा था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमारा मूड एक सा हो। कभी मैंने उसके गोलों पर रूका आंसू का वह कतरा पीया था तो कभी वो माथे पर थपकियां देती और मेरी सांसों को अपने उभारों के बीच बसाने की भरसक कोशिश की थी। यह इंसानी फितरत है कि एक रोते हैं तो दूसरा उसे चुप कराने लगता है। मुझे मेरे चाचा की आकस्मिक मौत याद आती है जब एक जवान अकाल मौत हुई थी। आंगन में एक साथ पूरा परिवार बिलख रहा था। सब बिलख रहे थे और दूसरे को चुप करा रहे थे। सबकी आंखे मछली के गलफड़े जैसे ताजे लाल थे। उनमें हारे हुए का बोध था या नहीं मैं नहीं कह सकता। हां चूल्हे में राख हुआ एक आधा जलावन जैसी मुर्दानी छाई थी।

सिहरा किससे जा सकता है ? घटना की वीभत्सता से, कल्पनामात्र से, श्मशान में आधी रात जलते शव के पास बैठ कर कुछ अनसुलझे मर्म के खुलने के एहसास से या कि पीठ पर लेकर किसी लाश को घाट घाट पर ‘यहां नहीं जलाओ‘ के आदेश से ? आखिर क्योंकर कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है ?

बहुत पतली गली से जब तुम लोग इतने पास से निकले थे तो हरगिज हरगिज यकीन नहीं था कि आप लोगों की सांसो को आखिरी बार सुन रहा हूं और तुम... तुम्हारे लिए तो सिर्फ इतना याद है कि पिताजी की डांट लग रही थी और तुम्हारी पीठ पर पसीने की धार चल रही थी।

सुना है शब्द देने मात्र से चीज़े जिंदा हो जाती हैं? फिर क्यों नहीं जिंदा हो जाते हैं वो लोग जो गाहे बगाहे हमारी लिखावट में उतर आते हैं ? इस समय जब फूल लदक रहे हैं शाखों पर और डालियां वसंत में इतरा रही हैं तो यह कौन सा शाप है जो अवसाद का रंग गाढ़ा किये हुए है ? यह कैसी जगह है जहां मैं जो घोट रहा हूं मुझे इसका इल्म नहीं है कि यह सेहत पर क्या असर डाल सकती है।

गले में अगर शराब का स्वाद रूका रहे तो पीना छोड़ दिया जाए। नीलकंठ ने जैसे ज़हर रोके रखा है वैसे ही हमने भी कुछ सवाल हलक की धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर रखा है। उसका नीचे उतरना हमारी दिखावटी मौत होगी और उगल देना हार। तो इन सवालों को रोके रखकर जो उकेर रहा हूं, उरेक रहा हूं, उलीच रहा हूं वही मेरे जीवित रहने का प्रमाण है।

10 comments:

  1. maut ..jitni sach utni darawni... kitne anubhav se gujarte hai hum us samay jab koi bhi ye duniyaa chhod kar jaata hai...

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  2. पता है सागर...कभी कभी तुम ऐसा लिखते हो कि लगता है कि सामने होते तो कंधे से पकड़ कर झकझोर पर पूछती कि 'क्यों?' क्यों लिखे हो ये तुम...क्यों लिखते हो ऐसा. कैसे लिखे, कैसे लिख पाते हो नहीं...

    मुझे मालूम नहीं ऐसा ख्याल उठाना तुम्हारी जीत कही जायेगी या हार.

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  3. सुबह जों पोस्ट पढ़ी थी...तो एक अजब नशा था उसका....इस पोस्ट को पढ़ते-पढ़ते महसूस हुआ कि चेहरे के भाव बदलते जा रहे है....मुमकिन है अवसाद तक पहुचने का एहसास जैसा कुछ हो .....कुछ अलग तो था क्या मालूम नहीं...

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  4. शब्दों में अवसाद का गाढा रंग खौलता नज़र आता है...

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  5. सागर भाई ,
    आपको पढना एक अलग ही अनुभव है

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  6. मौत जीवन का इकलौता अनुभव है |
    बढ़िया पोस्ट सागर

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  7. हथकढ़ और सोचालय.. अलग अलग शराब पर एक सा नशा..

    शब्दों का चयन इतना उम्दा है कि क्या कहे..

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  8. एक लेखक कि लेखनी जब इतनी सशक्त हो जाये की अपने लिखे से वो पढ़ने वालों का मूड बदल दे... उन्हें उस ख़ुशी, उस पीड़ा से गुज़रने पर मजबूर कर दे जिससे वो और उसके किरदार गुज़रे हैं लिखते वक़्त, तो उसका लेखन सफ़ल कहलाता है... और आप साग़र साहब तो इस फ़न में माहिर होते जा रहे हैं दिन-ब-दिन...

    पोस्ट कल ही पढ़ ली थी पर तब कुछ कहते नहीं बना था... आज दोबारा पढ़ा तो सोचा बता दूँ... ना ना तारीफ़ नहीं कर रही हूँ :)

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  9. सवालों को उनके निष्कर्षों पर पहुँचा दीजिये, प्रत्यन्चा चढ़ी रहने से कष्ट बना रहेगा।

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