Thursday, March 10, 2011

आओ आने की करें बात कि तुम आये हो !!



उसके आने की जब खबर महकी थी तो वो उतनी बड़ी नहीं थी जब सच में उसके कदमों की आहट आने लगी क्योंकि उसने आने को कई बार कहा था। ऐसा ही लगा वक्त ने एकदम आंखों के पास माचिस की तीली जलाई हो। इस झूठे आने को कहने पर उसे एकबारगी ऐतबार तो हो ही जाता था। और नहीं भी होता था तो यह एक खूबसूरत छलावा था, मन में घूमने वाला एक काल्पनिक छल्ले की तरह। दिल को अच्छा लगने वाला झूठ। 

झूठ भी दो तरह के होते हैं एक जिसे सुनकर तन बदन में आग लग जाए, आपका तलवा लहर जाए तो दूसरा जिसे सुनने को आपका दिल बार-बार दिल करे। जैसे किसी लड़के की कई प्रेमिकाएं हो और एक नई लड़की जो उसकी दोस्त बनी हो वो भी उससे आई लव यू सुनने की इच्छुक हो। एक संतुष्टि प्रदान करने वाला झूठ मानो बेटा उम्र के एक बड़े मोड़ तक बेरोज़गार रहे और मां को दिलासा देता रहे - अम्मा दो रोटी भी कमाऊंगा न, तो एक- एक खा लेंगे.... और मां इसे सुनकर वारी वारी जाए। 

अपनों के कदमों की आहट अपने आप में एक पुरकशिश कहानी होती है। दिल को धड़काने वाली। करीब आती जाती और पेट में एक मीठा सा दर्द उठाती हुई। जैसे सुहागरात में सेज पर दुल्हन की आंखें बंद हों और पति देर तक कोई हरकत न करे। दुल्हन का मन वन में कुंचाले भरती हिरणी सी हो जाए। एक छटपटाहट, आंखे खोलकर देखना चाहे लेकिन पलकें भींचे रहे और साड़ी में आधा छुपा पेट वैसा ही हरकत करे जैसे मानव हृदय का गुब्बारा फक-फक करता है।

उस अपने की कदम की आहट छोटी-छोटी सांस वाली शहनाई की आवाज़ जैसी भी लगती। घर की सारी चीज़ें अपने जगह से हिली हुई लगती। दीवार धसके लगते, किताबों का ताखा तिरछा लगता। पलंग का तखत का रंग ज्यादा कजली सा लगता, घर की सभी चीज़ें रोकती लेकिन वो इन्हें देख कर भी अनदेखा करती। हर चीज़ के साथ व्यवहार बदला हुआ था लेकिन अनिभय ऐसा मानो ‘नहीं-हां मैं तुम्हें समझ रही हूं‘, ‘मुझे किसी चीज़ की जल्दी नहीं है‘ जैसा।

अब कहां फुर्सत थी! कांटी पर टंगे करछुल को सीधा करने की जिसके लिए छोटी बहन को सज़ा दिया जाता। हर चीज़ को रखने का एंगल बताया जाता। सहेजने और बरतने का सलीका समझाया जाता। जिंदगी काट कर रखी हुई थी और तनहाई ने खीझ पैदा कर थी। कभी रो लिया जाता तो कभी किसी छोटे बच्चे को पकड़कर दो तमाचे मार दिए जाते।
नेक लाइन के गड्ढे गहरे हो जाते, जहां अक्सर नहाने के बाद पानी की एक बूंद देर तक रूकी रहती। कई बार तो रूके रूके ही सूख जाती तो कई बार वो उसके देख लिए जाने के बाद होंठों से चुन ली जाती। एक बार तो उसने कह भी दिया था सबमें लड़ाई होती होगी मैं यहां ठहरूंगा।

उसकी दुनिया जबसे छोटी हुई यह आहट ही है जिसे सुनकर जीवन के तमाम गंगा घाट पर दीये जल जाते और उसके बाइस पानी में एक शरारे पैदा हो जाते।

प्रेमिका इतनी संवेदनशील कि काम करते, सोते जागते उसके आने का एक खदशा होता। सूनी सी गली मन के एकांत में दूर तक रेंग गई थी लेकिन जब आज सीढ़ी पर आदमकद छाया देखी तो पूरा बदन झूठा (सुन्न) पड़ गया और अब पवित्र मिलन से जूठा होने की बारी थी।

7 comments:

  1. शीर्षक जगजीत सिंह की इस ग़ज़ल से

    http://www.youtube.com/watch?v=B_-N1SdGCOI

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  2. एक संतुष्टि प्रदान करने वाला झूठ मानो बेटा उम्र के एक बड़े मोड़ तक बेरोज़गार रहे और मां को दिलासा देता रहे - अम्मा दो रोटी भी कमाऊंगा न, तो एक- एक खा लेंगे.... और मां इसे सुनकर वारी वारी जाए।

    Ye panktiyan bahut pyari lageen!

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  3. आपके अद्भुत बिम्ब यूँ लगते हैं मानो किसी पत्थर के ऊपर खूबसूरत जेवर, एक नववधू को पहने हुए देखने की लालसा है ये ज़ेवर बस अब. 'सागर-कृतं' एक मुकम्मिल कहानी पढने की लालसा है बस...

    किन्तु कृपया इस कमेंट् को अपनी बाध्यता या मज़बूरी ना बनाएँ. :-)

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  4. @ हे दर्पण,

    एवमस्तु !!!

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  5. अच्छा है ... कुछ बिम्ब तो मैं साथ लिए जा रहा हूँ...

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  6. क़दमों की आहट..अद्भुत बुनावट ...कहाँ कब सुने दी सब तो झूठ है...

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  7. रंग-पर्व पर हार्दिक बधाई.

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