Skip to main content

एक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब, जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब



जिस तरह का दिल है लगता है थोड़ा बीमार हूं और अब बिस्तर छोड़कर उठ जाने में दो चार दिन ही बचे हैं। कफ सीरफ से चम्मच पर निकाल की दवाई दी जा रही है। मीठी दवाई जिसमें थोड़ी कड़वाहट का पुट मिश्रण भी है उस चम्मच में एक जहाज की भांति हिचकोले खाती हुई लगती है। बहुत गहरे में पैठ बनाती हुई। अत्यंत कलात्मक दृश्य जैसे गदराए समतल पेट पर से फिसलते हुए पानी की एक बूंद नाभि प्रदेश की ओर गमन करती हुई उसमें प्रवेश करती है।

क्यों लगता है जैसे बहुत कुछ कर सकता हूं पर हो नहीं रहा ? क्यों लगता है अब सब कुछ अच्छा हो जाएगा लेकिन वैसे का बना रहता है। देर तक कबूतर आकाश में उड़ा तो हमें भी उड़ने का मन हो आया। हमने जी भर का नृत्य किया। नाचने के दौरान हर खुद का पक्षी भी मान लिया और भाव भंगिमा पक्षी जैसी बना कर उड़ने की नकल भी की। गोया सब कुछ कर लिया उड़ने की अनुभूति भी हुई लेकिन उड़ नहीं सका। हम हर बार लौट कर घर को ही क्यों आ जाते हैं ? एक इंसान भावनाओं से इतना लबालब क्यों होता है कि हर बार कल्पना का सहारा लेकर ही खुद को सुकून देना पड़ता है। पढ़ा लेकिन ऐसा कि लगा पूरा नहीं समझ सका। जिया लेकिन अब भी प्यास बाकी है। चूमा, वो भी ऐसा कि अपनी जीभ सामने वाले के हलक में उतार दी फिर भी तलाश बाकी है। कल का दिन निकल गया लेकिन अब भी जेब टटोलना पड़ रहा है कि पैकेट में एक आधा बुझी सिगरेट बच गई होती तो क्या बात था। आखिर तुमने किया क्या कि कुछ भी सलीके से नहीं कर सके और ढेर सारी शिकायतें बची रह गई। जब सुनहरे दिन याद करते हो फिर अफसोस क्यों हावी हो जाता है ? तर्क तो देते हो कि टूट कर चाहा जिंदगी को, डूब कर प्यार किया, जंगल जंगल भटके और सात घाट का पानी पिए बैठे हैं। वैसे भी ग़ौर करो तो सात घाट कर पानी जिसने पी लिया वो आखिरकार बैठ ही जाते हैं, फिर बैठे ही रहते हैं।

यहां कोई इतना करीब नहीं मिलता कि सबको गौर से देखें। बस दूर बैठ कर एक उड़ती सी नज़र डालनी होती है और काॅमन फीचर्स और स्वभाव से समझ लिया जाता है कि आम इंसानी फितरत क्या है। लेकिन उसमें से जिस किसी एक को थोड़ा जान रहे होते हैं वो भी अपने तो आप में विभिन्न वनस्पतियों से भरा जंगल हुआ करता है। अगर एहसासों से भरा आदमी हो और तुम्हारी ही तरह तलबगार तो देखोगे कि उसके यहां भी बौने बांस के पेड़ से लेकर मध्यम आकार का अलता का पौधा उगता है। नुकीले, पथरीले, जीवट रास्ते हैं और बहुत मुलायम समझौतों का सूती आंचल भी। ऐसा नहीं होता किसी के साथ भी कि लगातार दुख या यंत्रणा ही मिलता हो। अगर प्रायोगिक तौर पर वो बाहर तकलीफ महसूस करते हैं तो फिर उन्हें अपने तरीके से जुटाए हुए भाव, दृश्य, सोच और बरतते हुए काम से ही प्यार हो जाता है।

जिंदगी किसी सस्ते किस्म की सर्फ सी है इसमें नींबू की मात्रा ज्यादा है इससे हाथ खुरदुरे हो जाते हैं मगर कभी कोई स्पर्श करता है तो गुदगुदाहट ज्यादा लगती है।

*****

Comments

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

    ReplyDelete
  2. दिस सिटी इज रफ़ एंड इनसेंसिटिव... :-(

    ReplyDelete
  3. जिंदगी किसी सस्ते किस्म की सर्फ सी है इसमें नींबू की मात्रा ज्यादा है इससे हाथ खुरदुरे हो जाते हैं मगर कभी कोई स्पर्श करता है तो गुदगुदाहट ज्यादा लगती है।....
    mujhe zindgi thodi mirchi si lagti hamesa....si si kar ke dil rota hai...

    ReplyDelete
  4. This is interesting self innovation how much feeling one together ,we have . Self inspection is needed to overcome the .../ very good thoughts .Thanks

    ReplyDelete

Post a Comment

Post a 'Comment'

Popular posts from this blog

समानांतर सिनेमा

आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारावह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है. युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने बिराज बहू, देवदास, सुजाता और बंदिनी जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं. दो बीघा ज़मीन को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात है.

            समानांतर…

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियांमहाराष्ट्रतक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता मेंहीरालाल सेन और जमशेद जी मदनभी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों मेंप्रदर्शितहोकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों मेंप्रदर्शितकरें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारानिर्देशितफिल्म 'बिल्म मंगल'तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहलाप्रदर्शननवम्बर, 1919 में हुआ।जमदेश जी मदन (1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंनेकलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेसबनाया। यह सिनेमाघर आज भी मौजूद है और अब इसका नाममिनर्वाहै। 1918 में मदन का …

उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।

सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया। xxx उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है। xxx हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ। xxx कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे के रोने में चिल्लाहट ब…