Saturday, June 18, 2011

एक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब, जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब



जिस तरह का दिल है लगता है थोड़ा बीमार हूं और अब बिस्तर छोड़कर उठ जाने में दो चार दिन ही बचे हैं। कफ सीरफ से चम्मच पर निकाल की दवाई दी जा रही है। मीठी दवाई जिसमें थोड़ी कड़वाहट का पुट मिश्रण भी है उस चम्मच में एक जहाज की भांति हिचकोले खाती हुई लगती है। बहुत गहरे में पैठ बनाती हुई। अत्यंत कलात्मक दृश्य जैसे गदराए समतल पेट पर से फिसलते हुए पानी की एक बूंद नाभि प्रदेश की ओर गमन करती हुई उसमें प्रवेश करती है।

क्यों लगता है जैसे बहुत कुछ कर सकता हूं पर हो नहीं रहा ? क्यों लगता है अब सब कुछ अच्छा हो जाएगा लेकिन वैसे का बना रहता है। देर तक कबूतर आकाश में उड़ा तो हमें भी उड़ने का मन हो आया। हमने जी भर का नृत्य किया। नाचने के दौरान हर खुद का पक्षी भी मान लिया और भाव भंगिमा पक्षी जैसी बना कर उड़ने की नकल भी की। गोया सब कुछ कर लिया उड़ने की अनुभूति भी हुई लेकिन उड़ नहीं सका। हम हर बार लौट कर घर को ही क्यों आ जाते हैं ? एक इंसान भावनाओं से इतना लबालब क्यों होता है कि हर बार कल्पना का सहारा लेकर ही खुद को सुकून देना पड़ता है। पढ़ा लेकिन ऐसा कि लगा पूरा नहीं समझ सका। जिया लेकिन अब भी प्यास बाकी है। चूमा, वो भी ऐसा कि अपनी जीभ सामने वाले के हलक में उतार दी फिर भी तलाश बाकी है। कल का दिन निकल गया लेकिन अब भी जेब टटोलना पड़ रहा है कि पैकेट में एक आधा बुझी सिगरेट बच गई होती तो क्या बात था। आखिर तुमने किया क्या कि कुछ भी सलीके से नहीं कर सके और ढेर सारी शिकायतें बची रह गई। जब सुनहरे दिन याद करते हो फिर अफसोस क्यों हावी हो जाता है ? तर्क तो देते हो कि टूट कर चाहा जिंदगी को, डूब कर प्यार किया, जंगल जंगल भटके और सात घाट का पानी पिए बैठे हैं। वैसे भी ग़ौर करो तो सात घाट कर पानी जिसने पी लिया वो आखिरकार बैठ ही जाते हैं, फिर बैठे ही रहते हैं।

यहां कोई इतना करीब नहीं मिलता कि सबको गौर से देखें। बस दूर बैठ कर एक उड़ती सी नज़र डालनी होती है और काॅमन फीचर्स और स्वभाव से समझ लिया जाता है कि आम इंसानी फितरत क्या है। लेकिन उसमें से जिस किसी एक को थोड़ा जान रहे होते हैं वो भी अपने तो आप में विभिन्न वनस्पतियों से भरा जंगल हुआ करता है। अगर एहसासों से भरा आदमी हो और तुम्हारी ही तरह तलबगार तो देखोगे कि उसके यहां भी बौने बांस के पेड़ से लेकर मध्यम आकार का अलता का पौधा उगता है। नुकीले, पथरीले, जीवट रास्ते हैं और बहुत मुलायम समझौतों का सूती आंचल भी। ऐसा नहीं होता किसी के साथ भी कि लगातार दुख या यंत्रणा ही मिलता हो। अगर प्रायोगिक तौर पर वो बाहर तकलीफ महसूस करते हैं तो फिर उन्हें अपने तरीके से जुटाए हुए भाव, दृश्य, सोच और बरतते हुए काम से ही प्यार हो जाता है।

जिंदगी किसी सस्ते किस्म की सर्फ सी है इसमें नींबू की मात्रा ज्यादा है इससे हाथ खुरदुरे हो जाते हैं मगर कभी कोई स्पर्श करता है तो गुदगुदाहट ज्यादा लगती है।

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4 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  2. दिस सिटी इज रफ़ एंड इनसेंसिटिव... :-(

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  3. जिंदगी किसी सस्ते किस्म की सर्फ सी है इसमें नींबू की मात्रा ज्यादा है इससे हाथ खुरदुरे हो जाते हैं मगर कभी कोई स्पर्श करता है तो गुदगुदाहट ज्यादा लगती है।....
    mujhe zindgi thodi mirchi si lagti hamesa....si si kar ke dil rota hai...

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  4. This is interesting self innovation how much feeling one together ,we have . Self inspection is needed to overcome the .../ very good thoughts .Thanks

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