Wednesday, June 22, 2011

सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं




शरणार्थी तो हम थे ही, यह हमें भलिभांति ज्ञात था लेकिन वो होता है न कि किसी दोस्त के जन्मदिन की पार्टी में हम भूलने की कोशिश करते हैं कि हमारे साथ पिछला क्या बुरा हुआ है। तो बस आधी रात को वही थोड़ी के लिए भुला बैठे थे। पानी भरने के लिए जगने का अलार्म लगाया था। कभी कभी ऐसा होता है न कि बिस्तर पर पूरी रात बिताने के बाद भी लगता है दिमाग जागा रहा और हम बस आंखे मूंदे पड़े रहे इस इंतज़ार में कि अब नींद आ जाएगी। अंधेरे में अंधेरा ज्यादा होता है। कोई दोस्त कमरे की लाइट जला दे तो पलकों के पर्दे के पार अंधेरा हल्का हो जाता। ऐसे में आंखें जोर से भींच लेते। मस्तिष्क पर एक अतिरिक्त दवाब बनता और सवेरे लगता है जागते हुए ही रात कटी है। लगता लेकिन नींद तयशुदा वक्त से पांच मिनट पहले खुल गई। मन हुआ नल चेक करें क्या पता पानी आना शुरू हो गया हो। पीठ पसीने से तर थी। बिस्तर पर के चादर में चिपटी हुई..... गीली। उचाट सा उठा, किचन गया, नल खोली। पानी नहीं था लेकिन उसने आने की आहट थी। आधी रात के सन्नाटे में सांय सांय की शोर करता नल... कहने को शांति में खलल डालता लेकिन जिसके मधुर आमद का स्वर... ऐसा ही लगा जैसे सूरज डूबने के बाद किसी समुद्र तट पर चला गया होऊं... नंगे पैर नम रेतों पर चलता ... दूर बहोत दूर तक निकल गया हूं ....और एक सांस सांय की आवाज़ घेरे है। 

यह दुलर्भ है। नहीं मिलता है। हमें हर वो चीज़ नहीं मिलती है जो हमें मिलनी चाहिए। जिसकी बुनियादी जरूरत हमारी है। रोष यहीं से उपजता है। हमारे तर्क भी नहीं सुने जाते। एक अंधेरी सुरंग में लिटा कर बस छोड़ दिया जाता है। हम हाथ पांव मारते हैं। आवाज़ लगाते हैं। शायद सुरंग के मुहाने पर के उजाले तक हमारी आवाज़ पहंुचती भी हो। आवाज़ गूंजती है लेकिन तब पता लगता है कि कुछ आदमियों ने ही उस आवाज़ को दबा दिया। इस तरह संघर्ष वर्गों में बंट जाता है।

शहर की नल में पानी का इंतजार करते हमने खुद को एक पल के लिए मानसूनी प्रदेश का कोई गरीब किसान मान लिया जैसे पानी आएगा तो सारे दुख दूर हो जाएंगे। इस शरणार्थी होने का दंश सिर्फ हम अकेले नहीं सह रहे थे। सामने वाले दरवाज़े की जब सिटकनी सरकी तो उससे निकली लड़की भी बाल्टी लेकर बाथरूम में चली गई। नल खोला। पानी आ गया। लेकिन एक ही फ्लोर पर पानी दो भागों में बंट कर आ रहा था। बाल्टी में पानी यूं गिर रहा था जैसे मोटे कपड़े का अवरोध लगा दिया गया हो। मैंने इंतजार किचन में खड़े होकर बोझिल पलकों में काटी उसने तीसरी मंजिल और आकाश की ओर खुलने वाले सीढ़ी पर बैठकर। दूर एक बेहद धीमी रेलगाड़ी चल रही थी... बहुत धीमी। रेलगाड़ी क्यों इसे मालगाड़ी कहिए। जिसे बस यह संकेत मिलता है कि अपनी गाड़ी किनारे कर लें फलाना एक्सप्रेस गाड़ी आने वाली है।

आखिरकार मैंने जैसे तैसे पानी भरा। मन हुआ बालकनी में थोड़ा रूकें। नज़र घुमाई तो छोटे छोटे अंधेरे छज्जों पर खामोश कबूतर बैठे थे। रात की निस्तब्धता में एकदम खामोश किसी मूर्ति की भांति। थोड़ी नीचे और नज़र सरकी तो बिजली के तारों पर दो कबूतर बैठे थे। एक दूसरे की विपरीत दिशा में मानो कह रहे हो - क्यों रोती हो ? अरी हम ही नहीं, धरती पर राज करने वाला इंसानों के बीच भी कुछ इंसान निष्कासित हैं। जब वे शरणार्थी की तरह जी सकते हैं तो अपना तो छोटा सा जीवन है। 

कबूतरी उसकी बातों को सुनकर पंख फैला देती थी मानो इन बातों को सुनकर असहज हो रही हो और असहमति में प्रतिक्रिया यह दे रही हो।

जीने को प्राथमिकता देने में हमने सारे सकारात्मक तर्क इसके साथ जोड़ दिया. हमारे पास नहीं था कोई उचित जवाब तो जीना सबसे आसान लगा.

8 comments:

  1. बहुत से सवाल हैं जो सवालों के भीतर से निकलते हैं. जैसे निराशा के समानांतर कोई दो आँखें चल रही हो ऐसी आँखें जिन्हें बंद हथेलियों के बीच के अंधेरों में देखा जा सके.

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  2. ओर हमें गुलज़ार की एक नज़्म याद आ गयी.....इन कबूतरों के मुताल्लिक !

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  3. पता है क्या....सारी बात पता थी ऐसा लगा..तुमने बता दिया हमें बता दिया कि हमें पता है....

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  4. ऐसी बेचैन कितनी राते याद आ गई जो उमस में कटी थी

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  5. नए दिन की शुरुआत पानी के संघर्ष से ... उस पर रख दिया है माइक्रोस्कोप इन शब्दों ने...

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  6. "अंधेरे में अंधेरा ज्यादा होता है"
    बहुत बढ़िया बात कही सागर भाई....

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  7. "यह दुलर्भ है। नहीं मिलता है। हमें हर वो चीज़ नहीं मिलती है जो हमें मिलनी चाहिए। जिसकी बुनियादी जरूरत हमारी है। रोष यहीं से उपजता है। हमारे तर्क भी नहीं सुने जाते। एक अंधेरी सुरंग में लिटा कर बस छोड़ दिया जाता है। हम हाथ पांव मारते हैं। आवाज़ लगाते हैं। शायद सुरंग के मुहाने पर के उजाले तक हमारी आवाज़ पहंुचती भी हो। आवाज़ गूंजती है लेकिन तब पता लगता है कि कुछ आदमियों ने ही उस आवाज़ को दबा दिया। इस तरह संघर्ष वर्गों में बंट जाता है।"

    गज़ब फ़िलॉसफ़ी... एकदम पसंद आयी :-)

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