Thursday, June 23, 2011

इस मँझधार में...



ये क्या उमर है कि अब हम प्रेम नहीं करते सिर्फ प्यार से जुड़ी बातें करते है। स्याह खोह से बिस्तर गर्म करती औरतें नहीं है मगर उनके दिए हुए वे पल और ख्याल हैं। ऐसा अब नहीं होता कि तुम देर तक साथ में बैठो तो मैं उठ कर तुम्हारा कंधा दबाने लगूं और थोड़ी देर बाद तुम उठ कर मेरी आंखों में गहरे झांको। हमारी सांसे उलझती। मैं कमरे की दीवार पर तुम्हें घेर दूं और छिपकली की तरह हम दोनों दीवार से चिपक जाएं। हवा का एक कतरा भी फिर हमारे बीच से पार ना होने पाए। अब नहीं होता ऐसा। 

XXXXX

एक किसी किताब पर हम घंटों बातें करते हैं। तुम्हारी सोच किसी रहस्य किताब की तरह खुलती जाती है और मेरी उमर की उंगलियां उसे पलटते पलटते घिसती जाती है। क्या प्यार में गर्क होना या फिर तबाह हो जाना, उमर बीताना इसे ही तो नहीं कहते कि हो और मेरी किसी पार्क में बैठ कर जिंदगी पर पूरी पूरी शाम बातें करते हैं। जवानी अच्छी थी, एक जूनून हुआ करता था।

जवानी अच्छी थी एक जूनून हुआ करता था। कंठ फूटने के दिन थे और खाली वक्त में बाज ख्याल ऐसे आते थे कि जिनसे निजात ना मिले तो किसी चैराहे पर खुद पर किरोसिन छिड़क आग लगा ली जाए। जाने कौन सा नशा ना किया धतूरा से लेकर कनेल का फल और सिगरेट में चूरण भरने से लेकर तिलचट्टा मार कर खाने तक मगर दिमाग में जो जहाज रूपी ढलान था उस पर कीड़े रेंगना ना छूटा। 

लैम्पपोस्ट पर बैठा किसी कौवे के मांनिंद हमें पता था कि पानी किस घड़े में रखा है जहां जहां यह प्यास बुझती हुई लगी वहीं इसकी संभावना भी बनी रही कि यह प्यास लगती रहेगी। यह प्यास मंजूर नहीं था। अंत तक किसी ने साथ नहीं निभाया। निर्जीव ने नहीं निभाया , आदम देह तो यकीनन दूर की बात थी। शराब का शर्त पैसा था तो आदमी का शर्त पैसे से लेकर रहने के सलीके तक। ऐसे में समाज का शर्त क्या है ?

खालिश आवारगी के दिन में दोपहर को अजियाए हुए कुत्तों तक से गड्ढ़े में लोट कर लड़ते थे आज जिसने हक मारा है उससे दो बात कहने में असभ्यता लगता है। हम कितने स्वार्थी हैं सब कुछ अपने लिए करते हैं! 
समझने के लिए यकीनन तुम्हारा जीवन भी चाहिए और तुम्हारे कारनामे भी। यह तकरीबन उन्नीस-बीस का मामला है जहां तुम्हारे शाहकार बीस बैठेंगे।

देखा जाए तो जीने का आकर्षण हमेशा किसी ढ़ीले कपड़ों में लिपटा जवान औरत के सीने पर के दूधिया उभार सा था लेकिन हम ही व्हील चेयर पर थे सो तमाम एहसास घुटन में निकलता रहा।

(ग़ालिब, गोर्की, मंटो और मजाज़ के लिए)

*सुबह दर्पण का शेयर किया हुआ लिंक देखा जा सकता है यहाँ और यहाँ. और देखने से ज्यादा यहाँ कहा हुआ सुना जा सकता है. तो उसी का एक इक्को.

4 comments:

  1. शीर्षक (जो कि मंटो का ही लिखा एक नाटक है) और अंतिम लाइन उसी नाटक कि कहानी से खिलवाड़ कर लिया गया है, गो कि मंटो को मुझसे भी शिकायत हो जाए तो बेहतर हो लेकिन.....

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  2. कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
    दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
    मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
    लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
    ख़याल होता है, गोर्की है!
    पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
    जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
    डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
    या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
    समय पलटता नहीं वहां से
    कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।

    ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
    हथेली पे लेके दिन की फक्की
    मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
    ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता

    ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
    जस भरी रात गर्मियों की

    - गुलज़ार

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  3. दिल्ली में कभी कभार बारिश हो रही है.. गर्मी भी है.. तुम्हे पढता हूँ लगता है जैसे किसी हम-उम्र ने लिखा हो... जवानी अच्छी ’थी’ वाली बात ही समझ आती है... जाने अब ऎसा कुछ बचा होगा जो वापस जोश से भर दे.. कुछ तो.. जवानी ’अच्छी’ थी ये समझदारी भी कुछ दिनों की रहने वाली है अब तो..

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