Tuesday, August 9, 2011

पाषाणकालीन औजार हुआ करता, भिड़ता फिर जा कर घड़े की खास मिट्टी बनता





दृश्य बिल्कुल वैसा ही होता है, रात भर के जागे होते हैं, गोली लगी छाती का उपचार गर्म चाकू से करते हैं, सुबह आठ बजे तक पीठ और सीने को पट्टियों से कस कर बांधते हैं और दस बजे उजली शर्ट पर कस कर टाई बांधकर एक हाथ में बैग लिए दूसरे में घड़ी जो कि सीढि़यों से उतरते हुए पहनी जानी है, पैर पटक कर उतर गए।  पैर पटक कर यों उतरे कि रात भर जिन ख्याल और खुद से बहस में उलझे रहे जो जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा तो क्रूर होकर हिंसा पर उतर आए। एकबारगी लगे कि इन्हीं सीढि़यों पर सांप की तरह वो समस्याएं रेंग रही हैं और अगर हम हौले से उतरे तो वो पैर से लिपट जाएगी। ऐसे में बेहतर है उन्हें निर्ममता से कुचलते हुए निकल जाओ। क्योंकि यहां से जो दिन शुरू होता होता है वह आपका नहीं है। 

आप इसे अच्छी तरह अपने दिमाग के अंतिम नसों तक रेंगने दें कि वह किसी और की अमानत है। अब आप बहस करेंगे कि रात भर भी तो किसी न किसी उधेड़बुन और समस्याओं में ही रहा वो समय तो आपका था आपको अपने लिए जीना था वो आपको क्यों नहीं मिला ? जब आप यह दलील रखते हैं तो रतजगे छिपाने के लिए और ताजगी के लिए बनाया गए शेव की आड़ से आपके चेहरे की निरीहता झलकने लगती है और चूंकि आप दिल से महसूसते हुए ऐसी बात कह रहे हैं तो आंखें झुक कर फर्श और दीवार के मिलन स्थल पर इधर उधर दौड़ रही होती है। 

ऐसा लगता है कि अब आपके आंख पर पर वो सारी समस्याएं टंग गई हैं और आप उन समस्याओं को यहां वहां ही सही कहीं व्यवस्थित करना चाहते हैं लेकिन चिकने फर्श और दीवार के बीच कोई जगह नज़र नहीं आती। आपको खोल दिया गया है अलबत्ता अगर आपकी शर्ट उतारी जाए तो पीठ और सीने पर कस कर बांधी गई पट्टी वैसे ही नज़र आएगी। जब सामने वाला आपको घूर कर देख रहा होता है तो चुपके से एक डर समाहित होता है कि कहीं इसे वो पट्टियां दिख तो नहीं रहीं। आप उसका ध्यान भटकाने के लिए बेशुमार बोलने लगते हैं, गति बढ़ जाती है लेकिन यह भूल जाते हैं कि आपकी आवाज़ अब लिजलिजी हो चुकी है और घट रही यंत्रणा की प्रतिक्रिया उसमें प्रविृष्ट कर चुकी है। जो यातना आपने अपने आप को दी है और अब आपकी आवाज़ से रिसने लगा लगा है और अब जबकि आप सामने फर्श और दीवार के मिलन स्थल पर देखते हैं तो वहां कमर भर एक गरिष्ठ दलदल नज़र आता है जो उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। बहस करने वाला कोई मंसूबा लिए चला जाता है और आप उस दलदल को हैरानी से देखने लगते हैं आपको लगता है कि उसमें जंगली सूअर या भालू जैसा कोई विचित्र जानवर है जो लगभग डूबा हुआ है और दलदल में फंसा जूझ रहा है। 

हालांकि दिन का समय है चारों तरफ धूप है किंतु दृश्य घिनौना है, आपको उससे नफरत होने लगती है। आप छै: जैसी कोई अतिघृणास्पद संबोधन उच्चारते हैं और तेज़ी से पलटते हैं कि आपके दिल में प्रेम का हुजूम उठता है। सुनाई देता है कि हज़ारों हजार लोग कोई नारे लगाते हुए आ रहे हैं आप फिर पलटते हैं और आपको उस जंगली सूअर या भालू पर तरस आता है। आप बिना कपड़े उतारे दलदल में कूद उस जानवर को (जो कि अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है) गले लगाना चाहते हैं। बुक्का फाड़ कर रोना चाहते हैं। प्रतिकार करता उस जानवर पर आप रीझ चुके हैं। दरअसल यह दयनीय प्रेम है जो संवेदना से व्यक्त होती है। किसी बच्चे भिखारी पर जब आपको तरस आता है। जैसे हीर रांझा फिल्म में नायिका जब दुनिया को खुदा, खौफ और कयामत का वास्ता देकर अपने नायक को गले लगाती है। यह पे्रम की पराकाष्ठा है। आप जानवर को दलदल से निकाल कर उसके चेहरे को अपने हथेली में भर उसकी आंखों में आंख डाल कर मां बेटे की तरह रोना चाहते हैं। उसे अपने जैसा बना देने का ख्याल आता है। (सच्चाई यह है कि यह ख्याल नहीं आता अपने आप होता जाता है) अब देखिए आप क्या करते हैं -

जानवर के कोहनी, घुटने, माथे के किनारे, हाथ के अंगूठे और पैर की उंगलियों के छोटी उंगलियों पर जो लड़ने के दरम्यान चोट आई है उसे सहलाते हैं। यह ठीक है कि आप पर अगर एक ईंट मारी जाए तो आपका बदन जो कि पहले से किसी प्लास्टिक मशीन से बंधा है, वो भी खुल जाए। ऐसे में आप रोते जाते हैं और अपना सेहत उसे दे देना चाहते हैं। अपने बदन को रगड़ कर निकली गर्मी उसकी चोटों पर रखते हैं। आह ! कैसा सुख। 

आप क्या करने निकले थे, क्या कर रहे हैं और जब वो नहीं मिला तो कोई तीसरी ही घृणित और आंख चुराती हिस्सों में लिथड़े हुए कूड़ेदान में कूड़ा बीनने वाले की तरह अचानक मिले एक बंधी हुई पैकेट पर सारे दुख निसार कर चुके हैं।

अगर विडम्बना ना हो तो देखिएगा कहीं वो उपयोग में ली जा चुकी नैपकिन ना हो। मैं आपके हक़ में यही दुआ करता हूं और समय रहते आपको आगाह करता हूं। इससे ज्यादा मैं आपके लिए और कर भी क्या सकता हूं। 
बहरहाल... अब आप दूसरा, नया पैकेट खोलिए।

2 comments:

  1. कल से ग़ालिब साहब का एक शेर दिमाग़ में शोर मचा रहा है... यहाँ छोड़े जा रही हूँ थोड़ा सुस्ताने को...

    "ऐसा आसां नहीं लहू रोना
    दिल में ताक़त, जिग़र में हाल कहाँ"


    P. S. : कैसे लिखते हो साग़र ऐसा.. ? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्यूँ लिखते हो ऐसा.. ?

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  2. तुम्हारी तारीफ़ करते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा है पर अच्छा लिखा है तुमने..:)

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