Tuesday, August 16, 2011

मुझको देखे बिना करार ना था, एक ऐसा भी दौर गुज़रा है




ठीक है, ठीक है आपने उसका गर्दन चूमा था और खुद को वहीं छोड़ आए हुए चार साल होने हो आए। लेकिन उससे क्या ? इस दौरान अड़तालीस महीने गुज़र चुके, कई मौसम गुज़र गए। आसमान में बादलों ने यहां से वहां तक और मुहल्ले के बच्चों ने इस छोड़ से उस कोने तक रेस लगाई। दुनिया में मंदी आई फिर इससे उबरते हुए फिर से मंदी की कगार पर खड़ी है। कई पड़ोस की लड़कियां भागी और गर्भवती होकर अपने घर को लौट आई। कईयों की रातों रात शादी हो गई। निषेध आज्ञा वाली ज़मीन पर घर उठ गए उनमें किराए लग गए। और आप प्यार का रोना रो रहे हैं ? लानत है आप पर ! छि:

आप कहेंगे लेकिन इस दौरान रेलवे ट्रैक पर बारिश होकर बह गई। कितनी ही गाडि़यां अपनी पटरी से उतर गई। दुनिया आखिर फिर से अपने पुराने खेमे में ही है न। लड़की किसी ने किसी से साथ ही है न। गिने हुए विकल्पों में आदमी जी या फिर मर ही तो रहा है न। लोग या तो कुंवारे या शादीशुदा ही तो हैं न। मौसम में जाड़ा, गर्मी, बरसात ही तो आई न और सबसे सबसे बड़ी बात प्यार करने के दौरान आप भी तो होंठ से पैर की उंगलियों तक होते हुए पुनः होंठ पर ही पर ही हो लौटे न। आपने कौन सी नई जगह ईज़ाद कर ली? 

मैं आपकी खुद की तय की गई यात्रा अर्थात् उपलब्ध्यिों पर हैरान होते हैं और आप मेरे दिनचर्या की यात्रा पर ताज्जुब जाहिर करते हैं।

आखिर अपने प्यार को अतीत में घटे हुए प्यार की याद दिलाना क्या लगता है आपको कितना शर्मनाक है यह ? क्या है आखिर में मन में ? उस एवज में कुछ और वसूल करना, अपनी शाम खराब करना या उसी रिश्ते को फिर से शुरू करना?

देखो मियां हर बूंद चाहता है कि वो उन हरे चिकने फलाना पत्तों पर रूका रहे। गोया प्यार करते रहना कभी कोई दुख तो रहा नहीं। अगर आप ऐसे में स्थान विशेष पर ही रूक कर मर जाना या वहीं अपनी कब्र खुदवाना चाहते हैं तो आपसे बड़ा चूतिया कोई नहीं। जिसे चूम रहे हो अब अगर उसकी भी रज़ा पूछो तो यही होगी कि नीचे फिसल कर थोड़ी देर में यह उपक्रम  खत्म करो।

तुमने कभी किसी आदमी को गौर से देखा है आजकल ? सभी इस्तेमालशुदा लगते हैं। वे इस्तेमाल होने और इस्तेमाल करने की आदत से लैस हैं। निहायत खूबसूरत इंसान सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। वहीं बला का बदसूरत आदमी भी बुरी तरह से इस्तेमाल हो रहा है। खैर छोड़ो... तुम अपनी ही बात करो, अगर तुम्हीं से ईमानदारी से पूछ लिया जाए कि सुबह से कहां कहां इस्तेमाल हुए और कितनों पर इसका फंदा डाला तो बगलें झांकने लगोगे।

इसलिए मेरी मानो दोस्त कोई किसी का हमेशा के लिए नहीं है। पल विशेष में कब, कौन, कैसे तुमसे टूट जाएगा कह नहीं सकता। 100 प्रतिशत कुछ नहीं है। कभी वक्त तो कहीं आदमी खुद से उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) की तरह काम ले रहा है। 
हम बाज़ार में होने वाले और कर रहे अनेक सौदे हैं।

5 comments:

  1. करार तब भी नहीं था और करार अब भी नहीं चाहे कितनी तसल्ली, तर्क-वितर्क दिए जाएँ ...आज की जिंदगी के निर्मम सत्यों का खुलासा करने के बावज़ूद प्यार और दर्द के सैलाब का तल नज़र आ ही जाता है...

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  2. किस ख्याल में डूबकर ऐसे लिखते हो ?

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  3. sagar me kuch din pahle hi blog ki dunia se parichit hun ouraapki har post apana gindjinama lagati he mere vicharo ko itane acche sabad dene ko kya sabd du/

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  4. पल विशेष में कब, कौन, कैसे तुमसे टूट जाएगा कह नहीं सकता..कोई किसी का हमेशा के लिए नहीं है....SAch

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  5. GGShaikh said:

    वाह ! सागर भाई !
    क्या लच्छेदार गुबार निकाला है...वाबस्ता भी है यहाँ कुछ वास्तव...
    मर्ज़ी-बेमर्ज़ी का खेल है इस्तेमाली...
    आज की परिस्थितियों सी ही, कभी उलझी कभी सुलझी मनःस्थिति...
    तुम्हारी भाषा-लय तो हमें सदा से पसंद...

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