Friday, August 19, 2011

सूखे लकड़ी चूल्हे में डालती रहना


8 comments:

  1. दिल भर आता है, कुछ कहना चाहती हूँ पर बात कहीं मन में डबडबा रही है, लहरों पर हिचकोले खाती नाव जैसी...
    क्या लिखते हो, कैसे लिखते हो...

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  2. मुझे भी कल भरने की जल्दी नहीं, आज में डूबने की व्यग्रता है। यह भाषा बनी रहने दें, पीढ़ियों के काम आयेगी।

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  3. पहले फेसबुक, बज्ज़ और अब सोचालय पर भी... आपकी कलम है कि तलवार... क़त्ल-ए-आम मचा रखा है आजकल... ख़ुदा ख़ैर करे !!

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  4. बात इन पंक्तियों से बहुत परे और गहरे होने का इशारा करती हैं.बहुत बढ़िया.अब इसे क्यों न यहाँ टाइप कर लिया जाए?

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  5. कौन कहता है यह एक खूबसूरत कविता नहीं है?

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