Thursday, August 25, 2011

दीवार से टकराकर मछली लौट जाती है




गर्मियों के दौरान स्कूल के मेन गेट पर बाईं तरफ एक खोमचे वाला खड़ा रहता। ब्लू चेक वाले लंुगी और हाफ सूती शर्ट में, बाल बड़े सलीके से झाड़े एक सभ्य, सौम्य बंदा। देखने से लगता शिक्षा अच्छी लिया हुआ अधेड़ युवक लेकिन मजबूरी (बहुत हद तक पैसे की कमी) के कारण आगे पढ़ने से वंचित वो सांवला आदमी जो देखने में बंटी के पापा जैसा लगता, एक सभ्य इंजीनियर जैसा। ये डाॅक्टरों और इंजीनियरों की पर्सनाल्टी क्या पढ़ते-पढ़ते या प्रैक्टिस में ही बन जाती है? खैर... वो एक बड़े आकार वाले डमरू के लकड़ी के स्टैण्ड पर एक चैड़ी सी टेबल लिए खड़ा रहता। क्या-क्या है उसमें ?

कागज़ के कुछ मोटे गत्ते। किरासन तेल वाला शीशी जो अंधेरे में डिबिया का काम करता है। कफ सीरप वाली शीशी जिसमें सरसों का तेल है, एक ठोंगे में कटे हुए महीन प्याज, एक बड़ी शराब के बोलत में लाल चटनी जिसके ढ़क्कन पर कांटी से छेद किया हुआ है ताकि जोर दे कर उझलने पर थोड़ा थोड़ा बाहर गिरे। कुछ प्लास्टिक के पारदर्शी डब्बे जिसमें फरही (मूढ़ी), चना, हरी चना, चूरा, बादाम वगैरह रखे हैं। एक पन्नी में आधे आधे कटे हुए नींबू, एक में इमली, एक छोटे डब्बे में लाल मिर्च का पाउडर, तीन छोटे डब्बे में लाइन से कटी हुई हरी मिर्च, लाल-उजली नमक और एक में काला नमक। एक छोटी सी तराजू... उनके पास 25 ग्राम वाला बटखरा नहीं है। है तो एक छोटा सा कजली रंग का पत्थर, वही 25 ग्राम है। पचास ग्राम का बटखरा है। सामने एक अंडा वाला, बगल में एक लाल, पीले, हरे रंग के शर्बत वाला भी लेकिन चाचा के खोमचे वाली दुकान चटपटे भूजे और उनकी निश्चछल हंसी के कारण सबसे ज्यादा चला करती। 

छुटकी चाचा को भीड़ में जब भी भूजा बनाने कहती तो चाचा को उसे दरकिनार करना पड़ता। दो चार बार नोटिस करने के बाद छुटकी ने उसका तोड़ निकाल लिया। अब वो चाचा के एकदम बगल में खड़ी हो जाती और उनका लूंगी खींच खींच कर आॅर्डर किया करती। चाचा लंूगी कस कर बांधते फिर भी डर तो लगा ही रहता। इधर छुटकी ने देखा कि लंूगी खींचने पर चाचा हमेशा चैंक कर उसकी सुनने लगते हैं इसलिए मन ही मन उसने यही करने का सोचा। 
कई बार चाचा कहते कि अभी बहुत भीड़ है तो छुटकी कहती मैं बस याद दिला रही हूं ताकि तुम भीड़ में मुझे भूल ना जाओ। चेहरे पर बहुत बेफिक्री का भाव लाकर कहती - मेरी छुट्टी हो चुकी है और कोई जल्दी नहीं है पर जब भी मेरा नंबर आए मुझे पहले बता देना। छुटकी हमेशा अपना भूजा अपने सामने बनवाती है। चाचा का हाथ कितना भी साफ हो उसकी बारी आते ही हाथ फिर से धोते हैं तौलिए से पोछते हैं। छुटकी अपनी ऐड़ी ऊंचा कर कर के एक एक डब्बे की तरफ इशारा करती है। चाचा वो सब डालते हैं। चाचा जान गए हैं कि छुटकी को भूजा में चूरा पसंद नहीं लेकिन बादाम जरूर चाहिए। फिर भी छुटकी सारे नियम याद कराना अपना फर्ज समझती है। 

फरही कम, बादाम ज्यादा, नींबू एक पूरा आधा, मिर्च का पाउडर आधी चम्मच के थोड़ा ज्यादा, हरी मिर्च तेज़ रखना। प्याज भी मिर्च जितनी और हां मेरे लिए धनिया पत्ता भी डालना। मोटे वाले गत्ते पर देना। पतले पर लाल चटनी से कागज हाथ में ही फटने लगता है। और तराजू नीचे करके दिखाओ। थोड़ा भूजा और डालो। भूजा वाला प्लेट ज्यादा झुकना चाहिए। 

इतने नखरे के बाद जब छुटकी के हाथ भूजा आता तो उसके गाल के गढ्ढे गहरे हो जाते। पैसे देने के बाद वो पहला फांक चाचा के सामने ही मारती। दोनों एक साथ मुस्कुराते कि छुटकी के गाल लाल हो जाते, आंखों में पानी भर आता। गुलाबी गुलाती जीभ बार बार बाहर आने लगती। उसकी कान सुन्न होने लगती। चाचा की बुलंद आवाज़ भी कान पर धीमे-धीमे पहंुचते। छुटकी तिलमिला उठती।

चाचा उसकी हालत पर पिघल कर कहते - जब संभलता नहीं है तो काहे ऐसा शौक पालती हो मुन्नी। आईना देखो जाकर, कईसा मुंह हो गया है। जीभ का ऐसा तेज़ होना अच्छा नहीं। हमारे पास तो पानी भी नहीं। लो पानी लो।
छुटकी सिसकारियां भरती रहतीं। अपने को सांत्वना देती रहती। मुंह में बार बार खूब सारा पानी आता। पानी लेना चाहती लेकिन रूक जाती।

लेकिन यह क्या, थोड़ी देर बाद ही वो फिर से हंसती, आंख अब भी भीगे रहते, होंठ और जीभ छलछलाई हुई रहती, कान भी लाल रहते फिर भी अपने चेहरे पर बहुत सारा आत्मविश्वास लाकर कहती - तुम क्या जानो चचा, ये खाने में कित्ता मज़ा आता है ! अरे कुछ नहीं है पहला फांक जीभ पर लगता है लेकिन असली मज़ा तो तब है जब पानी भी ना लो। मन हरिया जाता है कसम से। कैसा भी मन हो इसको खाओ तो मिजाज बुलंद हो जाए और दुनिया साफ साफ दिखने लगे। 

चाचा और छुटकी दोनों साथ साथ हंसने लगते। छुटकी अपनी समझदारी और खुले बयान पर। चाचा उसके आत्मविश्वास से किए गए कबूलनामे पर। थोड़ा उसकी नादानी और मासूमियत पर भी। हंसी एकाकार हो जाती और एक पल के लिए ग्राहक और दुकानदार का भेद मिट जाता।

छुटकी को और भी बहुत सारी सहूलियत हो गई थी। मसलन खुल्ले पैसे की दिक्कत नहीं रहती उसे। जरूरत पड़ने पर कुछ पैसे चाचा से भी मिल जाते और सबसे बड़ी बात तेल लगे कागज़ के टुकड़े मिलते। इससे छुटकी किसी पर फोटो पर वो कागज़ रख कर उसकी उपरी आकृति हू-ब-हू बना लेती और पूरे क्लास में सबसे अच्छी चित्रकार का दर्जा पा लेती। 
कई बरस गुज़रे... चाचा अब भी उस सरकारी स्कूल के मेन गेट पर खड़े हैं, ग्राहक कई आते हैं पर छुटकी जैसा कोई कहां, लूंगी खींचने वाली, जि़द करके भूजा बनवाने वाली, पानी लेने से इंकार करने वाली और तीखेपन के सरूर में जिंदादिली से बात करने वाली।

आज छुटकी के सामने खुला संसार है और चाचा के पास एक बेहद बंद भूजे की दुकान। कभी कभार बस एक हंसी की याद पर चैंकते चाचां मेन गेट से कमरे तक का रास्ता भी बेहद सूनसान। दरार पड़े, सूखे और कराहते। एक वीरान अंधेरा। 

8 comments:

  1. http://www.youtube.com/watch?NR=1&v=TPYFPrUaYGI

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  2. आज बरसों बाद उस भेलपूरी का स्वाद ज़ुबान पर आया जो स्कूल से निकल के रोज़ भेलपुरी वाले से ली जाती थी एक या दो रुपये में... वैसे तो भेलपूरी के दो या तीन ठेले लगे रहते थे स्कूल गेट के बाहर पर उनमे से एक चाचा हमारे फ़ेवरेट थे जो तुकबंदी कर कर के कुछ ना कुछ बोलते रहते थे हर वक़्त, मसलन, भेलपूरी खाइए... मम्मी से पैसे ले के आइये... :) क्या क्या याद दिला दिया साग़र... एक बार फिर से बस्ता टांग कर स्कूल जाने का मन होने लगा :)

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  3. तुम किस मिट्टी के बने हो सागर?

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  4. कई बरस गुज़रे... चाचा अब भी उस सरकारी स्कूल के मेन गेट पर खड़े हैं, ग्राहक कई आते हैं पर छुटकी जैसा कोई कहां, लूंगी खींचने वाली, जि़द करके भूजा बनवाने वाली, पानी लेने से इंकार करने वाली और तीखेपन के सरूर में जिंदादिली से बात करने वाली।

    आज छुटकी के सामने खुला संसार है और चाचा के पास एक बेहद बंद भूजे की दुकान। कभी कभार बस एक हंसी की याद पर चैंकते चाचां मेन गेट से कमरे तक का रास्ता भी बेहद सूनसान। दरार पड़े, सूखे और कराहते। एक वीरान अंधेरा।
    Aah!

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  5. Yun hi nahi kahte ki ajeeb ho....Jaane kitni mitti se bane ho...aapki post ne emotional kar diya udhar dr.saab kah rahe hain ki emotion bhi disposable hote hain....agar aisa hi hai to kambakht paida hi kyon hote hain

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  6. hummm, writing fever jaari hai...gud hai

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  7. छोटी छोटी घटनाओं में सिमटा खुशियों का संसार।

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  8. स्कूल के बाहरवाले खोमचे हमेशा खजानों जैसे लगते थे.......लगा जैसे आज एक खज़ाना खोलकर आँखे हरी कर लीं......

    सुंदर रचना...और जानी-पहचानी सी भी...

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