Thursday, September 1, 2011

ऐ मलिका-ए-नील !


ऐ मलिका-ए-नील ! ए मलिकाए नील। मैं तेरा फकीर तुझे अपने ही दिल में रखकर घूम रहा हूं दर ब दर। ऐ मलिका-ए-नील। तू इक दरया है, एक पाक दामन, दाग जिसमें सब आके धोते हैं। किनारों के पत्थर पर बैठ कर अपने ऐडि़यों के छाले छुड़ाते हैं। ऐ मलिका-ए- नील, तेरे किनारे ही उगा करती है इश्क की रूहानी फस्लें। तेरी ही घनी जुल्फों के ज़द में बहा करती है एक दूधिया नीला लंबी धार। तेरे ही भंवर में बैठ कर फूटता है कोई चराग। 

यों तो तेरे भी देह में भागती हैं कई नीली रगें। ऐ मलिका-नील! जब भी देखा करता हूं तो रंगों से लबरेज़ जादू देख हैरां हुआ करता हूं। दो पुरकशिश कोहसारों के बीच फंसी एक झीनी चादर के दरमियां लरज़ता इक नीम उरियां हुस्न। दूध सा उजला, नील सा नीला और सूर्ख लाल। रोज़ दो चार होना होता है पेशानी पर दो होठों के दाग रखे जाने की हसरत से। ऐ मलिका-ए-नील ! रोज़ ही तेरी उपजाऊ ज़मीं पर हुस्न का उरूज़ लिए खिला रहता है जवान सरसों के फूल। ऐ मलिका-ए- नील रोज़ ही हज़ार राह तमन्नाएं निसार हुआ करती हैं।

कहां भूल आया हूं वो गर्क और गुम होने के दिन.... उठा है वो गुबार कि अपने वजूद के पांव उखड़ जाएं, चढ़ा है वो बुखार कि तेरे ही जिस्म को पिघला कर फिर अशर्फी में ढ़ल जाए। ऐ मलिका-ए-नील... खोल अपने आंचल कि प्यास का मारा मैं तेरी रूह तक पहंुच जां दे सकूं। हटा वो परदा कि मेरे अंदर का सन्नाटा तेरे तेरे रानाईयों में जज्ब हो जाए। रख ले एक बदन में जो जिस्म साकी। हमारा-तुम्हारा यों जुदा होने का मतलब क्या है ऐ मलिका-ए-नील। 

खोल अपने पैर कि हसरतें लब पर रख कर मुसाफिर सा तेरे बदन पर भटकूं। ऐ मलिका-ए-नील ! फंसा अपनी उंगलियां मेरे कलाई में कि हम उन लम्हों में वक्त से परे गुज़रें। पुरअस्ररार ही सही इक रास्ता दे मेरे सांसों को कि वो तेरे जिस्म के जंगल में लरजती बाँस के छिद्रों से बांसुरी की सुरीली धुन पूरे जंगल फैला सके। ऐ मलिका-ए-नील बस इक बार लीडर बन कि सब मुहब्बत की मौसकी तेरे पीछे पीछे कोरस में गाए। 

*****
[कुंए की जगत पर नैतिक खूंटे से बंधी महबूब के प्यास में मिनमिनताती, कमज़ोर होती, रस्सी तोड़ती, थकती, हारती और डंडे से अनुशासन में लाने पर पर आमादा कभी समय का चरवाहा, तो दुनियादारी और कभी यों ही अपने रसूख के ताव में जुल्म बरसाता। सिर्फ भूख बड़ी नहीं थी जो घास मसस्सर था। पानी का अक्स तो घास में भी था लेकिन प्यास की मारी एकमुश्त प्यास महबूब पानी ही बुझा सकता था। 

हमें तुम्हें प्यार करते हुए तुम्हीं से पैदा होना था और तुम्ही पर मरना था। इस प्रेम चक्र/सायकल में कहीं कोई गड़बड़ जरूर हुई है, हो रही है।]

6 comments:

  1. ऐ शब्दों के चित्रकार !

    ख़ूबसूरत... बेहद ख़ूबसूरत !!

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  2. हम्म! एक लंबी कविता...रेत में बहती नदी सी या खारे पानी की झील सी.

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  3. एक अलग दुनिया है आपकी।

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  4. बहते दरिया में बिना पाल की कश्ती चलने का जोखिम आप ही ले सकते हैं सागर साहब...मेरा सलाम क़ुबूल कीजिये...कहर ढाते हैं आप...क़त्ल मचा रखा है...पढ़े और आह भर के रह गए की उफ़ क्या शब्द हैं, क्या तिलिस्म है...ये कविता है, पूरी की पूरी...

    मलिका-ए-नील ये पढ़ लेतीं तो तुम्हारे नाम सल्तनत बक्श देती ए कवि...

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  5. आखिरी लाइंस पढ़ते -पढ़ते एक गाना याद आ गया, तुजी से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले..और हाँ आप प्रेम में जीते हैं...बिलकुल गलत बात है ...

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