Saturday, October 8, 2011

मरियम...





तुम जानते हो सुख क्या है ? बहुत हद तक तो मैं भी नहीं जानती लेकिन फिर भी उसके आसपास का सच महसूस करती हूं। वैसे भी इंसानी एहसासों को पूरी तरह से जानने का दावा कौन कर सकता है? बड़े बड़े मनोवैज्ञानिक भी ग्राफ चार्ट की मदद, सर्वे, प्रतिशतों का खेल, औसत लोगों पर किए गए अध्ययन से ही अनुमान लगाते हैं। पूरी तरह से जानने का दावा वो भी नहीं कर पाता। कभी उनके कथनों पर गौर करना तुम्हें मैं सोचता हूं कि, मुझे लगता है कि, ऐसे मामलों में मुख्यतः ऐसा होता है कि, सामान्यतः लोग ऐसा कहते/करते हैं, मेरा अनुभव या अध्ययन फलाना कहता है, मिस्टर एम के साथ इसी हालात में चिलाना कदम उठाया था, कई इंसान औरत की तरह भी हो सकते हैं, वो पानी की तरह हो सकते हैं, जो ढ़लान देखकर उधर की ओर सरक जाता है। ब्ला...  ब्ला... ब्ला...

मैं अपनी हाल-ए-दिल कहूं तो मुझे आज तक नहीं लगा कि मैं प्यार में हूं। वो जब मेरे साथ होता है तो मुझे बस अच्छा लगता है। जरूरी नहीं है कि मैं उसका चेहरा देखती रहूं। हम पार्क में एक दूसरे से उलट अपनी पीठ सटाए मूंगफली खाते हैं तो भी मुझे सूकून रहता है। और उसके आस पास होने का भ्रम भी मुझे संतुष्ट रखता है।

मुझे उसके लिए चिंता करके अच्छा लगता है। बड़ा सुख मिलता है जब वो बहुत देर से आने के बाद भी मुझसे लिपट जाता है। मेरे सीने में उठती गर्म गुस्से की धधक कुछ ही सेकेण्ड में गाइब हो जाती है। मैं उस पर गुस्सा होना चाहती हूं। कई बार तो बस इसलिए मैं उस पर किए गए गुस्से को महसूस करना चाहती हूं। गुस्सा करने के क्रम में उसके चेहरे पर उगते भावों को देख उसे पूरी तरह समझना चाहती हूं। मैं इसका नाटक भी करती हूं। लेकिन मेरे शब्दों में वज़न नहीं पड़ते। वो आकर मुझे ऐसे थाम लेता है कि मैं घनीभूत बादल की तरह बेशुमार प्रेम बरसाने लगती हूं। उसके पाश एक मर्दाना बरगद की पाश नहीं अलबत्ता एक नवजात शिशु के हाथ की सबसे कनिष्ठा उंगली की तरह हैं जो भूले से कभी किसी अंजान से स्पर्श पर उसमें नेह और अथाह प्रेम का समंदर लुढ़का देती है। लौकी के नए और कोमल लटों की तरह जो सहारा पाने की चाह में घुंघराले हुए जाते हैं।

देर रात जब भी वो मेरे पास सरकता है तो हल्की की रोशनी में वो एक घर से भटका एक बच्चा सा लगता है जो आधी रात की गम की बारिश में मुझे एक गुलमोहर का पेड़ समझ मेरे नीचे पनाह पाने आ जाता है। कई बार तो घुप्प अंधेरे में भी मैं उसका चेहरा देख लेती हूं। वह परेशान मेमने की तरह मुझमें घुसता है, मुझे सर से पांव तक चूमता है। मुझे संभोग के लिए उकसाता है। मेरे स्तनों को यूं दबाता है जैसे उसके जिंदगी में कोई बड़ी भारी कमी हो। वह कितनी ही कोशिश करता है। मेरे उरोजों को हौले से सहलाते हुए मेरी आंखों में देखता है, मुझपर बहुत गर्म सांसे छोड़ता है, मेरी जांघें गुदगुदाता है, नाभि में थिरकन पैदा करता है। मैं उसके खो जाने के लिए क्षेत्र का विस्तार अपनी बाहें और पैर फैला कर करने की कोशिश करती हूं। (यह उसकी नज़र से वासना का क्षण हो सकता है)

पर ऐन वक्त मुझे यह भी लगता है कि कहीं वो मुझको ठंडा समझ छोड़ ना दे। मैं उससे नज़रे मिलाने से बचती हूं ताकि उसकी चाहत अधूरी ना रह जाए। कई बार मैं उस क्षण का आनंद लेने का नाटक भर करती हूं कि ऐसे मामलों में अगर सहयोग ना करो साथी भी ऊब कर निराश हो जाता है। स्तन वैसे भी है क्या ? अगर जोश, वासना और जवानी का उन्माद गैर हाजिर हो तो बस एक मांस का थक्का, बड़ा टुकड़ा भर! अन्य भौतिक चीजों की पूर्ति के बाद का सौंदर्यबोध! मुझे मामूल है जब वो इस क्षणिक तूफान से निकलेगा तो स्तन के पास मेरे दिल में चैन से छुप कर सो जाने की कोशिश करेगा।

मैं तब भी प्रेम, करूणा और वात्सल्य से भरी होती हूं। मेरे हाथ बरबस ही उसके सर के बालों में घुस कंघियां करने लगती हैं। वह मुझे हिलोरे मारता है जैसे सुबह के बाद, शाम को बछड़े को खूंटे से खोला जाता है तो वह चैकड़ी भरते हुए गाय के पास आता है और उसके थनों को जोर जोर से धक्के देता है। शायद पहले कुछ मिनट तक वह खुद को यकीन दिलाता है कि हां मैं सही जगह हूं - अपनी मां की पनाह में। फिर इत्मीनान से दूध पीता है। आंखें बंद कर चुपचाप। उस पर उसके चेहरे पर वो नीरव शांति देखने लायक होती है। परम शांति। लेखक का एकांत। एक पेड़ से टूटकर गिरता हुआ पत्ता भी सुनाई दे। सृष्टि थम जाती है। शाम की रंग और खुशनुमा, गहरी और वज़न में हल्की होती हुई। उसी पल में मैं उसे पुचकारती हूं जैसे गाय अपनी लंबी गर्दन पीछे कर उसके पीठ को जीभ से चाट रही होती है। उसकी रीढ़ की हड्डी और उभर आती है।

मुझे लगता है कि मेरे अंदर मातृत्व का भाव ज्यादा है। मैं प्रेमिका के रूप में मां का किरदार निभाती हूं। इस पंक्ति का सुधारती हूं। मैं प्रेमिका से ज्यादा मां का किरदार निभाती हूं। मुझे लगता है अधिकांश औरतें ऐसी ही होती होंगी। 

यह बिल्कुल वैसा ही होता है जब किसी सज्जन व्यक्ति माहौल देख कर सोच समझ कर अपनी मुंह से गाली निकालता है तो उसका दोस्त टोक देता है कि तेरे मुंह पर गाली नहीं जंचता क्योंकि तू उसका व्याकरण, वितान और लय नहीं जानता। तू बस इस माहौल में फिट होने की कोशिश करने में, खुद को बड़ा समझे जाने की कोशिश में यह कर रहा है। ठीक ऐसा ही हाल कुछ शराबियों के बीच नए नौसिखियों का हाल भी होता है।

तुम खुद को बहुत बड़ा, दुनियादार, और समझदार दिखाने की कोशिश  करते हो । ऐसा करते हुए तुम बहुत निदर्यी, क्रूर प्रतीत होते हो। पर अगर तुम सचमुच उसे जानते हो तो घटनाएं घटित होने के बाद वह बिल्कुल मासूम भोला सा बच्चा लगता है।

हां तो तुम पूछ रहे थे कि सुख क्या है ? बहुत हद तक तो मैं भी नहीं जानती लेकिन........ ब्ला.........  ब्ला....... ब्ला...

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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  2. बहुत सुंदर लिखा है आपने !

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  3. मुझे लगता है कि मेरे अंदर मातृत्व का भाव ज्यादा है। मैं प्रेमिका के रूप में मां का किरदार निभाती हूं। इस पंक्ति का सुधारती हूं। मैं प्रेमिका से ज्यादा मां का किरदार निभाती हूं। मुझे लगता है अधिकांश औरतें ऐसी ही होती होंगी।
    हां...शायद ऐसा ही है.

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