Friday, October 14, 2011

हर कण की मर्ज़ी थी आत्महत्या. यह देर-सवेर सबका अपना-अपना समवेत निर्णय था.


गांव आने के बाद सब कुछ नया नया लग रहा था। नया नया गांव लग रहा था। गांव भी नया-नया ही लग रहा था। नीले आसमान में कहीं कहीं ठहरे हुए उजले बादलों का थक्का तो पुराना था लेकिन उससे रूई की तरह एक-एक टुकड़े का छूटना नया था। ज़मीन सामान्यतः समतल ही थी लेकिन कदमों को ढ़लान लगना नया था। उसमें छिछले भंवर बन चार मुठ्ठी पानी का जमाव का लगना नया था। पेड़ में लगे हुए पत्ते नए लग रहे थे। दोनों तरफ घास लगी हुई पतले से रास्ते पर पगडंडी भी नई लग रही थी। रास्तों से ज़रा सा पैर भटका तो पैर को खेत में आया हुआ पाया। पैर के साथ साथ शरीर भी खेत में आ गया। पैर पहले आया फिर शरीर आया। फिर नएपन का एहसास और ज्यादा आया। रबड़ के पेड़ के पत्ते छूने पर कुछ ऐसे लगे जैसे ये दो चार दिन पेड़ से टूट गिर भी जाएंगे तो बेजान नहीं लगेंगे। मटर की छीमियों के पेट चीरे तो गोल गोल दाने थे। कुछ छोटे छोटे दाने भी थो जो काग़ज़ पर एक मोटे बिन्दु की तरह लगते थे। अब मन भी नया हो आया था। मैं भी अपने आप को नया लग रहा रहा था। जैसे ही इस नएपन का यकीन हुआ तो अचानक यह यकीन खो बैठा। इस संदेह को दूर करने के लिए मन से सहसा इसे बोलने का इरादा किया। मुंह से बहुत तोड़ तोड़ कर कहा - नsss याsss आ आ आsssssss - न या आ आ। यह बोलना नए नए बोलना सीखे बच्चे जैसा था। अतः इसे बोलने पर नयापन और ज्यादा लगा। पीछे से हवा का एक तेज़ झोंका नयापन लिए आया। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक लोटा हवा पीछे के बालों के हिस्से में ज़ोर से मार दी हो। इससे सिर के पिछले हिस्से में कुछ नए उजले रास्ते बन गए। यह वहां का नयापन था। 

परती खेत, बोए खेत और पानी भरे खेत, रास्ते, पगडंडी और ढ़लान, गाय - गाय और बकरी भी, नीम, शहतूत, कदंब, गुल्हड़ और साथ में सखुआ के पेड़। पेड़, छाया और कहीं-कहीं उनसे झांकती धूप। बोरिंग और पतले, लचीले तलवारों जैसे मक्के के पौधे, इतने सारे नए दृश्यों को महसूस कर यकीन फिर उग आया कि शायद आंखों पर हरे रंग का चश्मा निकल आया है। मन ने फिर इस यकीन को संदेह से दृष्टि से देखा। और संदेह है या यकीन इसे परखने के लिए आंख पर हाथ फेरी। एकबारगी हाथ झूठा लगा। और फिर पूरा शरीर ही झूठा लगने लगा। इस वक्त अगर वज़न नापा जाता तो सूई शून्य से आगे नहीं बढ़ती। इतने सारे नएपन से संदेह का यकीन गहराता गया। यकीन और संदेह में फर्क करना मुश्किल हो चला था। हर यकीन संदेह लगता फिर उस शक को मिटाने के लिए कि संदेह ही है या यकीन संदेहपूर्वक एक यकीन भरा कदम उठाया जाता। 

जहां आया था पूरी तरह नई दुनिया थी। नयापन कुछ इस तरह था कि दुनिया, दुनिया न होकर कल्पनालोक थी। कल्पनालोक की दुनिया थी जो इसी दुनिया में था। स्तब्धता हावी थी, भौंचक्के से जीभ ऐंठे हुए लगते थे। ऐसा लगना क्षणिक ही रहा क्योंकि पहले यह यकीन आया फिर संदेह आया। ऐसे में पहले जीभ को बाहर निकाला सूखे हुए होंठों पर फिराई और पहले यह यकीन दिलाई कि हां जीभ पर जगह पर है वरना स्थिति यह थी कि बिना जीभ की शरीर की कल्पना भी इस दुनिया में संभव था। संदेह पर यकीन के लिए जीभ को दांत से काटा गया। जीभ सुन्न। संदेह का पलड़ा भारी हो गया। अबकी ज़ोर से काटा गया तो जीभ लहुलुहान हो आया। जीभ का लहुलुहान होना शरीर का अपने में लौटना में वापस लौटना  था। अब जा यकीन हुआ कि वो संदेह ही था। 

संदेह जो यकीन हो गया था। अब जाकर फिर इसका यकीन हुआ। पर नई दुनिया में ही  हर यकीन पर संदेह होना और संदेह को यकीन मानना संभव था। 

आश्चर्य यह लगा कि नई दुनिया इसी दुनिया में थी लेकिन दिन ब दिन इस पर संदेह गहराता जा रहा था। यकीन का बहुत अंदर तक गहरा यकीन था। संदेह की पुष्टि तुरंत की जाने की कोशिश की जाती है। ऐसे में नज़र नई नहीं थी इस पर जब यकीन होने लगा तो  तो संदेह हुआ। तो एक नए यकीन का सामना हुआ जो अब सारे सामान्य यकीन पर संदेह का पर्दा डाल अंतिम यकीन से रू ब रू करवा रहा है। 

इसके बाद यह संदेह फिर से बलवती हो गई है कि क्या मैं बोलना जानता हूं। बोल कर देखता हूं नsss याsss आ आ आ आ आsssssssssssssss..........................

5 comments:

  1. रेत के गिरने में एकता नहीं थी. गिरना तय था लेकिन उसकी भी अपनी कोई शर्त नहीं थी

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  2. जब सबने ही गिरने को निश्चय कर लिया है तो।

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  3. जैसे एक अरसे बाद ज़िन्दगी से मिल कर विस्मित हो उठे... जीने की आदत छूट जाने के बाद जैसे साँसे नई नई लगें... संदेह भरा सच... मृगतृष्णा सा...

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आभार

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आभार

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