Wednesday, November 2, 2011

परत होती है शायद इसलिए आईने के सच बोलने का भ्रम बना रहता है



सिमटे में फैला एक गांव, कोहरे में उजागर एक सुख

देर का भूखा बच्चा अपनी मां के आंचल में घुसा दूध पी रहा है। पेट भरने को है और अब खेलते खेलते पी रहा है। इस क्रम में गोद से बाहर लटका कभी पैर झुलाता है तो कभी सीने औरत के सीने पर से आंचल को पकड़ हटा देता है। हटा देता है कुछ इस तरह से जैसे पहचाने से किसी पहाड़ को अनजाने पर्दे से आज़ाद कर रहा हो। मां बार बार इधर उधर देख कर आंचल ठीक करती है। बीच बीच में बच्चा निप्पल से मुंह हटा कर किलकारियां मारता है। औरत को लगने लगता है कि इसका पेट भर चुका है इसलिए अब खेल रहा है, वह फैसला करती है कि मिनट दो मिनट बाद वह थन से बच्चे का मुंह छुड़ा देगी। उधर  बच्चा बीच बीच में थन में फिर दांत लगाता है। लगातार पड़ते दांत और भींगने के असर से थन अंगूठे-सा हो गया है। उस पर दांत के निशान साफ-साफ दिख रहे हैं। जब भी बच्चा दूध पीता है, मां का मन गुदगुदाता है। वह इसमें सहयोग समर्थन कभी लोरी गा कर, कभी कोई लोकगीत गुनगुना कर, अपने बच्चे को सहला कर करती है। कई बार वह बस उसे अपने गोद में उठा लेती है। बच्चा बाकी काम खुद कर लेता है। तब वह चुल्हे के पास बैठी दाल भी बघार सकती है, ऊनी स्वेटर भी बुन सकती है, अन्य औरतों के गप्पें भी लड़ा सकती है, । और जब कुछ नहीं कर रही होती है तो -

क्या यह मेरा ही शरीर है ! कैसे एक शरीर से दूसरे का जन्म हो जाता है ? जिन चीज़ों में हमारा भरोसा नहीं होता, वक्त उसे पूरा कर देता है। कभी मैं बेटी थी, आज मैं मां हूं। मेरी शरीर से पोषित हो रहा यह पौधा आह कितना खुशनसीब! हल चलाए, मंडी में अनाज बेचे या ईंट का भट्टा लगाए। जीने के लिए क्या चाहिए ? बस बुनियादी चीजें। लल्ला दूध पीएगा और सब कुछ खुद सीखेगा और करेगा। आखिर किसान खानदान का है। ललकार में भी मां का दूध होगा और लड़ाई में भी इसी की ताकत रहेगी। कुव्वत नापने में भी कहा जाता रहेगा कि मां का दूध पीया है तो सामने आओ।

कुछ किलोमीटर के शहर में विलीन सघन शंका

पलंग पर बच्चा अभी अभी मां का दूध पी कर लेटा है। अब खेल रहा है। बीच बीच में अपने पैर का अंगूठा मंुह में ले लेता है। चूंकि कमरे में कोई और नहीं है इसलिए अभी तक अपने कपड़े ठीक नहीं किए हैं। किनारे से मैक्सी के नीचे उसका दूधिया सीना दिख रहा जो इस कदर गोरा है कि उसमें उसकी यहां से वहां तक दौड़ती हरी-हरी नसें भी नुमाया है। चेहरे पर कुछ थकान है और चेहरा चिंताकुल। में बगल में लेटी औरत उसे तिरछी नज़र से देखती है -

बिल्कुल अपने बाप पर गया है। मतलब निकल गया तो फिर अपनी दुनिया में बिजी। गोद चाहे मां का हो, आंगन चाहे सास का हो या दामन चाहे वाइफ का हो। प्योर सेलफिश ! जहां जहां जिससे जरूरत हुई, आंखें में प्यार भर कर, भोला सा मुंह बना कर, मंुह मार लिया। चाहा था बच्चा मुझ पर जाए लेकिन नाक, माथा और होठों का कटान उसी रास्कल पर गया है जिसके चेहरे से चिढ़ है और दोबारा नहीं देखने की कसम खाई है। भगवान भी डबल गेम खेलता है। बस चेहरा बदला है लेकिन अक्स वही है। क्या पता हुनर भी वैसा ही हो ! आखिर है तो उसी का औलाद ना। कितना भी कलेजे से लगा कर रखूंगी बड़ा होकर बनेगा तो आखिर वही मर्द ना। दो बाप का औलाद होगा कमीना। अपनी मां का भी होता तो क्या ऐसा होता ?हुंह ! बास्टर्ड।

3 comments:

  1. दो औरतें, दोनों माँ... एक के लिये मातृत्व एक ख़ूबसूरत एहसास दूसरी के लिये सिर्फ़ ज़िम्मेदारी... बदला हुआ परिवेश और परिस्थितियाँ किस कदर एहसास और सोच बदल देते हैं !

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  2. चश्मे के लेंस बदल कर दुनिया दिखाने में मास्टरी...

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  3. चश्मे के साथ साथ कैमरे के भी सारे प्राचीन और अत्याधुनिक लैंस रखते हैं जनाब अपने झोले में, जितने angle जीवन के होते हैं, उतने ही इनके लिखने में भी नज़र आते हैं...थ्री डी चश्मा लगाने की जरुरत तो अब हमें पड़ा करेगी....

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