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कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हम भी, और ये चोट नई है अभी



एस:  धूप में खेलते बच्चे, टाट की झीनी पर्दों से आती रोशनी, आंगन में चलते चापाकल की आवाज़ ?

वी: ना... ना... दरिया के बढ़ते पानी में कूदे डूबते बच्चे, मन भर गेहूं का ढेर, बीच खेत कमर भर पानी में लगा        मचान।

एस: अच्छा ठीक, पुरखों की ज़मीन से निकले कलसी को सहलाना, कुलदेवी के लिए सात घाट का पानी और पुरानी घाट पर के संगमरमर को आंखों से सहलाना ?

वी: ना... ना... साफ पानी के ठीक दो इंच नीचे करवट लेती मछली, शर्मीला टैगोर जैसी आंखों वाली हिरण की कुचांले और अरहल की दाल को देसी घी में हल्के भूनने की महक...

एस: सहमत यानि कि ऊपरी अधरों को चूमना छोड़ उभारों के बीच का सीना और पतली कमर में गिटार का अक्स, श्वेत श्याम रंग में उभरे हुए कूल्हे यानी आमंत्रण देता कटा सेब और.... और....

(बात काट कर... )

वी: हां अबकी बिल्कुल ठीक, यानि वो नहीं जो होना ही हो बल्कि... 

(क्राॅस करता हुआ एस) 

एस:         बल्कि हो ही जाने में एक अनजान डगर जो हो जाने को रोमांचक, अर्थपूर्ण, विस्तृत और अंत में अनुभव का विशद पुराण के बाद सारगर्भित कहलाए।

एस एंड वी: हंसी 

(फिर इक्को)

Comments

  1. http://www.youtube.com/watch?v=EwyXMvJtwEU

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  2. फिर इको...वाह...क्या कहूँ लाजवाब कर देते हैं आप...

    नीरज

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  3. आपका ब्लॉग टाइटल हमेशा 'शौचालय' जैसा भ्रम पैदा करता है !

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समानांतर सिनेमा

आज़ादी के बाद पचास और साथ के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. एक धारावह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे. उनकी फिल्मों को सामानांतर सिनेमा का दर्जा दिया गया. प्रख्यात फिल्म विशेषज्ञ फिरोज रंगूनवाला के मुताबिक, अनुभूतिजन्य यथार्थ को सहज मानवीयता और प्रकट लचात्मकता के साथ रजत पथ पर रूपायित करने वाले निर्देशकों में विमलराय का नाम अग्रिम पंग्क्ति में है. युद्धोत्तर काल में नवयथार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन का निर्माण किया, जिसने बेहद हलचल मचाई. बाद में उन्होंने बिराज बहू, देवदास, सुजाता और बंदिनी जैसी संवेदनशील फिल्में बनायीं. दो बीघा ज़मीन को देख कर एक अमेरिकी आलोचक ने कहा था इस राष्ट्र का एक फिल्मकार अपने देश को आर्थिक विकास को इस क्रूर और निराश दृष्टि से देखता है, यह बड़ी अजीब बात है.

            समानांतर…

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियांमहाराष्ट्रतक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता मेंहीरालाल सेन और जमशेद जी मदनभी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों मेंप्रदर्शितहोकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों मेंप्रदर्शितकरें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारानिर्देशितफिल्म 'बिल्म मंगल'तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहलाप्रदर्शननवम्बर, 1919 में हुआ।जमदेश जी मदन (1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंनेकलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेसबनाया। यह सिनेमाघर आज भी मौजूद है और अब इसका नाममिनर्वाहै। 1918 में मदन का …

यही आगाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था...

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सच में, और कहानियों की तरह हमारे प्यार की कहानी में भी कुछ नया नहीं घटा। प्यार समाज से पूछ कर नहीं किया था लेकिन शादी उससे पूछ कर करनी होती है। घर में चाहे कैसे भी पाले, रखे जाएं हम उससे मां बाबूजी और खानदान की इज्ज़त नहीं होती मगर शादी किससे की जा रही है उस बात पर इज्ज़त की नाक और बड़ी हो जाती है।
कोई दूर का रिश्तेदार था जो मुझ पर बुरी नज़र रखता था। मैंने शोर मचाया तो खानदान की इज्ज़त पैदा हो गई। और जब अपने हिसाब से जांच परख कर अपना साथी चुना फिर भी इज्ज़त पैदा हो गई। बुरी नज़र रखने वाला खानदान में था इससे इज्ज़त को कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन एक पराए ने भीड़ में अपने बांहों का सुरक्षा घेरा डाला तो परिवार के इज्ज़त रूपी कपास में आग लगने लगी।
और प्यार की तरह हमार…