Tuesday, December 20, 2011

ताप


"गहरे दुख में स्त्री देह एक शरण है। चूल्हे की आंच में जैसे कोई कच्ची चीज परिपक्व होती है उसी तरह पुरुष के क्षत- . विक्षत खंडित अस्तित्व को वह देह संभालती है धीरे . धीरे अपनी आंच में फिर से पका कर जीवन देती है। स्त्री देह कितनी ही बार चुपचाप कितनी ही तरह से पुरुष को जीवन देती है पुरुष को नहीं पता होता।"  
 --- दर्शक, प्रियंवद.

लैम्पपोस्ट के नीचे बैठा हूं। नोयडा में विजि़बिलिटी शून्य है। डेढ़ सिगरेट पी जा चुकी है। आधी बचा कर रखी है। जेब में मेरे अरमानों की तरह मुड़ा तुड़ा कहीं पड़ा होगा। वही असमंजस में फंसा, मेरे दिल की तरह छोड़ दिया जाए या फूंक दिया जाए सा। किसी दड़बे में पड़े चिकेन सा जो अपने सारे साथियों को बारी बारी खींचा जाता देख दूर पिंजरे से और सटता जाता है और गला रेते जाने से पहले ही उसकी आंखे कई खून देखकर मर जाती हैं। गौर से देखो तो आज तकरीबन हर आदमी भी इसी तरह जी रहा है कि मेरी बारी नहीं आएगी से बचता हुआ। और इसी भ्रम में मौत से पहले बेमौत मरता हुआ।
इस जगह पर पीछे मुड़ कर तुम्हें याद कर रहा हूं और यह किसी सिनेमा का क्लाइमेक्स लग रहा है। क्या वह दुनिया मेरे लिए है जहां तुम हो ? 
तुम्हारा प्यार, थोड़ा सा अतीत और कुछ कसैले रिश्तों की गर्मी के अलावा आज रात की जमा पूंजी यही है। ठंड हड्डियों तक मार कर रही है। तुम्हारे गले में सोने की चेन का ख्याल आया है। वो कहां तक जाती होगी ? एक अनैतिक सा फैसला यह कि ऐसे में सिर्फ प्यार से क्या होगा। तुम्हारे बदन का ताप मिले तो आज शायद बच जाऊं।

6 comments:

  1. देह में विदेह अनुभव, आपकी कल्पना-पकड़ में ही है।

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  2. इस जगह पर पीछे मुड़ कर तुम्हें याद कर रहा हूं और यह किसी सिनेमा का क्लाइमेक्स लग रहा है। क्या वह दुनिया मेरे लिए है जहां तुम हो ?

    जानलेवा! कहर लिखे हो! फुल फॉर्म में आ गए हो...क्या क़यामत बरपा हुयी है तुमपर?

    हमारा सलाम सागर साहब!

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  3. तुम्हारे गले में सोने की चेन का ख्याल आया है। वो कहां तक जाती होगी ? एक अनैतिक सा फैसला यह कि ऐसे में सिर्फ प्यार से क्या होगा। fir bhi dil hai ki yaad kiye ja raha hai.

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  4. गौर से देखो तो आज तकरीबन हर आदमी भी इसी तरह जी रहा है कि मेरी बारी नहीं आएगी से बचता हुआ। और इसी भ्रम में मौत से पहले बेमौत मरता हुआ।
    यह भयानक द्रश्य देख-देख हम आखें मूंद जीने के अभ्यस्त हो गए हैं...

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  5. mai aap se sikh raha hu saagar ji..... aap man ki bhaavnao ko sidhe shabd me utaar dete hai..

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