Friday, January 27, 2012

एसबेस्टस की छत पर बारिश जोरदार होती है फिर भी मछलियाँ अधूरी प्यास मरती हैं



निचाट गर्मी की रात है। बगलों से पसीने की धार बहती रहती है। सुबह बनी रोटी ढक कर शाम तक रखने से बदबू आने लगती है। हर कोई पस्त है। मौसम न हुआ एक लाल पका पपीता हो गया, सबके दिमाग पर इसका असर चढ़ा रहता है, कोई किसी से ठीक से बात नहीं कर पाता। चिढ़ कर जवाब दिए जाते हैं तुर्रा यह कि किसी को टोकना भी उस पके फल में कौवे के चोंच मारना जैसा लगता है। पंछी ने चोंच मारा नहीं कि आधे से ज्यादा गूदा ज़मीन पर... मतलब अप्रत्यक्ष एक क्रिया इस कदर हावी है कि उसकी होती प्रतिक्रिया बहुत है।

ऐसे में छत पर सीमेंट जमाई हुयी एक सीट है। उस पर लड़की बैठी है। शादी में छह दिन बाकी हैं। बिल्कुल खुला आकाश है। आकाश की पीठ पर तारों का जमघट है। ऐसा लगता है उनमें एक दूसरे पर चढ़ने की होड़ है और इसी चक्कर में वे दीवाली के समय के कीड़ों के तरह अपनी सतह से गिरते जा रहे हैं। प्रेमी युगल इस नज़ारे को देख कर हैरान हैं। वे चकित हैं कि आखिर इतने सारे तारे ज़मीन पर एक ही रात कैसे गिर रहे हैं! पिछले घंटे में ही लगभग चौदह तारे गिर चुके हैं। अपनी 28 बरस की उम्र में उसने कल तक बमुश्किल कुल चौदह तारे गिरते देखे होंगे। रूमानी दिनों में वे तारों के गिरने को वरदान मानते थे और हर गिरते तारे को देख एस. एम. एस. करते, और एक दूसरे को मांगते। मगर यह हकीकत की ऐसी घड़ी है जहां सारी फिलोसफी बेकार है।

लड़की के बदन से हल्दी की महक आ रही है। इन दिनों उसका अजब सा हाल है। विवाहित औरतें उसे हल्दी लगाने के बहाने उसे तथा उसके अंगों से छेड़छाड़ करती हैं।  उसके कुरती के अंदर हाथ डाल अपने दिनों, ख्यालों और मनोभावों के लट्टू लड़की पर घुमाती है।  ही-ही, ठी-ठी और बेशर्म चुटकुलों के बीच एक से बढ़कर एक फंतासी गढ़ती हैं। ऐसा करेगा तो वैसा लगेगा और उबटन-लेप संबंधी कई और टिप्स दिए जाती है। लड़की के ज़हन में दो लड़कों का ख्याल है जो नहीं होने वाला है उसको सोच कर शर्माती है और जो होने जा रहा है उसे सोच खुश नहीं है। यह थोपा हुआ फैसला है जो अमूमन हर मिडिल क्लास घर का हाल है। औरतें टूट टूट कर लोकगीत भी गाती चलती हैं। पूरा घर एक खिला हुआ सरसों का फूल लगता है जिसमें पीले रंग बखूबी उभर कर आते हैं।

इसी बीच, क्षण भर के लिए अति व्यस्त सगा भाई भी आंगन से गुज़रता है, इस छेड़छाड़ को सुन उसे थोड़ा बुरा और थोड़ा भला एक साथ लगता है लेकिन इसे औरतों का मामला समझ वह आगे बढ़ जाता है।

अब मेरा यकीन कीजिए कि इस हंसते खेलते और बेफिक्र घर में मैं भावुकता जैसी ढोल कतई नहीं बजाना चाहता और घनघोर असमंजस में हूं कि शादी से छह दिन पहले मिलन की इस ऐन घड़ी मैं किससे क्या कहलवाऊं, किसके जिम्मे कौन सा संवाद दूं। जज्बाती होने के कारण मैं हर बार थोड़ा रो कर जी हल्का कर लेता हूं। हालांकि आड़े वक्त भावुक होकर रोना मुझे शोभा नहीं देता। मैंने सोचा कि मैं अपनी बहन से इस बाबत बात करूं। वो कहती है तुम तो लिख रहे हो, सुखांत प्रेम कहानी बना दो। इतना तक तो पढ़ने में अच्छा लगा, और पाठक भी खुश होंगे। वह पागल यह नहीं जानती कि यह हमारे हाथ में नहीं होता। मैं किसी मंत्रालय या प्रोड्यूसर द्वारा हायर किया गया स्क्रिप्ट राइटर नहीं हूं जो क्रमशः जनहित या स्वहित में ज़ारी के लिए लिखूं, उसमें योजना विशेष की बुनियादी बातों और लाभ को इन्सर्ट कर उसके एवज में पैसे जेब में डाल अगले काम के लिए निकलूं। 

तो हम ऐसा करते हैं कि जो कुछ मुझसे किसी अदृश्य ताकत द्वारा लिखवाया जा रहा है उसे लिख देते हैं चाहे यह आपको भावुक करे या यह विचारणीय हो, इसकी परवाह किए बिना।

लड़का: (मिमियाते हुए) आज तारे ज्यादा ही टूट रहे हैं? 

लड़की:  हूं...

दोनों समानांतर पटरी पर भी अलग अलग चीजें सोच रहे हैं। 

लड़का: अब इसका क्या मतलब निकालें, मैं तुम्हारे जिंदगी से तारा बनकर हमेशा के लिए टूट रहा हूं या हमारे इस आखिरी मिलन पर भगवान भी फूल की जगह तारे बरसा रहा है ? 

लड़की: जिंदगी में से अगर तुम्हें कोई एक दिन निकालने का मौका मिले तो तुम कौन सा दिन निकाल देना चाहोगे ?

लड़का: (लड़का अपने ही ख्याल में गुम है) हमलोग भी आखिरकार बदनसीब ही निकले 

लड़की: (कातर नज़रों से प्रेमी को देखते हुए, आवाज़ में सन्नाटा, बेबसी और उदासी तीनों का मिश्रण, अबकी कंधा छू कर) जवाब दो, अगर तुम्हें अपनी जिंदगी में से कोई एक दिन निकाल देने का मौका मिले तो तुम कौन सा दिन निकाल देना चाहोगे ?

लड़के का घुटना काफी दुख गया है वो अब पालथी मार कर बैठ गया है। लड़की की गोद में उसकी दोनों हथेलियाँ खुली हुई हैं। लड़का उसमें अपना चेहरा रख देता है। पसीने भरी हथेली थोड़ी और गीली होती है, हथेली के जीभ को नमकीन आँसुओं का एहसास होता है।

लड़का: जिस दिन तुम्हें पहली बार देखा था! ना तुम्हें देखता ना ये फसाना बनता। और तुम ?

लड़की: जिस दिन तुम्हें भैया बोलना पड़ा था। 
(संयोग से दोनों दिन एक ही हैं)

(लड़के की आंखों में थोड़ी मुस्कुराहट तैर आती है। लड़की ज़ारी...)

लड़की: तुम हिम्मत नहीं कर पाए ना...

लड़का: तुम जानती हो इसका कोई फायदा नहीं था। 

लड़की: तुम हिम्मत दिखाते तो मुझे ज्यादा नहीं दुखता।

(लड़का चुप) 

(लड़की ज़ारी)

लड़कीः हुंह (व्यंग्य भरी क्षणिक हंसी) कैसा हमारा भी समाज है। सारे मां बाप डरे हुए रहते हैं। बच्चों को आत्मनिर्भर सिर्फ नौकरी पाने के लिए बनाते हैं लेकिन मर्जी अपनी चलाते हैं। अपनी असुरक्षा को, अपने मन के डरों को लड़कियों के मन में वे शुरू से ही ठूंसना देते हैं कि तेरे भाई के सारे दोस्त भी तेरे भाई ही होंगे...(गला रूंधता है).... आसपास के लड़के भी तेरे भाई होंगे। (रोती है) मुझे हक नहीं कि मैं तय करूं कि कौन मेरा भाई होगा कौन....  (कसपते हुए) मैं तुम्हें दोष नहीं देती लेकिन यह जि़ल्लत समाज नहीं मैं और मेरे जैसे कितने उठाएंगे? हम प्यार भी उनकी मर्जी से करेंगे ? बड़े होकर जिसे भाई बोलने का दिल नहीं करता, उसे भी बचपन में मजबूरी में भाई बुलवाया जाता है। (फफककर) आखिर उन्हें किस पर भरोसा नहीं होता ? अपने पर, अपने ही बनाए रवायत पर या अपने बच्चों पर? 

लड़की झुक कर अपना सर लड़के के कंधे पर रखती है, लड़का उसे थोड़ा किनारे पर ला चूमता है, दोनों के कंपकंपाते होंठ एक दूसरे से लगे हैं। लड़का सहारा देकर पीछे हटने के लिए होंठ थोड़े कड़े करता है, आंखें दोनों की बंद हैं, चार आँखों से आँसू की धार बह रही है। अंदर की टीस, एक अथाह विछोह का दर्द, बहुत सारा भार, पसीना, आँसू की लड़ी सब अधरों के पास सिमट आया है। पता नहीं यहाँ और क्या-क्या है। सब एक दूसरे में इतने घुल मिल रहे हैं कि पहचानना मुश्किल है। शायद यह चुंबन नहीं आकाश में घटित होता कोई घटनाक्रम है। ऐसे घटनाक्रम हर मुहल्ले में घट जाया करता है। चुपचाप। बेआवाज़। बिना कोई सवाल किए..बिना किसी प्रतिरोध के...

लड़का आँखें खोलता है। लड़की के होठों के ऊपर हर रोम पर पसीने की नन्हीं नन्हीं बूंदें हैं। वह रात की तरह उसके जिंदगी से जाना चाहता है ताकि अब उसकी जिंदगी में सिर्फ सुबह ही सुबह हो, उजाला ही उजाला हो। जिल्लत भरी जबरदस्ती थोपे हुए रिश्तों के नाम से आज़ाद....

सहसा दोनों ऊपर देखते हैं (जब आप अंजाम नहीं जानते हों तो ऊपर देखने की दर ज्यादा रहती है)। अबकी चार तारे एक साथ टूट कर गिरे हैं। थोड़ा नीचे आने के बाद बुझ गए हैं। लड़की को लगता है कि धरती टेबल के नीचे रखा कोई कूड़ेदान  है। वहां कुर्सी पर कैसा निष्ठुर ईश्वर बैठा है जो सरदर्द वाले दिन ऐसे स्क्रिप्टों का ड्राफ्ट बना कर फेंक देता है जिसके किरदार हम ही हों।

लड़के को यह लगता है कि धरती ऐश ट्रे है. ईश्वर ही होगा, लेकिन इस अंत पर उसके भी दिल में एक कसक उठी होगी और उसने सिगरेट पी कर तारों के बहाने उसकी राख अपने  अपने उंगलियों से नीचे झटकी होगी।

3 comments:

  1. कुछ कहना ज़रूरी तो नहीं होता हर बार हर बात पे ... आँखों की नमी काफी है . लोगों के लिए कहानी बदल कर क्या , आँखें तो नम ही रह जाएँगी कहीं ...

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  2. ज़रूर ईश्वर ही होगा... शायद रो पड़ा होगा इस अंत पर... अपने बन्दों की बेबसी पर... और उसके आँसू तारे बन कर बरस रहे होंगे... शायद सोच रहा होगा की इंसान के साथ साथ उसे समाज की रवायतें भी ख़ुद ही बना देनी चाहिये थीं... पर अब वो भी बेबस है... इंसान उसकी सोच से नहीं चलता और ऐसे घटनाक्रम हर मुहल्ले में घट जाया करते हैं। चुपचाप। बेआवाज़। बिना कोई सवाल किए..बिना किसी प्रतिरोध के...

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  3. सबसे पहले तो वाह इन दोनो उपमाओं के लिये

    १ - "लड़की को लगता है कि धरती टेबल के नीचे रखा कोई कूड़ेदान है। वहां कुर्सी पर कैसा निष्ठुर ईश्वर बैठा है जो सरदर्द वाले दिन ऐसे स्क्रिप्टों का ड्राफ्ट बना कर फेंक देता है जिसके किरदार हम ही हों।"

    २ - "लड़के को यह लगता है कि धरती ऐश ट्रे है. ईश्वर ही होगा, लेकिन इस अंत पर उसके भी दिल में एक कसक उठी होगी और उसने सिगरेट पी कर तारों के बहाने उसकी राख अपने अपने उंगलियों से नीचे झटकी होगी।"

    कहानी में लेखक का स्वयं उतर आना भी अच्छा लगा और उसी ने इस कहानी को वैसे दिखाया कि ये फ़िल्मों वाले कैमरे की बजाय किसी हैंडीकैम से शूट की हुयी कोई फ़िल्म हो जो आपसे बहुत दूर नहीं दिखती। एक क्लोजनेस सी रहती है कहानी के साथ...

    फ़िर भी जाने क्यों मैं कुछ और चाहता था... शायद मेरे मन में कुछ और था या उसे कुछ और चाहिये था...

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