Monday, March 5, 2012

इतिहास पलटो नदी का जहां खड़े हो कभी वहीँ से बहा करती थी



मुझे लगता है हमारे प्यार में अब वो स्थिति आ चुकी है जब मैं तुम्हें उस पुल पर बुला, बिना कुछ कहे ईशारा मात्र करूंगा और तुम वोल्गा में छलांग लगा दोगी। अरी पगली! जितनी सीधी तुम थी उतने हम कहां थे। तुम प्रेम जीने लगी थी और मैं प्रेम खेलने लगा था। सकर्स के किसी कुशल खिलाड़ी की तरह मैं एक ही वक्त पर कई प्रेम को गेंद की तरह हवा में खिला रहा था। उन दिनों मेरा आत्मविश्वास देखते ही बनता था। तुम दायरे के बाहर से मुझे मंत्रमुग्ध होकर देखती रहती और मैं उन गेंदों के साथ सालसा कर रहा होता। सर्कस की नियमित परिधि को एक अलग दुनिया जो ठीक तुम्हारे सामानांतर चल रही होती उस पर मैं अपने काम में तल्लीनता से लगा होता। मुग्ध हो जाने को बस वही एकमात्र क्षण था जब मैं अपने कर्म में रत था। ठीक निराला की तरह जब वह पत्थर तोड़ रही थी कवि उस पर मुग्ध था। वो पत्थरों को आकार दे रही थी और कविता का आधार रच रही थी, उधर वो कवि उस पर मुग्ध था। उस मुग्धता में भी जाने उसने अपनी कौन सी इंद्रिय बचा रखी थी जो उसके दर्द की परतें उधेड़ता है। मैं भी वही था एक कर्मयोगी सा चेहरा जिससे तुम प्यार कर बैठी थी, था तो आखिर वो आदमी का ही चेहरा। और जब भी वो अपने कर्म से विरत होता एक आदमी में तब्दील हो जाता। 

औरतें मुझसे संभलती नहीं और उनका अंबार लगा है। सोचता हूं बाढ़ के इन दिनों से इतर क्या जीवन में वो दिन भी आएगा जब मैं इनके लिए बिल्कुल ही तरस जाऊंगा ? 

सिंगल सिंगल नदियां अकेला अकेला आदमी लगता है। नदियों को जोड़ देना चाहिए। तभी तुम्हें ना वोल्गा होने का अधूरापन होगा ना मुझे अमेजन होने पर अपनी भरपूरता का एहसास का भ्रम। रानी, तुम दुबली, पतली, सीमित होते हुए भी एक कल्चर हो मैं भरा पूरा फैला - एक बर्बर आदिम जाति। 

अगर जीवन एक तलाश है तो वोल्गा में कूद पड़ने से पहले तक जो तुम्हारी पलकें अब बूढ़ी हो चली हैं, तुम अपने पैरों में मेंहदी लगा कर आई हो। वो मेंहदी जो अभी तक गीली-हरी हैं, तुमने अपने स्कर्ट को अपने पैरों से सटने नहीं दिया है। 

तुम मेरे प्यार में जान दे रही हो तो कायदे से तो सफेद पलकें अब फिर से हरी हो जानी चाहिए लेकिन मर जाने के बाद हमारी उम्र घट नहीं जाती। एक काम तो करो ही तुम कूद पड़ो लेकिन मेरी तलाश अभी पूरी नहीं हुई है रानी। लेकिन इत्मीनान रखना ही मैं भी कभी न कभी किसी न किसी के आंखों से ही मारा जाऊंगा। दुनिया ऐसे ही चल रही है, चलेगी। फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि तुम प्रेम में सिद्धस्त खिलाड़ी के प्रेम पाश में मर मिटोगी और मैं इस स्वाद से बिल्कुल बेखबर, एकदम अल्हड़ लड़की पर फिदा हो जाऊंगा। तुम स्त्रियां हमेशा उच्च कोटि के चीज़ तलाशती हो अगर नहीं मिलता है तो कमियों से भरे बुत को तराशती हो लेकिन हम डूबेंगे उसी लड़की के भंवर में जो चाक के सामने बैठी हो, जिसकी उंगलियां गीली मिट्टी में लिथड़ी हो, वो भी अपने कर्म में रत हो, सामने की एक लट गालों पर झूल रही हो और बाल का एक टुकड़ा गीली मिट्टी में सन जाए। इन सब के बीच हल्की हवा उसके जांघों पर की फ्राॅक छेड़ जाती हो।

मैंने उस दिन कूदने के लिए इस तरह का ही कोई दृश्य अपनी आंखों में सजा रखी है। प्रेम का खेल खेलते खेलते अब मैं उस स्तर पर पहुंच चुका हूं जहां अब अगर कोई मेरे लिए कोई बड़ा से बड़ा त्याग करता है, मैं खुद ही उसकी हत्या कर देता हूं या जान देता है तो मुझ पर अब कोई असर नहीं होता। हमें ऐसे ही जाना है रानी। तुम मेरे प्रेम में तृप्त हो कूद रही हो मैं भी किसी न किसी के प्यार में आत्म विसर्जन कर लूंगा।

इसी तरह सबका जीवन जाया होगा और किसी का भी जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। जि़ंदगी को लेकर हमारे ऊहापोह तो देखो रानी कि जो है उसी में हर बार नई नज़र तलाशते रहते हैं।

5 comments:

  1. प्रेम को जीने और प्रेम को खेलने में कितना फर्क है

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  2. न जाने हमें क्या भाता है,
    तुम्हें पर क्या समझ आता है?

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  3. Photo nahin dikh raha...fir se chipkao

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  4. आपको पढ़ते हुए लगता है मन की किसी गहरी नदी में छलांग लगा दी हो। आपने मनोविज्ञान पढ़ा है क्या। बहुत बढ़िया

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  5. ये पोस्ट अद्भुत है...इसमें कई बार खुद का अक्स नज़र आया...हम किसी लेखक को इसलिए बेहद पसंद करते हैं कि कहीं न कहीं उसके लिखे में खुद को पाते हैं...ये आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या है...किन्ही खूबसूरत शब्दों में खुद को तलाशते हुए ऐसे ही किसी नदी में कोई क्यूँ न छलांग लगा दे...तुम रच ही ऐसा मोहक रहे हो सागर...हर पंक्ति पर निसार जायें जैसा कुछ...शुरुआत ही एकदम कातिलाना हुयी है यूँ तो पर पूरी पोस्ट में कई बार पैर फिसलते बचे हैं...वोल्गा का पानी जाने कैसा होगा...

    'मुझे लगता है हमारे प्यार में अब वो स्थिति आ चुकी है जब मैं तुम्हें उस पुल पर बुला, बिना कुछ कहे ईशारा मात्र करूंगा और तुम वोल्गा में छलांग लगा दोगी। अरी पगली! जितनी सीधी तुम थी उतने हम कहां थे। तुम प्रेम जीने लगी थी और मैं प्रेम खेलने लगा.'

    ओह...मत खेलो प्रेम से रे पगले, कि इसके उलट भी स्थिति आती है...मगर जब आये तब आये...फिलहाल...लिखा बेहद खूबसूरत और मंजा हुआ है...तलवार की धार पर के नर्तन जैसा.

    जियो!

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