Saturday, May 12, 2012

हलाल



रात भर बकरा टातिये के साथ बंधा म्महें - म्महें करता रहा। प्लास्टिक की रस्सी से बंधे अपनी गर्दन दिन भर झुड़ाने की कोशिश करता रहाबकरा बेचने वाले ने खुद मुझे सलाह दी थी कि ऐसे सड़क पर घसीट कर ले जाने से कोमल गर्दन में निशान पड़ जाएंगे जो उसकी खराब तबीयत का बायस होगा। सो उसने खुद उसके खुर के बीच से रस्सी लेते हुए एक गांठ उसके पिछले बांए पैर में बांध दी। मैंने मालिक को उसके बाकी रह गए पैसे दिए और मैंने ले जाने के लिए जैसे ही रस्सी को झटका दिया, खींचा बकरे ने जोरदार बगावत कर दी। बकरे का मालिक जो कि अपने शर्ट का चार बटन खोले बैठा था और जिसके दांतों के बीच फांक में पान का कतरा अब भी फंसा था ऐसे में हंस रहा था। चूंकि मैं ऊंची जाति से आता हूं और वो मेरा देनदार रहा है सो वह मेरे सामने नीम की एक पतली सींक ले जोकि अमूमन खाने के बाद दांत में फंसे अनाज के टुकड़े को छुड़ाने के लिए किसी मुठ्ठा बनाकर छप्पड़ में टांगा जाता है वह उससे अपने कान की अंदर की सतह पर वो टुकड़ा घुमा सहलाने का आनंद ले रहा था। बकरा अब भी मुझसे अपरिचित की तरह व्यवहार कर रही थी। वह अपने चारों पैरों को फैलाकर जाने से इंकार कर रही थी। बकरा मालिक ने अबकी थोड़ा अपना रौब दिखाया और अपने बकरे  के माथे पर दो बार हाथ ठोक कर कहा - जो यानी जाओ। इस रस्म के बाद मैंने नई उम्मीद से फिर रस्सी खींची बकरी ने डरावनी डकार मारते हुए फिर इंकार में गर्दन झकटा। मुझे परेशान और खासी मशक्कत करते देख अबकी पहले थोड़ा हंसा और फिर गुस्से में भर कर उसका माथा ठोककर कहा - जाओ न रे बहनचोद ! जाओ! बकरे ने अपनी नर्म, गुदगुदी लगाते जीभ से मालिक का पैर एक बार फिर चाटा और चल पड़ा
पूरे रास्ते अब मुझे उसके लिए कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ी। आलम यह था कि सड़क पर हांकने की जरूरत ही नहीं थी। मेरे और उसके बीच रस्सी में कभी खिंचाव नहीं आया। बल्कि मैं तो बस नाम मात्र को डोरी पकड़े भर था और मेरे और बकरे के पैर के बीच की रस्सी माला की तरह नीचे की गोलाई लिए हुए थी जिसमें समझौता कहीं नहीं था। 
अपने घर के आंगन में जब मैं उसे लेकर दाखिल हुआ तो घर वालों के लिए एक नई दिलचस्पी का सामान था। बच्चे कौतुक से उसे देख हंस रहे थे। कोई पीठ पर हाथ फेरता कोई उसकी म्महें म्महें सुन कर हंसते हंसते दोहरा हो जाता। एक तुतलाते हुए बच्चे ने तो बाकायदा नकल तक उतारनी शुरू कर दी जो कोयल की तरह वाद प्रतिवाद के स्वर में थोड़ी देर कर चला। 
घर के बड़ों ने अनुमान लगाना शुरू किया। पंद्रह किलो तो निकल ही जाएगा। एक ने बीच में ही टोकते हुए याद दिलाया कि पंद्रह में तो दो- ढाई किलो बोटी और बेकार माल ही निकलेगा।
फैसला हुआ कि इसे हफ्ते भर बाद हलाल किया जाएगा। तब तक इसे सुबह शाम आधे आधे किलो नया गेहूं खिलाया जाए जिससे इसका शरीर भरे। ऐसे में एक ने अंदाजा लगाया कि तब शायद सत्रह से अठ्ठारह किलो तक मांस मिले।
एक बालिग हो रहे लड़के को इस काम पर लगाया गया कि उसे सूप में गेहूं और और लोटे में पानी दिया करे। साथ ही साथ केले के पत्ते काट कर दिया जाए पर सबसे पहले खूंटे में बांधा जाए। फिर खाली जगह में एक - सवा हाथ का लकड़ी का टुकड़ा ज़मीन पर रखा गया और बांस के बल्ले से जैसे जैसे ठोंका जाता और ज़मीन में पैठता गया। बकरा अब उससे बंधा था। 
एक हफ्ते बाद घर के पिछवाड़े एक जगह को पुराने छोटे बांस और जूट के बोरे से घेरा गया। हलाल करने को लेकर लोगों में बड़ा उत्साह था, लोगों ने निर्णय भी ले लिया था कि मैं फलाना फलाना हिस्सा लूंगा। कलेजी पर पहले ही मुहर लग चुकी थी। खबर मुहल्ले के डोम टोले तक भी पहंुच गई थी और वहां से एक बुढि़या आंतों को लेने के लिए वक्त से घंटे पहले ही आ कर बैठ गई थी।
बकरी को काटने को लेकर सबमें बड़ा उत्साह था। ये कोई वीरता भरा काम था। मसाला पीसने वाले सिल्ले पर तलवार नुमा बड़ा चाकू तेज़ किया गया। यह बलि नहीं था फिर भी कुशलता से एक झटके में हलाल करना तारीफ योग्य काम था। जिसने झटके के बजाए ज्यादा वक्त लिया वो ओछी नजर से देखा जाता था। संयोज कुछ ऐसा बना कि मुझे उतारा गया।
घर के बच्चे आंगन में कैद अपनी कल्पना से काम ले रहे थे। औरतें अपने काम में मशगूल थीं। मैं हंसिया लेकर बोरे से घिरे उस जगह में घुसा। दो लोग आए और उन्होंने बकरे को ज़मीन से उपर उल्टा लटकाया। उसका गला अब कपड़े की हल्का मोटा मुलायम रस्से सा लग रहा था जो एक और रस्से से बंधी खिंची थी। ताकीद की गई कि देर न की जाए जिससे बकरे का चिल्लाने का अंतराल जल्दी जल्दी हो। कोई वेग आया बिल्कुल एक झोंके की तरह और उसका सर अब अपने थुथनों से ज़मीन खोद रहा था। आंखें उल्टी हो गई थीं।

मैं खून में बिल्कुल सना हुआ बाहर निकला। खून के छींटे यू ं तो पूरे बदन पर था लेकिन वो एक जगह जो मुझे महसूस हो रहा था वो था जहां मैं चश्मा पहनता हूं तो जिस जगह मेरे नाक पर ऐनक ठहरती थी। यहां खून का यह कतरा दिखता भी था और तीन आयामों में बंट कर दिखता था। मैं चाहता था जल्द से जल्द अपनी कोहनी लगा कर इस कतरे को पोंछ डालूं। 

मुझे सब इकठ्ठा करने में कुल दो से ढ़ाई घंटे लग गए थे। यह पहली बार था जब मैंने खुद को मारा था और मेरी कंुआरी आंखों की झिल्ली एकदम से फट पड़ी थी और तब से मैं एक पेशेवर हलाकू हूं।

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