Saturday, May 12, 2012

बूंदाबांदी से केवाल मिट्टी फिसलन भरी हो गई है। संभलकर बाबू ! कमर चटख सकती है।



रात भर रोता रहा पानी। टंकी किसी मोटे शामियाने में कोई आदमकद अक्स छुपाता रहा। छत की छाती गीले जूते सी सूज गई। सीढि़यां बूंद बूंद कर अवसाद से भर गई। पानी काले कोलतार सा लेई की तरह लरज़ती रही। सुरंग के मुहाने पर पानी छन छन कर गिरता रहा। बीच रास्ते मैं पड़ा-पड़ा सड़क पर ख्याल करता रहा कि वो नहा रही है और केशों से होते हुए पानी भारी हो उसके कंधे भिगो रहे हैं। 
 
रेल की पटरियों के ब्लाउज के हूक किसी ने आज शाम ढ़ले खोले हैं। दिन भर उमस से अपने गंध में डूबी पटरियों के सीने से अब नर्म नर्म धुंआ उठ रहा है। मुसाफिर कहां रहा इत्ते दिन ! रोज मुझपर से गुज़रता रहा और मेरी ही सुध न रही। ये कौन सा शिकायत का लहज़ा लरजा है उसके सीने के बीच से ? जिसे सुन कर दोनों स्तनों के बीच की सिलाई उधेड़ कुछ हीरे छुपा देने का मन होता है उनमें। 
 
दोनों कोहनियों को पेट में चुभा कोई काला बच्चा रो रहा है। दूर रखी डबल रोटी की टोकरी भींग कर मांस का लोथड़ा बन गया है। वाह रे कुदरत! मुंह लगाओ अनाज और पानी साथ मिलेगा। 
 
रेल के डिब्बों पर बरस रहा है पानी। बीच की मांग फाड़े शायद कोई लड़का नहा रहा है। थर्ड ए सी वाली बोगी में खिड़की किनारे बैठी हैदराबादी लड़की मुस्कुराती है।
 
कारखाने से जल्दी छूटा है मोहना। गरजते बादल को देख कहता है मजदूरों को सुहाने दिन छुट्टी नहीं होनी चाहिए। लछमी की याद आती है। इस मुहल्ले का सोनार तो रोज़ ही सोने का भाव बढ़ा हुआ बताता है। दैब ही जाने अबकी बार मंडी में कैथा तर वाले खेत का साढ़े तीन क्विंटल सोना कौन से भाव बिका होगा!
 
शहर की मोबाइलों में रोमांटिक एस एम एस आने लगे हैं। निकिता देखती है इनबाॅक्स - दिल के पास रहने वाले उस छोटे से कपड़े को छत से उतार लो जानेमन, मेरी ही तरह भींग रहा होगा, साथ में एक स्माइली भी है।
 
याद के जंगल से कोई आदिवासी बच्चा गा कर अपने बाबा से पूछ रहा है -
रेलगाड़ी मा खीड़-खीड़ 
मोटरगाड़ी गूड़-गूड़ 
दा अचितन लोकम बागुम खाद-खाद
चीका ते होपेन बागुम तैनो मकान
अब बाबा अपनी रूंधी हुई आवाज़ में जवाब देते हैं - 
ओले ओ पढ़हा ते होंए गोमेन
चासा बासा ते होएं तोइनोमेन
गोगोदादा ते होंए खोटोएन
रींगा इते मारान बाबा तैनो मकान
रींगा इते मारान बाबा तैनो मकान
छत के गड्ढ़ों में जमे पानी थोड़ा थोड़ा अंदर जमी बर्फ सी खामोशी तोड़ रही है। पैर डालता हूं तो और पत्थर बन जाता हूं, यदि तलवों से उड़ा देता हूं याद बिखर जाती है। याद रक्तबीज है और मैं काली नहीं बन पाता। क्षण- क्षण में पैदा हुए प्रेत चारों तरफ अब नाच रहे हैं।
 
इंसान रेत है कई सदी से पानी पी रहा है फिर भी याद इतना रख पाता है कि बहुत प्यासा है।

6 comments:

  1. इंसान रेत है कई सदी से पानी पी रहा है फिर भी याद इतना रख पाता है कि बहुत प्यासा है।
    ...
    सागर रे सागर रे...तुम प्यासे तो फिर हम क्या?

    बिखरा बिखरा सा लिखे हो...जैसे उस दिन बारिश हो जिस दिन मौसम विभाग ने धूप निकलने की भविष्यवाणी की हो...रेडियो पर उसे सुनते मोहल्ले के दादाजी ने पोती पर फरमान जारी किया हो कि छाता लेकर निकले, आज बारिश होगी...लड़की बिना छाते के निकली हो और किसी गली मुहाने भीगते हुए किसी लड़के को देखा हो...थोड़ा मौसम का असर हो थोड़ा उम्र का.

    इस सब को थोड़ा समेटोगे नहीं? जाने क्यूँ ये पढ़ते हुए बरबस 'बू' याद आ रही है...वो भी बरसातों के दिन थे.

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  2. इंसान रेत है कई सदी से पानी पी रहा है फिर भी याद इतना रख पाता है कि बहुत प्यासा है। ये बात बहुत अच्छी और सच्ची कही सागर, लेकिन एक चीज़ जो अखरी वो ये है कि बेहद अच्छे लेखक होने के बावजूद तुम कुछ कॉम्लेक्स लिखने में इसे वेस्ट कर रहे हो...तुम पर मंटो का बहुत प्रभाव है लेकिन तुम्हारे और उनके लिखने का अंतर कॉम्लेक्स और त्रासदियाँ हैं..तुम talented हो सो मंटो बनने कि बजाये सागर बने रहो..

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    1. कई बार मुझे लगता है बल्कि हर रोज़ ही की मैं घमंडी हो गया हूँ. जैसे दिमाग सातवें आसमान में रहने लगा है. क्यों ना मुझे झिड़क कर या डांट कर नीचे लाया जाए.

      मुझे लगता है दिमाग ही वैसा भागता है एक स्पेनिश सांढ़ सा.

      दिमाग हर दिन जुदा होता है. परसों कुछ और था कल कुछ और आज तो उससे भी अलग. मुझे बताते रहिये, मैं सुधारूँगा नहीं है क्योंकि ये मेरे वश में नहीं. लेकिन आपकी सुनता रहूँगा इत्मीनान से, पूरे ध्यान देकर.

      लिख लेने के बाद मैं ही पाठक बिरादरी में शामिल हो जाता हूँ और जम कर सागर कि बुराई/आलोचना करूँगा. थैंकफुल हूँ, आपने इतना तो किया !

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  3. कितना अजीब है ना बारिश वोही पर कितने लोगों को कितनी अलग तरह से भिगो कर जाती है... बारिश की बूंदों का एक कोलाज सा दिखा यहाँ... कभी कभी होता है ना कि बड़े मन से कोई पेन्टिंग शुरू करो और जब पूरी होने के बाद फ्रेम हो जाए तब लगता है यार ये स्ट्रोक ठीक से नहीं आया... इसे ऐसे करना चाहिये था... कुछ कम कुछ ज़्यादा हमेशा लगा रहता है... रहना चाहिये भी... जिस दिन पूरी तरह से सैटिसफाई हो गये अपने काम से उसके बाद कुछ भी पूरे मन से नहीं कर पायेंगे... कुछ कसक बनी रहनी चाहिये ज़िंदगी में...

    ये बाबा और बच्चे के बीच की बातचीत समझाइये तो ज़रा :)

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  4. @ Richa :

    भावार्थ :

    बच्चा : रेलगाड़ी खीड खीड करती हुई आगे चली गयी, मोटरगाड़ी गुड गुड करते बढ़ गयी, पानी का जहाज खित खित करता निकल गया. बाबा तुम पीछे कैसे रह गए.

    बाबा : मुझे किसी ने पढाया नहीं, घर बाड़ सब फूंक गए, माँ बाप मर गए... इसलिए मैं आगे नहीं बढ़ पाया.
    (झारखंड का लोकगीत)

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