Monday, November 19, 2012

कोई जिस्म के ताखे पर रखी डिबिया आँखों की रास कम कर दे



एक ने अपना भाई खोया तो दूसरे ने अपना घर। कभी कभी मन थकने, उसमें शून्य भरने और दुनिया बोझिल लगने के लिए दिन भर के दुख की जरूरत नहीं होती। खबर मात्र ही वो खालीपन का भारीपन ला देता है। कोई पैर झटक कर चला जाता है और पहले से खोखली चौखट के पास उसकी धमक बची रह जाती है जो उसके अनुपस्थिति में सुनाई दे जाती है।

एक ही हांडी में दो अलग अलग जगह के चावल के दाने सीझ रहे थे। तल में वे सीझ रहे थे और ऊपर उनके सीझने का अक्स उबाल में तब्दील हो रहा था। ऐसा भी नहीं था कि वे सबसे नीचे थे। सबसे नीचे तो आंच थी जो उन्हें उबाल रही थी। बदन जब सोने का बन रहा था तो मन तप रहा था। शरीर इस्तेमाल होते हुए भी निरपेक्ष था। शरीर भी क्या अजीब चीज़ है, भक्ति में डालो ढ़ल जाता है, वासना में ढ़ालो उतर जाता है। कई बार उस मजदूर की तरह लगता है जो घुटनों तक उस गाढ़े मिट्टी और पानी के मिश्रण में सना है, एक ऐसी दीवार खड़ा करता जिसमें न गिट्टी है और न ही सीमेंट ही।

क्या दुख पर कोई कवर नहीं होता या हर कवर के नीचे दुख ही सोया रहता है? क्या दुख हमारे सिरहाने तकिया बनकर नहीं रखा जिसपर हम कभी बेचैन और कभी सुकून की नींद कवर और करवट बदल बदल कर सोते हैं।

आज तकलीफ ऐसे ही पेड़ में मरोड़ की तरह उठा। इतना केंद्रित कर गया जैसे जिस्म के बहुत संवेदनशील और उत्तेजित करने वाले हिस्से पर अपनी जीभ से पेशेवर खिलाड़ी की तरह खेल गया। संगीत के किसी अनजाने लय पर हौले हौले, गोल गोल घूमता। और इस दरम्यान हम जो अपनी दांत पर दांत रखकर, तकिये को अपनी उंगलियों से भींचे रहे। सोचिए तो क्या हम यही चाहते थे कि कोई हमें बेबस कर दे। अपनी बांहों में भर कर चकनाचूर कर दे। ख्याल जो हल्दी की गांठ की तरह मेरी जड़ में है उसे सिलबट्टे पर रख कर पीस दे। कि जैसे श्लोक झरते हैं  विद्वान के मुंह से। कि जैसे कोई तुतलाता हुआ बच्चा अपने पूरे नाम को दोहराता है कोई हमें भी वैसे ही घोर कर पी जाए। एक ज़रा अपनी साड़ी उठाए और हमें अपने जांघों पर रख मरोड़ कर डिबिए की बाती बना दे। उसे हटाने और आनंद लेने के बीच मेरा मन। ताकत नहीं जिस्म में कि इंकार कर सकूं। इच्छा नहीं ऐसे समय में ऐसा महसूस हो। तो अंदर के सूनेपन को हम कई बार बाहर से भर लेते हैं।

मन जो हुलस कर ज्वार की तरह उठता है और नाउम्मीद होकर भाटे की तरह गिरता है। शरीर जो चाहता है कि कोई शेरनी आए और हमें अपने दांतों में पकड़ किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़ आए। तो ऐसी तो कोई जगह नहीं। हमें शेरनी नहीं बिल्लियों से प्यार होता रहा। मगर ऐसा क्यों होता है बाबू कि प्यार उसी से होता है जो दिल पर चोट लगाता रहता है। हमारे दिल पर अपने पंजों के निशान छोड़ जाता है।

वो ऐसी थी कि उसने होश में कभी संसर्ग नहीं जाना था। मैं ऐसा हूं कि अपने होश उस पल के लिए बचाकर रखता कि मेरी बांहों में पागल होने पर वो कैसी दिखती है। मैं अपनी होश खोने का नाटक कर उसे बेहोश करता और होशमंद बना रहता। क्या मैं कोई नाटककार हूं जिसमें कई चरित्र हैं फिर भी मेरी नज़र में सब सफेद हैं? उसका एक किरदार था फिर भी उसने कई रंग दिखाए।

डायरी - अंश

3 comments:

  1. रंगों में रंगी किरदारों की लंबी श्रंखला, सुन्दर चित्रण

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  2. अंतरजाल की आवारगर्दी के दौरान एक्सीडेंटली आपके ब्लॉग से मुठभेड़ हुई,शब्द चित्र दिलचस्प जान पड़े तो कई पोस्ट खंगाल डाले...ये तो नहीं कहूंगा कि मैं उनसे बेतरह प्रभावित हुआ हूं..इतना ज़रूर है उनमें निहित सृजनात्मत्मक स्पंदन ने दिल के दरवाजे पर दस्तक दी है..आजकल किसी लिखे हुए को पढ़ते हुए ऐसा कम ही होता है। आपकी लेखनी से ऐसा लगा कि हद दर्जे की जटिलता और बेतरतीबी के कायल हैं आप...अगर ये अनायास होता है तब तो बहुत अच्छा है लेकिन बौद्धिकता के बियाबान में इस क़दर भटक गए हैं कि यथार्थ का नखलिस्तान मिल नहीं पा रहा तो साहब....ये शाब्दिक वाग्जाल थोथा और निरर्थक ही कहा जाएगा...

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