Friday, December 7, 2012

जलावतन


कमरे में कोई भी नहीं था। सो कान की तट से समंदर का शोर उठता है। यही अकेलापन मूर्त रूप में बाहर भी था और इसी के बायस तनहाई का आलम अंदर और भी ज्यादा लगता था। गलत कहते हैं लोग कि हम लिखने वालों के लिए कल्पनाशीलता सबसे जरूरी है कि अंधे भी हों तो कल्पना के आधार पर बाकी सब कुछ देखा अनदेखा साकार कर लेगें। जबकि हकीकत यह है कि हमारे लिए आंखें अंधों के बनिस्पत ज्यादा जरूरी है। हम दृश्यों के भूखे। जन्मजात जिद्दी और लतखोर। उंगली करने में माहिर। आप दीवार में कोई बिल दिखा कर कह दीजिए कि इसमें सांप रहता है, लेकिन हमारी जिज्ञासा हो जाएगी कि हम उसमें हाथ थोड़ा आजमा लेते हैं। तो डरते भी जाएंगे और उसमें उंगली भी डालते जाएंगे। सांप से डंसवा कर रोएंगे भी रोना बिलखना भी होगा, कलेजा पीट पीट कर अपने को कोसेगें भी। मगर दिल में कहीं यह ख्याल भी जरूर रहेगा कि ये भी जरूरी ही था, चलो हो गया। उतना बुरा भी नहीं डंसा। पिछली बार वाले हादसे से कम है कि दोनों बार बच ही गए। हमें अंदर से पता होता है कि बाकी चाहे जो हो जाए, अभी हम इस दुनिया से जाने वाले नहीं हैं। बहुत कुछ देख लेते हैं तब कहीं जाकर हमारी कल्पनाशीलता जागती है और उनमें थोड़ी सी सच्चाई मिलाकर उसे लिखते हैं। हम नहीं देखेंगे तो हमारा दिमाग भी अंधा होगा। लिख तो खैर तब भी लेंगे लेकिन विविधता आने के लिए देखना बहुत जरूरी है। देखना और वो भी भूखी आंखों से। आंखों को जीभ बना कर उसके सारे रंध्रों को जगाकर रखना पड़ता है। कई बार लगता है कि क्रांतिकारी अगर सियासी मुजरिम होते हैं तो हम रचनात्मक मुजरिम होते हैं। हमें रोज़ का कम से कम चार अखबार, एक सिनेमा, उपन्यास का कुछेक अंश, कुछ बेहद सुंदर कविताएं तो चाहिए ही। हमारा दिमाग यहीं के बाद शुरू होता है। अपवाद छोड़ दें तो कई बार इसका ठीक उल्टा होता है। ये जो इतना बिम्ब मिलता है हमारे लिखे को पढ़ने में वो देखने से ही तो उपजता है। सूरदार होते होंगे मगर कितने कि सिर्फ वात्सल्य को अपनाकर कविता की ? दिल के मासूमियत को समझा। 
 
तो असल बात शुरू होती है कमरे में किसी अन्य के न होने से। और इससे उपजने वाले घनघोर अकेलेपन से। हम कुछ घोषित पाप और निर्देश फिर भी बचा कर रख लेते हैं कि जीवन के किसी पल उसके बारे में सोच लेना एक खास तरह का सुकून देता है। कई बार वो बातें जो इस कदर जल्दबाज़ी में घट जाती हैं कि हम उस पर समय नहीं दे पाते, सो उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं, मगर पूरी तरह नहीं। हम उसे मन में बुकमार्क कर लेते हैं। फिर किसी उबाऊ दोपहर में किसी गाय, भैंस या बकरी की तरह पार्क में जाकर, गीले, ठंडे, गहरे कीचड़ पैठ कर, उन जल्दबाजी में आंख से खाए गए दृश्यों, कान से सुने गए बातों को पहले चुभलाते हुए निकालते हैं और फिर उसकी जुगाली करते हैं। इसकी जुगाली हमें कई बार आनंद देती है क्योंकि वो गै़र कभी हमारा माज़ी रहा है। हम अपने हिसाब से उन लिखी जा चुकी पटकथा और मंचित किए जा चुके नाटक में कुछ फेर बदल भी कर लेते हैं।
 
बाइस साल की लड़की सर्दी की किसी इतवार को चावल खा कर हल्की सिहरन लिए छत पर आती है अपने होठों पर वेसलीन लगाने के दौरान उसे बरबस बीते बुध को हिन्दी के प्रोफेसर का आत्मीय स्पर्श याद आ जाता है। रात को डायरी लिखते समय सत्रह साला किशोरी को उसके हैंडसम कमउम्र मैथ्स टीचर का तुम्हारा अब तक कोई राजकुमार है कि नहीं याद आ जाता है जिसमें वह यह जोड़ लेती है कि वह मेरा वह राजकुमार यह मैथ्स टीचर ही तो है।

कोई तलाकशुदा औरत बारिश के दिनों में गुमसाए हुए चाौकी पर के बिछे गद्दे की सिलाई को पकड़ अपने अतीत के उन पन्नों को खोलती जाती है जो उसके लिए बेइंतहा तकलीफ का बायस है। अगर वो वाकया नहीं हुआ होता, अगर मैं ही थोड़ी सहनशील हो गई होती, अगर उस दिन वो ही चुप रह गया होता तो.... की अंतहीन घटनाएं। ऐसे में उसे खुद भी पता नहीं चलता कि कब उसने पूरे बिस्तर की सिलाई अपने नाखूनों से उधेड़ दी। 
जि़ंदगी चुनौती। रोज़ एक कोहसार की मानिंद। रोज़ सुरसा की तरह मुंह बाए अवरोधक। बहुत कोशिश भी करें तो कहां भूल पाते हैं कि हमारी चाभी उसकी हेयरपिन थी। वो उससे कपपटी पर ऐसा खेलती कि बाकी काम परे हो जाते। कहां भूल पाते हैं कि उस लड़की को होंठ चूमना आता था। जाने किस अदा से चूमती थी मेरे बालाई होंठ को कि मेरी सारी शर्तें चकनाचूर हो जाती थी। किस कदर की उष्मा थी उसके बदन में कि मुझ जैसे गीले जलावन को अपने धौंकनी में सांस भर भर कर चिलम की तरह सुलगा देती थी। वरना मैं तो ऐसा जरना हूं जो जलता तो नहीं अलबत्ता धुंआ ज्यादा देकर लोगों के आंखों में आंसू ज्यादा लाता हूं।
 
और उधर कहां भूल पाती है वो औरत भी जिसे यू ंतो जिंदगी में सब कुछ मिला है इसके बाद भी जब गाउन उतार कर बाथरूम जाती है, शैम्पू के अपने बाल धोती है और कंडीशनर का ढ़क्कन खोलते वक्त ज़हन रिबर्व करता है कि ‘तुम्हारा वजूद कंडीशनर सा महकता है’ किसने कहा था? किसने कहा था यह जो आज भी ताज़ा लगता है। हमारे अंदर कौन और कौन कौन रहता है? पति ने तो नहीं कही थी ऐसी बातें कभी। कुछ अंतरंग कमेंट्स जो कभी किसी सड़कछाप आवारे ने छेड़ते हुए कही, कैसे मालूम उसे हमारे बारे में ऐसा! जो कि सचमुच ही है मेरे अंदर! बाथरूम के आदमकद आईने में ही अपने भरे पूरे बदन को निहारती है और खुद ही रीझती है फिर कहां से आवाज़ आती है - मोरा जीनगी अकारथ राजा। कौन गाता है यह विरह गीत जो कई बार सामूहिम स्वर में उभरता है। 
 
आखिर कितने पाटों में बंटते और पिसते हैं हम? पति ने जो सब कुछ दिया जनून भरा प्यार न दे पाया। आशिक ने जो प्यार दिया अधिकार न दे पाया। पति है तो आशिक नहीं भूलता। सब कहते हैं तो काहे बहस करना। होगा गलत पर मन क्यों नहीं मानता?
 
सैंया जियरा दरद कोई न जाने 
उठे हिलोर मोर दिल मा बवंडर मचावे
बोझा बोझा लोर गिराउं हर रिस्ते में 
कोसे कहूं कि कोई न पतियावे।

तो क्या करता है मन ऐसी हालत में ? रूमाल पर उसका नाम काढ़ कर देख लिया, कागज़ पर उसका हजार बार उसका नाम लिख लिया, उसके मज़ाक में कहे बात को सच मान चोली में उसकी तस्वीर डाल कर सो गई। सोलह सोमवारी का व्रत भी रख लिया। सुकून मिला मगर समस्या जड़मूल खत्म न हुई। हर मोर्चे पर हर सलाह को मान लिया।
 
आज क्या किया ?
 
इस दोपहर तुम्हारा नाम ही पच्चीस तीस बार उचार लिया। चार बार के बाद आराम मिलने लगा। लगा कोई सूफी संत हो गया बदन। सच्चा, खरा सोना मन। आंख से झर झर झरने लगे आंसू। अंदर जाने कैसी पहाड़ जैसी उलझन थी, तुम्हारा नाम उचारते गई और पहाड़ बुरादे की धूस बन उड़ता गया। इस अकेले में तुम्हारा नाम लेना कितना कितना नया था जैसे पहला परिचय हो और पानी की घूंट की तरह वह आंतों में उतर गया। 
 
इस कदर पा लिया तुमको कि यह संतोष हो गया कि तुम्हें हमेशा के लिए त्याग दिया। 

3 comments:

  1. होने में खोने का भय,
    स्वप्न में होने की लय।

    ReplyDelete
  2. दुनिया के लोगों की खाल के भीतर घुस कर लिखने का हुनर ...

    ReplyDelete

Post a 'Comment'

Friends

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...