Monday, April 1, 2013

चार शब्द



"मैं मर रहा हूं। और मरने से पहले मुझे किसी का इंतज़ार है।" चेहरे पर शेविंग क्रीम लगाए हुए स्टील वाली रेज़र को भिगोते हुए उसने कहा।
उसकी पलकें झपकी हुई थी। लगता था जैसे उसके और उसकी नींद के बीच कोई है जो दीवार बन कर खड़ी हो गई है। इधर कुछ दिनों से वह बात करते करते या यूं ही चुपचाप रहते हुए वह अनाचक से कह उठता - 'तुम्हें कुछ सुनाई दे रहा है?'
'क्या' - मैं बीड़ी के होंठ को माचिस छुआते हुए उससे पूछता।
"यही.... खट खट की आवाज़..... लगता है जैसे ज़मीन के नीचे खुदाई चल रही हो.... या फिर यहीं मेरे पैर के नीचे ही किसी झरने का पत्थर पर लगातार गिरने का शोर..... "
मैं कहता ‘नहीं’ तब वह चुप हो जाता।
मुझे लगता है वो अब तुमसे कोई कान्टेक्ट नहीं रखना चाहती। आईने में ही उसके चेहरे को एक टुक नज़र डालते हुए मैंने लापरवाही से कहा।
यह सुनकर वह पलटा। उसके रूम पर आने के करीब चालीस मिनट बाद हमारी नज़रें आपस में टकराई। मैंने उसका चेहरा गौर से देखा, खिचड़ी दाढ़ी पर यहां वहां झाग लगे चेहरे में वह ईश्वर सरीखा महसूस हुआ। तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि वह सचमुच मर रहा है।
कोई जब भी मुझे इस तरह घूर कर देखता है तो मैं असहज हो उठता हूं। बॉडी लैंग्वेज की क्लास में आंख मिलाकर बात करना आत्मविश्वास की निशानी जरूर होगी लेकिन मैंने सहज बातचीत हमेशा ही आंख चुराकर की है। आंख मिलाने से आप उस व्यक्ति की छाया के प्रति काॅन्शयस हो जाते हो। इसके उलट रिश्ते में मर्यादा न टूटने और बुरा लगने की फिक्र से आज़ाद हो जाते हो।
उसने मुझे घूर कर देखा। मेरी नज़र उससे मिली नहीं लेकिन मैग्ज़ीन के पन्ने पटलते हुए मुझे उसका घूरना चुभा। अक्सर हमारी चार आंखें होती हैं कि मेज़ पर के ग्लास को देखते हुए दरवाज़ों के नीचे से दुबककर निकलते चूहे भी हमें दिख जाते हैं। आंखों की परिधि अगर ऐसा करती है तो हमारा मन भी करता है। एक ही वक्त पर कई दृश्य और संवाद भी दृश्य और अदृश्य समानांतर ट्रैक पर चलते हैं।
बहरहाल मैंने अपनी लापरवाही बनाए रखी और पूछा -घूर क्यों रहे हो ?
'न....घूर नहीं, सोच रहा हूं।'
'क्या?' - मैंने अपना सिर उठाया और अपनी परछाई पर उसकी झुकी हुई काया को महसूस करते हुए कहा।
अक्सर लापरवाही में ही लोग बहुत बड़ी बड़ी सच्चाई लोग कह जाते हैं।
यह पहली बार था जब मैंने उसे गौर से देखा। वो सचमुच मर रहा है और मैं यह बात किसी को बता नहीं सकता क्योंकि वह अभी जीवित है। यह बड़ा बारीक सा फर्क है। अखबार में आई किसी दुर्घटना के समाचार की तरह जिसमें कई बार मौत की खबर के लगभग आसपास ही होती है गंभीर रूप से घायल होने वाले लोगों का हाल। मगर उनकी हालत हमें मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की संख्या उतनी नहीं चैंकाती।
वो एक गंभीर अकेलेपन से गुज़र रहा है। मैंने अपनी जिं़दगी में कई लोगों को बहुत करीब से मरते देखा है। मुझे लगा कल को अगर यह ज़मीन पर गिर भी जाता तो इसकी उजली देह एक धुंआ उठाती घाटी में तब्दील हो जाएगी।  और जो चुप मेरे अंदर इतना बलवती होकर बोलता है वो तब क्या कुछ कहा करेगा।

मैं
मर
रहा
हूं.

जैसे मुझे तुमसे प्यार है।

हो चार शब्द रहे हैं। और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं।

2 comments:

  1. हमेशा की तरह संवदेनशील और प्रभावी

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