Monday, May 27, 2013

इतवार की शाम और महबूबा के बेवफाई के किस्से


ज़रा ज़रा बीयर की आठ घूंट, ज़रा ज़रा प्याज़ की मोटे मोटे कतरनों के साथ किरचे लंबे लाल मिर्च वाले अचार का मसाला। ज़हर को बुझाने के लिए एक ज़हर। इतवार की शाम, थोड़ी से महबूबा के बेवफाई के किस्से और ज़रा ज़रा घर की याद। एक झटके से सिहरना, बौखलाना, आवेग में थोड़ा उंचा बोलना और नुसरत की गाई हर लाइन पर दिल से दाद देना।

और तब वह कहती है - वो मुझे बहुत प्यार करता है। मुझे पीछे से अपनी बांहों में भर कर मेरी कान के लौ चूमता हुआ हौले से आई लव यू फुसफुसाता है। अपने जीभ को नुकीला बना मेरे गालों पर के गड्डे खोजता है। वह जब मुझे अपनी बांहों में कर तोड़ता है और हौले हौले मेरी बदन को सिलाई मशीन बना अपनी दांतो से टांकता है, जिस्म में उधड़ आई सीवन के धागे यहां वहां से खोजकर अपनी दांतों से तोड़ता है तो मैं हर लहरों पर राफ्टिंग  वाली खाली बोट बन पलटती जाती हूं।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि जब मेरे पपीते जैसे स्तनों को अपने गर्म हथेलियों में थामता है तो उसके हथेलियों के रेशे रेशे को मेरा ज़ोर ज़ोर से धड़कता सीना महसूस करता है। मैं सिकुड़ कर कोई और फल बन जाती हूं। ऐसे वक्त में अक्सर मेरे पैरों के अंगूठे और उंगलियां भींच जाती हैं। वह पल भर को रूक उन उंगलियों को तोड़ता है। वह मेरे रग रग से वाकिफ है। वह मेरी नस नस का जायका जानता है। मुझे यही चाहिए था। वह फिजा में मेरी देह गंध पहचान लेता है।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि मैं अपना बदन चुराती हूं, वह मुझे खोज खोज कर खोलता है। अक्सर वो रात भर टूट कर प्यार करने के बाद अलसुब्ह घास की नोक पर ठहरी ओस की बूंद को मेरे उरोजों के तख्त पर लाकर रख देता है। कहता है इस तख्ते ताउस पर यह मोती थरथराता है।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि बिस्तर जिंदगी लगने लगती है। मुझे यहां वहां से तोड़ता मरोड़ता है और कुछ भी करने से पहले जब वो मुझे यह बताता है कि वह क्या कुछ करने का इरादा रखता है तो मैं दिल ही दिल में आमीन कहती हूं। कई बार तो जब वह यह सब बता रहा होता है तो पड़ोस वाली मस्जिद से अजान की आवाज़ आती है और मैं यकायक बुत बन जाती हूं, वो अपनी रौ में बोलता जाता है मैं उसके मुहब्बत के सजदे में झुकी आमीन कही जाती हूं। उस वक्त मेरी आंखें नीम नींद में अलसाई हुई, आधे नशे में गोल गोल हो उपर घूमती हैं। गुमां होता है किसी पीर ने मेरे माथे को ठोंका है। मैं अलमस्त हुई जाती हूं।

वो मुझे इतना प्यार करता है कि मैं अपनी देह से आज़ाद हुई जाती हूं। 37-28-36 की आंकड़े वाला मेरा यह बदन किसी भीगी तितली के मानिंद हल्की होकर बगिया में उड़ी जाती है। उसे मुझे बरतना आता है सखी। रात के जाते पहर वो बला कर जादूगर हो जाता है और मुझे कंधे, गर्दन और पीठ से चूमकर वह यह बतलाता जाता है कि मैं उसी की हूं। उसके प्यार करने में मैंने खुद को खोजा है।

वह मुझे चूम चूम कर छोड़ता है, मैं चुगी जाने के लिए तड़फती रहती हूं।

और जब वह अपने बदन का तार तार ढ़ीला कर मुझ पर झुका बेतरह हांफ रहा होता है, जब देर सुबह उसका बदन कई सालों के गैप के बाद अचानक जिम ज्वाइन किए हुए जैसा ऐंठता हैं, मैं खोखली रात भर की जागी हुई खोखली जांघें, फास्फोरस और कैल्शियम विहीन घुटने लिए दोनों पैर भींच कर सोती हूं दरअसल तब मैं जीती जाती हूं, वो हारा जाता है।

ज़रा ज़रा बीयर की आठ छटांक, ज़रा ज़रा प्याज़ की मोटे मोटे कतरनों के साथ किरचे लंबे लाल मिर्च वाले अचार के मसाले। इतवार की शाम और थोड़ी सी महबूबा के बेवफाई के किस्से। कई साल से आगे के सारे साल तक।

उसकी याद घर की याद है।

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