Wednesday, May 29, 2013

याद बरक्स हिंदी फ़िल्मी गीत

सुब्ह से एआईआर की उर्दू सर्विस सुन रहा हूं। इतने अच्छे अच्छे फिल्मी गीत आ रहे हैं कि काम करते करते उंगलियां कई बार ठिठक जाती हैं और उन गीतों के बोलों में खो जाता हूं। गज़लें कई बार दिमाग स्लो कर देती हैं और एक उदास सा नज़रिया डेवलप कर देती हैं। कभी कभी इतनी भारी भरकम समझदारी का लबादा उतार कर एकदम सिंपल हो जाने का मन होता है। रेट्रो गाने सुनना, राम लक्ष्मण का संगीत ‘उनसे कहना जब से गए हैं, मैं तो अधूरी लगती हूं’ टिंग निंग निंग निंग। इन होंठों पे प्यास लगी है न रोती न हंसती हूं। लता ताई जब गाती हैं तो लगता है, मीडियम यही है। इन गानों में मास अपील है। सीधा, सरल, अच्छी तुकबंदी, फिल्मी सुर, लय और ताल जो आशिक भी गाएगा और उनको डांटने वाले उनके अम्मी-अब्बू भी। समीर के गीत गुमटी पर के पान के दुकान पर खूब बजे। ट्रक ड्राईवरों ने अल्ताफ राज़ा को स्टार बना दिया। और कई महीनों बाद जब इन गानों पर हमारे कान जाते हैं तो लगता है जैसे दादरा, ठुमरी, धु्रपद और ख्याल का बोझ हमारा दिल उठा नहीं सकेगा। हम आम ही हैं खास बनना एक किस्म की नामालूम कैसी मजबूरी है। हांलांकि यह भी सच है कि देर सवेर अब मुझे इन्हीं चीज़ों तक लौटना होता है, नींद इसी से आती है और सुकून भी आखिरकार यही देते हैं।

शकील बदायूंनी साहब ने वैसे एक से एक कातिल गीत लिखें हैं। याद में तेरी जाग जाग के हम रात भर करवटें बदलते हैं। रफी के गाए गीत तो लगता है सारे क्लासिक लगते हैं। उन्होंने 98 प्रतिशत अपने लिए सटीक गीत चुने और 99 प्रतिशत अच्छे गीत गाए हैं। ‘लचकाई शाखे बदन, छलकाए ज़ाम। वो जब याद आए बहुत याद आए का एक पैरा ‘कई बार यूं भी धोखा हुआ है वो आ रहे हैं नज़रे उठाए’ प्यार की सुकोमल एहसास में से एक है। वहीं लता का गाया ‘खाई है रे हमने कसम संग रहने की’ का एक मिसरा प्रेम को बड़े ही अच्छे शब्दों में अभिव्यक्त करता है। -ऐसे तो नहीं उसके रंग में रंगी मैं, पिया अंग लग लग के भई सांवली मैं। ये सोच कमाल है जो अंदर तक गुदगाते हुए सिहरा से देते हैं।

उदास गीतों में थोड़ी सी बेवफाई टायटल गीत का वह लाइन ‘जो रात हमने बिताई मर के वो रात तुमने गुज़ारी होती या फिर आगे की पंक्तियों में ‘उन्हें ये जि़द के हम पुकारें, हमें ये उम्मीद वो बुलाएं, है नाम होठों पे अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गई दरारें’ मुहब्ब्त के कशमकश को शानदार तरीके से व्यक्त करता है।
कुमार सानू की मंथर तालाब में फेंके गए सीधी लाइन में गाया ‘मेरे दिल भी कितना पागल है’ इतना एक रेखीय लय में लगता है। इसके अलावा सत्रह साला ईश्क तब फिर से जिगर चाक करता है जब उन्हीं की आवाज़ में ‘दिल तो ये चाहे पहलू में तेरे बस यूं ही बैठे रहें हम’ सुनते हैं।

ये यादें मेरी जान ले लेगी। पटना के सदाकत आश्रम में लगे सरसों के फूल याद आने लगते हैं। और त्रिकोणमिति बनाते हुए अक्सर किसी सुंदर, मीठे गीत को सुनते हुए सोचता कि इसे कैसे फिल्माया गया होगा। दरअसल रेडियो यही है, दृश्य को होते हुए कान से देखना। शराबी अमिताभ के जन्मदिन पर किशोर के गा चुकने के बाद नायिका का कहना कि ‘ओ मेरे सजना लो मैं आ गई’ गाते ही म्यूजिक का तेज़ गति से भागना बंद आंखों से सोचा था तो लगा कि लंबे लंबे पेड़ों के जंगलों में यहां दोनों एक दूसरे को खोजते हुए भाग रहे होंगे। मन के सिनेमा में समानांतर ट्रैक पर हमेशा एक और सिनेमा चल रहा होता है।

पुराने गानों को देखते हुए खास कर 80 के दशक के गीत को देखते हुए ये साफ साफ लगता है कि "बहुत सारे अच्छे गानों को पिक्चाईजेशन बुरा है।"

तुम्हें भी ऐसे ही सोचता रहता हूं जानम। नवंबर की धूप में दिन भर पीठ सेंकते हुए। जाती मई में पसीने पोंछते हुए। देर तक रोटी चबाते हुए कि जब उसका स्वाद मीठा हो आता है, कई बार निवाला मुंह में है यह भूल जाता हूं।
इसी क्रम में तीसरी कसम में शैलेंद्र का लिखा और मुकेश की गाई गीत के बीच रूक कर जब राजकपूर अपनी मासूम आवाज़ में कहते हैं- ‘‘मन तो जानती हैं न आप!’’ तो यह भी याद रह जाता है।

एक पैरलल आवाज़ यहां भी सुनिए कि कैसे आंख और मन के सिनेमा में एक ही वक्त दो दो सिनेमा चलते हैं।

3 comments:

  1. @ Richa Gupta : Embed MP3 ka thank you.

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  2. thank you. Tho sagar sahab ko angrezi aa he gai..

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  3. thank you. Tho sagar sahab ko angrezi aa he gai..

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