Monday, August 5, 2013

A thousand things to forget....


जनाब एक मिनट अपना कीमती समय दीजिए। रूकिए एक मिनट! आपने अपने व्यवहार से तो अपनी बात कह दी। मैं ज़रा अपने मुंह से अपनी बात कहना चाहूंगा। मैं जानता हूं कि मुझे इसके लिए आपके अनुमति की जरूरत नहीं है। क्योंकि अगर आप नहीं सुनेंगे तो भी मैं अपनी बात कहूंगा। किसी से भी कह लूंगा। रसोई की दीवार से, अरूणेश के छज्जे से, कमरे के बाहर लटकती टाट के परदे से और गर महसूस हुआ कि गुसलखाने का सड़ रहा पयताना ही यदि मेरी बात सुनने में इच्छुक है तो मैं उससे ही कह लूंगा।

मैं जानता हूं कि मेरी बातों से धुंआ नहीं उठता। यह एक ठंडी बुझी चुकी राख की मानिंद है जिसमें अब कोई चिंगारी नहीं। आप धीरज रखें मैं आपको यह आश्वस्त करना चाहता हूं कि यह कोई बवेला नहीं मचाएगी। मैं जानता हूं कि आपकी जिंदगी फेसबुक की तरह है जहां फलाने कहे को भी लाइक करना और चिलाने के उद्गार पर भी कमेंट करना है। क्षणभर में कहीं प्रशंसा भी करनी और तत्क्षण ही किसी दूसरे स्टेटस पर अफसोसजनक भी लिखना है और बढ़ जाना है।

अपनी रीत और बीच चुके जीवन के आधार पर मैं यह चाहूंगा कि मेरा कहा आपका मनोरंजन नहीं करे। क्योंकि मैंने पाया है कि मैं मनोरंजन दे सकने के लायक ही नहीं हूं। मैंने बड़ी कठिनाई अपनी दुम का दबाया है साहब। रोज़ मुझे सिर्फ अपनी जगह खड़े हो जाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी है। आलम यह है कि अब मैं आगे बढ़ जाने के सपने नहीं देखता। आप देख सकते हैं (जिसके लिए आपकी पारखी नज़र को चंद सेकेंड की जरूरत होगी) कि मैं एक बेहद आम आदमी हूं। भिखमंगे खानदान में लावारिस की तरह पला बढ़ा। आपको आपके मां बाप पालते होंगे मुझे तो पेड़ों, आसमानों, हवाओं और पानी से मिलकर पाला है।

मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि एक वक्त था जब मैंने भूख पर विजय प्राप्त कर ली थी। मेरे और भूख में कोई मसले नहीं बचे थे। मैं दिन रात सीधा सीधा उससे मुठभेड़ करता था। मैं किसी बाउंड्री पर उसकी छड़ पकड़ कर रातों को सोता और जागता था। जब नींद आ ही जाती तो छड़ से हाथ न छूट जाए इसलिए अपनी कोहनी और अपना घुटना उसमें फंसा देता। हर जगह मैंने जुगाड़ तलाशे हैं। आप न जाने क्यों पहाड़ों पर के बाबाओं की इज्जत सिर्फ इसलिए करते हैं जिन्होंने तपस्या से भूख पर जीत पाई है।

लेकिन आज समय दूसरा है। सो मैं भी दूसरा हूं। बड़ी साधारण सी पंक्ति है लेकिन फिर भी इसे लिखते हुए अथाह पीड़ा महसूस कर रहा हूं कि अब मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती। आपको किसी भी प्रकार से इस पंक्ति में कोई चमत्कार नहीं लग रहा होगा लेकिन आप ज़रा अपना बहुत सारा ज्ञान, संगीत की कतरनें, दृश्य-श्रव्य माध्यमों से अर्जित अनुभूतियां, किताबों के शब्द थोड़ी देर के लिए अपने सिलबट्टे जैसी पीठ पर से उतार दें। माफ करें मैंने थोड़ी अनैतिकतावश आपकी नंगी पीठ देख ली है और पाया कि उस पर अब किसी ऐसे आदमी की जरूरत है जो छेनी से आपकी पीठ तो हरा, ताज़ा कर दे।

नहीं मैंने कतई नहीं पी है। अच्छा चलिए, पी है। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? आप पीते किस तरह से हैं? मुआफ कीजिए, मैं एक जगह बैठकर सुरूर लेने वाला आदमी नहीं हूं। कल इतवार था और मैंने सुबह से ही पीनी शुरू कर दी। मैं टेबल पर आर एस की बोतल रखकर उसे ग्लास में ढ़ालता गया और काम करता रहा। मैंने किचेन के बर्तन धोए, बीच बीच में खुमारी चढ़ती तो अनजाने में ही वहीं बैठ जाता

क्या आप खुद को कभी भूलते हैं?

भूलते होंगे। जरूर भूलते होंगे। मेरे अपने आपको भूलने की दर बहुत ज्यादा है। कल से चैबीस घंटे में से साढ़े इक्कीस घंटे मैं अपने आप को भूला रहा हूं। दिन भर टूट टूट कर कमरे का सारा काम करने के बाद मैं शाम को दो पैग लगाने के बाद नहाने चला गया। क्या आपने कभी बहुत सारा पी कर नहाया है? भूलवश मैं बाथरूम का दरवाज़ा लगाना भूल गया। फर्श पर साबुन का झाग लगाकर बैठा तो भूल गया कि मैं क्या करने यहां क्या करने आया था। कई बार ऐसा भी हुआ कि नहाते नहाते पानी भरा मग उठाया और पानी डालना भूल गया। एक चेतना थी जो दरवाज़े के बाहर की दुनिया का आभास कराती थी। कमरे के अंदर एकांत में और दुनिया की पैन करती आंखों के कैमरे के आगे में हम सिर्फ ह और म नहीं रहते। बीच की भूली हुई वर्णमाला भी इनमें आ जाती है।

कुछ बासी सा लार था जो मुंह में जिह्वा और चिकने विशाल छत के बीच था। अटपटाई सी ज़बान थी। अव्वल तो कुछ कहता नहीं। कुछ कहता तो उसे बार बार दोहराता जाता। हंसता तो लगातार हंसता जाता। ऐसे ही हालत मैंने संभोग भी की, जहां कुछ शुरूआत करता और फिर राह में ही भूल भी जाता। साथ वाली पे्रमिका का भी धैर्य चुकता गया जब उसने पाया कि मैं यहां बिस्तर पर अपने तलवे रगड़ रही हूं और वो मेरे बदन की थाह लेने के बजाए कपड़े ही टटोले जा रहा है।

आप सुनने वालों में से कई लोग जा चुके हैं। उन्हें अपना कोई काम याद आ गया होगा। हां तो मैं आपसे क्या कह रहा था..... हां आम आदमी। दोस्तों यह व्यवस्था का ही दोष है जब हर शब्द राजनीति से जुड़ जाता है। यह मज़े की बात है जो आपको सुनने में लगेगी कि जब मैं होश में होता हूं तो हमेशा आपको अपना परिचय देने में डरा हुआ रहता हूं। मुझे हमेशा अंदर से यह खदशा लगा रहता है कि कोई मुझे खुश और हंसता देख ले तो कहीं कोई मुझसे किसी तरह की मदद न मांग बैठे। अपने सहकर्मियों के संग पार्टियों में भी मुझे डर सताता है कि कोई मेरे घर पर पार्टी आयोजित करने का प्रस्ताव न रख दे। मैं अपनी प्रेमिका के घर से भी किसी नौजवान को अपने यहां इसलिए नहीं आने देता चाहता कि कहीं वो मुझसे कोई नौकरी दिलवा देने का आग्रह न कर बैठे। (और जब भी किसी ने ऐसा किया है मैंने हमेशा के लिए उससे कन्नी काट ली है) मुझे अपनी पसंद तक छुपा कर रखनी पड़ती है, वे समझते नहीं कि इस रूप को बचाए रखने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

मैं आपको जितना स्वस्थ, हंसमुख, चुलबुला और परिपक्व दिखता हूं उससे कहीं ज्यादा बीमारियां पाले बैठा हूं। हा हा हा हा हा हा।

दरअस्ल सुनने की चीज़ यही है। आप मेरी हंसी में मेरी ग्लानि, प्रशंसा में ईष्र्या, नारी सम्मान में उससे एक विशेष काम वासना सुन सकते हैं। और तो और मैंने कई चीज़ें बुरी बता कर सिर्फ इसलिए छोड़ी हैं क्योंकि वो मुझसे निभ ही नहीं सकती थी।

हां तो प्रिय मित्रों, ज़रा मुझे याद दिलाएंगे कि मैं क्या कह रहा था........

5 comments:

  1. शीर्षक याद करता रहा कि क्या सोचा था। मगर मिस पी की भूलने से जुड़ी पंक्ति याद आई।
    क्या आप मुझे शुक्रिया कहने का तरीका याद दिलाएंगे?

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    Replies
    1. शुक्रिया. लिखा कीजिये. अक्सर.

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  2. "कमरे के अंदर एकांत में और दुनिया की पैन करती आंखों के कैमरे के आगे में हम सिर्फ ह और म नहीं रहते। बीच की भूली हुई वर्णमाला भी इनमें आ जाती है।"

    Deep Truth!

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  3. Is naye wallpaper me muh khole "sagar" leta hai kya??
    kesho se behti choti choti nadiyon k jal ko apne me samata hua??

    KYUN SAGAR HE HAI NA??
    KYUN SAGAR HE HAI NA??
    KYUN SAGAR HE HAI NA??..

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  4. क्या आपने कभी बहुत सारा पी कर नहाया है

    haan!!!

    mazaa ata hai..

    Post bahut badhiya lagi Sagar Saheb!!

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