Friday, August 30, 2013

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उसके होने का गंध उसके नाभि से फूटती है लेकिन शब्द कहां से फूटते हैं? यूं ही विशाल पुस्तक मेले में अनजाने से बुक स्टाल पर बाएं से आठवीं शेल्फ में अमुक किताब का होना कि जहां दुकानदार भी नहीं उम्मीद करता हो कि पाठक यहां देखेगा सो वहां किताबों का सा भ्रम देता कुछ भी रख दो। 

स्टाल पर कोने में ग्रे कालीन पर उन शब्दों से गुज़रते हुए जाने क्यों लगता रहा कि उसके लिखे जाने से पहले वे शब्द हमारे ज़हन में महफूज थे और किसी ने सेंध मार कर यह निकाली है। पढ़ना कई बार वही सुहाता जो हम पहले से जान रहे होते हैं।

यह सोचना भी बहुत सुखद लगता कि हमारे शब्द साझे हैं। दिमाग से सरसरा कर फिसलते हुए उनकी उंगलियों के बीच फंसे कलम से कैसे किसी काग़ज़ पर वे आकार लेते होंगे? क्या 'द' वैसा ही होता होगा जैसा उनके दिमाग में उपजा था, या कि उनकी उंगलियों ने उसे सफहे पर रोपते हुए कोई कलाकारी कर डाली थी। उनका लिखा 'ज' भी आह कितना आत्मीय! पहचाने से शब्द जिन्हें बीच के बरस में कहीं भूल आए थे और उस भूलने की याद भर आती रही। यों ही अनायास वो पढ़ना छोड़ उन उंगलियों का ख्याल करने लगता हूं जो सर्फ से धोए जाने के बाद हल्की हल्की रूखी लगती है। 

क्या उनका लिखना भी संगीत संयोजन के नियमों में बंधा है। क्या वे भी हर शब्द तीन ताल पर गिन कर, कभी कोई मीटर पकड़ कर लिखते हैं? 

अच्छा है कि कई सवालों के जवाब नहीं सो उनके व्यक्तित्व के प्रेम में पागल मुझ जैसी प्रेमिका रंगमंच पर गोल गोल बेसुध घूमती नज़र आती है।

अपार किताबों में भी वर्णमाला के खांचे में ही बंधी हर रचना मगर कैसे चीन्ह लेता है हमारा हृदय उन्हीं में से कुछ खास शब्दों को। क्यों लगता ऐसा कि वे जो अक्षर लिखते तो हमारे दिल पर नर्म नर्म रूई के फाहे गिरते। क्यों लगता ऐसा कि किसी कोई आदमी न सही तो राह चलते किसी जानवर के ही गले लगते फफक पड़ने की संतुष्टि मिलती? क्यों लगता ऐसा कि हमारे बीच की दूरी को भी हज़ार मील की दूरी और अनियमित कालखंड के फासले भी पट जाते? क्यों लगता ऐसा कि वे गर सामने ही होते तो अपनी धड़कन संयत कर उनकी हथेली बड़े इत्मीनान से अपने उभारों पर रख लेती ?

शब्दों की हल्की हल्की ऊष्मा, अक्षरों के आंच, वाक्यों में छुपी अदरकी स्वाद। मां ने जो कभी रूला रूला कर, गर्दन गिलास में गोत कर जबरन पिलाया, क्यों आज उसी का स्वाद जिह्वा पर छाया?

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