Saturday, August 31, 2013

नेकलाइन- एक

भीड़ में सहसा मुझे देख उसकी आंखें महकीं। चश्मा जोकि थोड़ा ढ़लक आया था सो उसने चार आंखों से मुझे देखा। मेरी निगाहें लगातार उस पर थी। नेकलाइन पर बल पड़े और वो आधी इंच नीचे धंस आई। चश्मे वालों के साथा थोड़ी दिक्कत ये होती है कि उसके शीशे पर अगर लाईट पड़ती है तो शीशे पर रोशनी की एक शतरंजी खाना नज़र आता है फिर एक पल को यह संदेह उपजता है कि उसने मुझे देखा या नहीं। और इसी दरम्यान अगर हम नहीं चाहते कि वो हमें देखे तो हम किसी दीवार के आड़े आ सकते हैं, नीचे झुक सकते हैं, पीछे मुड़ सकते हैं। 

आंखें किसी को कैसे चीन्हती है। पहले स्वाभाविता में नज़र पड़ती है फिर सहज ही गर्दन इधर उधर घूम जाती है लेकिन उस पहचाने की आंख हमारे स्मृतियों में सहसा धंस आती है और तंग करने लगती है। संबंधों में एक लाख शिकायत के बाद भी पहली प्रतिक्रिया मुस्कुराहट की ही होती है। वो स्केलेटर से चढ़ रही थी और मैंने सीढि़यां ली थी। ऊपर प्लेटफार्म पर हाॅर्न बजाती मेट्रो आने या जाने का संकेत दे रहा था। अमूमन सभी मानकर चलते हैं कि गाड़ी अब लगने वाली होगी, सो सबके कदमों की रफ्तार बढ़ जाती है। एक दूसरे को पहचानने की क्रिया को हमने भैंस को दिए गए रोटी की तरह निगल लिया गो कि मेट्रो में किसी स्टील राॅड को पकड़कर धीमे धीमे झूलते हुए अतीत में आए उस किरादार संबंधी याद की जुगाली करेंगे। 

मगर हुआ कुछ ऐसा कि हमने साथ ही गाड़ी ली। मैंने दूसरा डिब्बा लिया, उसने तीसरा। पहली कोच महिलाओं के लिए रिज्वर्ड है सो जो जल्दी में किसी और कोच में चढ़ते हैं वे गाड़ी चल पड़ने के बाद अंदर ही अंदर पहली कोच तक आती हैं। वो आ ही रही थी कि मैं दो कोच के भीतरी जंक्शन (क्योंकि वहां सबसे अच्छी हवा लगती है, रबड़ की सतह होती है) पर वही जुगाली कर रहा था कि उसकी आंखें फिर से मुझे खोजते हुए वहां से आगे बढ़ रही थी। मैंने छुपना चाहा। मगर एक सफल कोशिश के बाद दूसरे प्रयास में पकड़ा गया। पहचान की आंखें मकड़ी की तरह फंदा डालती हैं। रिश्तों की तरह उससे भी आज़ाद होने में समय लगता है। 

वो अब भी उतनी ही भरी पूरी थी। नहीं पहले से शायद कम हो गई थी। हाथ में वही पूरे हथेली को भरता सैमसंग गैलेक्सी चार है। हल्के आसमानी रंग की फिसलती शर्ट और काली जींस। उन दोनों को अलग करता लाल बेल्ट जो अब धूसर हो चली थी और जो उठते बैठते कई लोगों को यकायक निकर का सा भ्रम देती होगी। चेहरे पर हल्की सी जम आई नमी, आंखों में सुब्ह का लगाया फैल आया काज़ल। हां हाथों की चूडि़यां अब शादी के डेढ़ बरस बाद कम हो आई थी। 

 ......(ज़ारी)

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