Skip to main content

Guzarte Lamhen, passing moments via cinematic angle and '!!!'

27th May, 12 / Rasoi/ 12:55 AM (approx.)

कल रात भारतीय समयानुसार  (how Hindi changes our thoughts!) IST 11:08 पर उसका कॉल आया। हैलो के बाद बीच के समय में हमारे संबंधों की गर्माहट घुल आई। पिछले मार्च में जब हम मिले थे तो हम कोस्टा कॉफ़ी  में हम बैठे थे। पेपर नेपकिन उठाते समय उसने मेरा हाथ पकड़ा था। बहुत धीमे धीमे मुझमें कुछ हुआ था। मैं सिकुड़ने लगी थी। समझ नहीं आया कि कई बार जिंदगी भर धोखा खाने और छलावे को रिश्ते में रहते हुए भी हम नए किसी रिश्ते के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? जबकि हम जान रहे होते हैं कि हमारे बाकी प्यार और रिश्ते की तरह यह भी अनकंडिशनल है। क्या हममें मना कर पाने की इच्छाशक्ति नहीं होती या फिर पहचान की यह दस्तक हमारी जीवन में उम्मीद बनकर आता है। रोशनी भी अजीब शै है, पूरी उम्र अंधेरे की आइसपाइस करते बिता देने के बाद भी हममें कहीं यह धप्पा बनकर पैठ जाती है।

मैं अक्सर सोचती हूं कि आर को आखिर किस चीज़ की तलाश है!
वेल...... अलग होते समय आर ने मेरे बाएं गाल उसके चुंबन लिया जिसने मुझमें एक नया जोश भर दिया था।
 
------पॉज ......../कॉफ़ी ब्रेक /

30th May '12 - I at 8:58 PM

कितने कम लड़कों ने यह महसूस किया होगा कि प्यार करने देना प्यार करने से ज्यादा अहम है!
xxxxx

II- at 11:39 PM

यह कहावत गलत है कि फर्स्ट इम्प्रेशन इज़ द लास्ट इम्प्रॆशन । बाहरी प्रेशर के कारण या फिर पहली मुलाकात में स्वयं को हम अच्छा प्रजेंट करने के कारण अपने मूल गुण से उलट खुद को दिखाते हैं। आत्मविश्वास की कमी वाले ऐसे कई लोगों को मैं जानती हूं जो समय के साथ मिलते घुलते पहचान में मुझे हैरान कर डालते हैं।

31st May '12 - I at 14:56 PM

सोकर देर से उठी। तीस की उम्र होने को आई अब मेरी। अक्सर सुबह जब उठती हूं तो प्यार की कमी महसूस होती है। थर्टीज़ थोड़ी अजीब होती है। यह महसूस करवाती है कि अब हमारे लिए प्यार दुनिया में थोड़ा ही बचा है।  आई मीन कि..... अब मुझे प्यार पाने का नहीं प्यार देने का टाइम आ गया है।

xxxxx
पहली मंजिल से सामने देखती हूं तो पाती हूं ये जाती जुलाई की सीढि़यां हैं। खुले आकाश के नीचे, बारिश की नेह में भींग कर बीच की मुख्य जगह को छोड़कर अपने आस पास के इलाके पर जमी काई को बचाने का प्रयास कर रही है। दीवारों पर यहां वहां मखमली हरी कालीन लगी है।

लॉन के किनारे जंगली खरपरवार उग आए हैं। पी इनके बीच जब उतरता है तो लगता है अपने आप से उलझ रहा हो। दीवार को पकड बढ़ती हर लत्तर उसे किसी उधेड़बुन की तरह लगता है। कहता है - मन हिंसक हो जाता है और पूरी ताकत से उन्हें तब तक काटने का मन होता है जब तक कि सिर्फ और सिर्फ पारदर्शी मैं न बचूं।

3rd of June, 12 at 2:28 AM
सागर बियेविओरल डिसआर्डर से ग्रस्त लगा। आई गेस कि वो चाइल्ड अब्यूज़ का शिकार रहा हो। %$&#&$@

7th June, 12 at 9:46 PM
समटाइम्स वी डोंट चूज़ वर्ड केयरफुल्ली। टूडे आजर्व टोल्ड मी डैट ही वांट्स टॅ हैव सेक्स विद जी। आई इन्नटरप्पटेड एंड करेक्टरेड सिंस यू बोथ आर इन लव इच अदर यू कैन से दैड यू वन्ना मेक लव दिव हर।
सेक्स! हाऊ रिडिकलस!! F****

बाइ द वे लाइफ इज़ गोइंग ऑन  स्वीटहार्ट...... वैसे अभी अचानक से एम की याद आई जो अपने पूरे लेटर में लव की बात करती और लास्ट में अपने सिग्नेचर के बाद पी.एस. डालती कि - दिस इज़ नोट ए लव लेटर

ओह  गाॅश द मेन थिंग आफ्टर दिस लाइन वाज़ थ्री एक्स्क्लामेशन सिम्बल ‘‘!!!’’’

Now, remembering Baby's dialogue from Kasap (Joshi Ji)

"Usne shayad amrood ang lagaaya tha main N ki di hui Vodka laga rahi hoon"

Comments

Popular posts from this blog

उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।

सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया। xxx उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है। xxx हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ। xxx कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे

कुछ खयाल

चाय के कप से भाप उठ रही है। एक गर्म गर्म तरल मिश्रण जो अभी अभी केतली से उतार कर इस कप में छानी गई है, यह एक प्रतीक्षा है, अकुलाहट है और मिलन भी। गले लगने से ठीक पहले की कसमसाहट। वे बातें जो कई गुनाहों को पीछे छोड़ कर भी हम कर जाते हैं। हमारे हस्ताक्षर हमेशा अस्पष्ट होते हैं जिन्हें हर कोई नहीं पढ़ सकता। जो इक्के दुक्के पढ़ सकते हैं वे जानते हैं कि हम उम्र और इस सामान्य जीवन से परे हैं। कई जगहों पर हम छूट गए हुए होते हैं। दरअसल हम कहीं कोई सामान नहीं भूलते, सामान की शक्ल में अपनी कुछ पहचान छोड़ आते हैं। इस रूप में हम न जाने कितनी बार और कहां कहां छूटते हैं। इन्हीं छूटी हुई चीज़ों के बारे में जब हम याद करते हैं तो हमें एक फीका सा बेस्वाद अफसोस हमें हर बार संघनित कर जाता है। तब हमें हमारी उम्र याद आती है। गांव का एक कमरे की याद आती है और हमारा रूप उसी कमरे की दीवार सा लगता है, जिस कमरे में बार बार चूल्हा जला है और दीवारों के माथे पर धुंए की हल्की काली परत फैल फैल कर और फैल गई है। कहीं कहीं एक सामान से दूसरे सामान के बीच मकड़ी का महीन महीन जाला भी दिखता है जो इसी ख्याल की तरह रह रह की हिलता हुआ

मूक सिनेमा का दौर

दादा साहब फालके की फिल्में की सफलता को देखकर कुछ अन्य रचनात्मक कलाकारों में भी हलचल मचने लगी थी। 1913 से 1918 तक फिल्म निर्माण सम्बंधी गतिविधियां   महाराष्ट्र   तक ही सीमित थी। इसी दौरान कलकत्ता में   हीरालाल सेन और जमशेद जी मदन   भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हुए। फालके की फिल्में जमशेद जी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में   प्रदर्शित   होकर खूब कमाई कर रही थीं। इसलिए जमशेद जी मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे फिल्में बनाकर अपने ही थिएटरों में   प्रदर्शित   करें। 1919 में जमशेदजी मदन को कामयाबी मिली जब उनके द्वारा निर्मित और रूस्तमजी धेतीवाला द्वारा   निर्देशित   फिल्म ' बिल्म मंगल '   तैयार हुई। बंगाल की पूरी लम्बाई की इस पहली कथा फिल्म का पहला   प्रदर्शन   नवम्बर , 1919 में हुआ।   जमदेश जी मदन ( 1856-1923) को भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।   वे एलफिंस्टन नाटक मण्डली के नाटकों में अभिनय करते थे और बाद में उन्होंने सिनेमाघर निर्माण की तरफ रूख किया। 1907 में उन्होंने   कलकत्ता का पहला सिनेमाघर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस   बनाया। यह सिनेमाघर आ